दिव्यांशी मिश्रा
_धर्म के दो रूप हैं, एक प्राकृत जिसमें अपनी सुरक्षा, अपनी अतिजीविता , अपने वर्चस्व की कामना प्रधान होती है। दूसरा मानव, जो समस्त जगत की रक्षा और कल्याण को अपने सुख-समृद्धि और उन्नयन से ऊपर ही नहीं समझता, उसकी रक्षा के लिए अपना प्राण त्यागने को तत्पर रहता है।_
अमूमन हम धर्म की जिस रूप में व्याख्या करते हैं वह प्राकृत धर्म है उसमें जड़ चेतन सभी की अपनी विशिष्टता या गुण ही उनका धर्म बन जाता है।
इसमें सद असद का, पाप-पुण्य का भेद तो है, पर जब तक वह उसमें लिप्त है, उसे अपने लिए उसे उचित या जरूरी मानता है तब तक वह उसका धर्म है और जितनी तत्परता से उसका पालन उसके विशेष समाज में उसका सम्मान होगा।
_अपराधियों के समाज में दुर्दांत अपराधी का होता है – उनका साम्राज्य स्थापित हो जाता है। इसका प्रदर्शन करके वह अपने समाज में अपनी हैसियत कायम करता है। यह प्राकृत – प्रकृति पर आधारित धर्म है जिसकी प्रकृति नैतिकता निरपेक्ष होती है। इससे उस कार्य से लाभान्वित लोगों के बीच उस व्यक्ति को प्रतिष्ठा मिलती है। कोलंबस और उसके दल को मरणासन्न अवस्था में जिन जनों ने अतिथि के रूप मे आदर दिया, खाना पानी दिया वह उनको गुलाम बना कर उनसे सोना-चांदी लाने को मजबूर करता रहा, न लाने पर या निर्धारित मात्रा में न लाने पर यातना देता और हत्या तक करता रहा, परन्तु यूरोप के लिए वह हीरो है और एक सच्चा ईसाई भी था क्योंकि उसने उन्हें गुलाम बनाने के साथ ईसाई भी बनाया।_
इन्नोसेंट (निष्कलुष) और थियोडोरस (देवदूत) जैसे शब्द जघन्य अपराधियों का पर्याय बन जाएगा। सच कहें तो मानवधर्म की कसौटी पर रिलिजन, विश्वास, पंडे पुरोहित, कर्मकांडी, मायाचारी सभी अधर्म के संस्थावद्ध पर शक्तिशाली रूप सिद्ध होंगे। इस्लाम का धर्म से मजहब में बदलना, भारतीय माल-असबाब, व्यापारियों, विचारों और पूरब की मीठी हवाओं वाले मक्का के मुहम्मद का यहूदियों के प्रभावक्षेत्र, मदीना, में पहुंचने का परिणाम था।
_यह था इस्लाम की विदाई और मुहम्मदी मजहबपरस्ती का आरंभ। इन्सान धर्म का सफलता के लिए हैवानियत को अमल में लाने का मोड़। यदि इसको सही मानने वाले अपने को मुसलमान कहते हैं तो वे अपने को धोखा देते और दूसरों को झांसा देते हैं।_
इस्लाम धर्म था और मुहम्मदी पंथ एक मजहब और सभी मजहबों की तरह एक जिसका मानदंड सफलता है, और उसके लिए हर तगह के अपराध क्षम्य ही नहीं हैं अपितु सराहनीय हैं, अन्यथा गाजी, गजनी, गजनवी इस्लामपरस्तों के बीच ही नफरत के पात्र होते।
मजहब और धर्म में मूल अंतर अपने लिए सबको मिटाने की कीमत पर भी सब कुछ पाने की आकांक्षा मजहब है, अपनी बलि दे कर भी, सब कुछ बचाने की चिंता धर्म है।
_अधिकतम की – जिसमें प्राणिजगत ही नहीं वानस्पतिक जगत के साथ जल और वायु की शुद्धता – की रक्षा के लिए अधिकतम त्याग की भावना प्रधान है मानव धर्म है जिस पर भारत कई हजार साल पहले पहुंच गया था और पश्चिम जिस पर पहुंजने की कोशिश कर रहा है पर पहुंच नहीं पा रहा।_
भारत मे अपार संपन्नता थी पर इसमें पूंजीवाद नहीं पनप सकता था क्योंकि इसकी प्रकृति एक लंबे संघर्ष के बाद धार्मिक बनी थी, पश्चिम की प्रकृति मजहबी थी। मार्क्स और ऐंगेल्स ने धर्म की स्थापना के लिए मजहब का विरोध किया था। भारत के विषय में उनकी समझ कम या मिशनरियों की सीधी-टेढ़ी सूचनाओे पर आघारित होने के कारण वह इसमें प्राच्यनिरंकुशता के प्रमाण तलाशते रहे, जब कि उन्हें साम्यवाद की जड़ें – सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया; सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुक्खभाग्भवेत् के उस परम आदर्श तक पहुंचना चाहिए था।
_विस्तार से बचते हुए कहें तो पूंजीवाद मजहब नहीं है पर इसकी रूझान मजहबी है और साम्यवाद धर्म नही है पर रुझान धार्मिक है। ब्राह्मणवाद मजहब नहीं है, पर रुझान मजहबी है, वर्णविभाजन ऊपरी परिभाषा में धार्मिक है, पर जाति के रूप में मजहबी।_
एक समय में मनुष्य नरभक्षी था। उसके लिए किसी दूसरे जानवर का शिकार करने की अपेक्षा मनुष्य का शिकार करना आसान था।
जिसे हम अफ्रीका से निकला प्रबुद्ध और आधुनिक मानव मानते हैं उसने एशिया में फैलने के बाद पूर्ववर्ती मनुष्यों – रामापिथिकस, सिवापिथिकस, जावा मैन, पीकिंग मैन, लिएंडर्थल की संतानों- का ही शिकार किया और कुछ समुदाय उससे आगे बढ़े ही नहीं जिसका परिणाम यह है कि कहा जाता है उसके अतिरिक्त दूसरी कोई मानव प्रजाति बची ही नहीं। यह मान्यता पूरी तरह सही न हो तो भी काफी दूर तक सही है।
दूसरे समाज बहुत बाद तक नरभक्षी रहे। पश्चिमी और मध्य अफ्रीका, फिजी, न्यूगिनी, आस्ट्रेलिया और भारत में भी कुछ तक कुछ आदिम जन आधुनिक काल तक नरभक्षी थे। सभ्य समाज में इसके सांस्कृतिक अवशेष काली (कपालकुंडला) और कपाली के देवत्व में मिलते हैं।
_जब तक मनुष्य प्रकृति पर निर्भर था, धर्म की पृथक चेतना न थी। उसका आचरण प्रकृति (प्रवृत्ति) चालित था। उसकी मूल चिंता आत्मरक्षा – क्षुधा निवारण और दूसरों का आहार बनने से अपना बचाव करने तक सीमित थी। बाद के कालों में इसे सबसे खुशहाली और निष्कलुषिता के युग – सतयुग – का नाम दिया गया यह कम रोचक नहीं है, पर इसे सबसे अधिक धर्मपरायण युग भी कहा गया। उस युग में धर्म का वृषभ चतुष्पाद था।_
वृषभ के रूप में धर्म की कल्पना से हम समझ सकते है कि सतयुग की कल्पना गोपालन आरंभ होने के बाद की है। परन्तु कृषि की ओर अग्रसर समुदाय दिशा में प्रयोग करने वालों के लिए वह आदर्श युग नहीं हो सकता था।
वे इसे भूख, कुपोषण और असत्य और पाप का युग मानते थे। उनका दावा था कि खेती से अन्न उत्पादन के बाद ही मनुष्य अनमीव (नीरोग) और अकिल्विष (निष्पाप) हुआ।
धर्मचेतना भी कृषिकर्म के बाद ही संभव थी क्योंकि धर्म का अर्थ है कर्म और कर्म का लक्ष्य है उत्पादन। धर्म के लिए अधिक उपयुक्त शब्द था व्रत। ऋग्वेद में व्रत, ऋत और धर्म का लगभग मिलते-जुलते आशय में प्रयोग किया गया है।
_इन तीनों की संक्षिप्त व्याखया ‘अस्तित्व रक्षा के लिए आवश्यक आचार’ के रूप में की जा सकती है। इसकी सबसे प्राथमिक आवश्यकता है आहार की आपूर्ति, शरीर का भरण-पोषण – शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।_
अन्न वै ब्रह्म। हमारे पास जो कुछ है वह प्रकृति से ही उपलब्ध है। जो प्राकृत रूप में पैदा होता है वह सर्वसुलभ है, इसमें प्राणिमात्र का हिस्सा है और इनमें छीना-झपटी चलती रहती है। जो जीवधारी है उसे प्रकृति-प्रदत्त आहार को दबोचना, बटोरना, फंसाना और पकड़ना होता है। जो पैदा होता है, विद्यमान है, बढ़ता है, पराकाष्ठा पर पहुंच कर छीजता और मरता है वह जीवधारी है और इस नियम से वह दूसरों का आहार है।
_यह नियम वनस्पतियों पर भी लागू होता है, इसलिए जीवधारी ही जीव का आहार है- जीवो जीवस्य भोजनम्। हिंसा तो अनिवार्य है, उसके स्तर में भेद हो सकता है। जीवनचक्र परस्पर एक दूसरे का आहार बनने का चक्र है।_
कृषि के आरंभ से पहले मनुष्य उत्पादन नहीे करता था, जुटाता और अनुत्पादक श्रम कर्म नहीं नहीं हो सकता, हेराफेरी भले हो। दूसरों के उत्पादन पर पलने वाले धार्मिक नहीं हो सकते। सभी अपराध दूसरों के उत्पाद को बिना प्रतिदान के हड़पने से संबंध रखते हैं।
कर्म के साथ धर्म के असंख्य रूप हो जाते हैं – गृहस्थ का धर्म, सन्यासी का धर्म, पुत्र का, पिता का, पति का पत्नी, सती का, रूपाजीवा का आदि, और एक ही व्यक्ति एक साथ कई धर्मों का निर्वाह करता है, स्वामी के रूप में, सेवक के रूप में, पति के रूप में, पिता के रूप में, पड़ोसी के रूप में, नागरिक के रूप में, कार्यक्षेत्र अनुसार अध्यापक, सैनिक, चिकित्सक, व्यापारी आदि के रूप में, किसी मत, संगठन के सदस्य या विचारधारा के अनुयायी के रूप में।
_एक ही मजहब में कई धर्म हो सकते हैं – मुअज्जिन का, मुल्ला का, मोलवी का। इनका सम्यक निर्वाह करने पर वह अपने समुदाय में अधिक सम्मान पाता है, पर यह भी संभव है कि वह अपने सभी धर्मों का पालन ठीक से न कर पाए या एक का निर्वाह दूसरे में बाधक बने।_
परंतु अपने विविध धर्मों में से किसी भी एक का इतनी तत्परता से पालन कि दूसरे के लिए समय ही न मिले उसे अधार्मिक नहीं बनाता, एक उच्चतर धर्म के लिए दूसरों के त्याग का पर्याय बन जाता है।
[चेतना विकास मिशन)





