विजय दलाल
उपराष्ट्रपति धनखड़ आरएसएस के हसबोले की भाषा बोल रहे हैं। इस पद को ग्रहण करते वक्त संविधान की शपथ का स्पष्ट उल्लंघन कर रहे हैं। अगर उन्हें इस संविधान से कोई तकलीफ़ है तो पद त्याग कर। राजनीति के मैदान में आना चाहिए।

शीर्षक:
संविधान की प्रस्तावना पर उपराष्ट्रपति की टिप्पणी का करारा जवाब: ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ कोई घाव नहीं, भारत की आत्मा हैं
भूमिका
हाल ही में भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने संविधान की प्रस्तावना में शामिल शब्दों “पंथनिरपेक्ष” (Secular) और “समाजवादी” (Socialist) को “एक पाप”, “बलात्कार”, और “रिसता हुआ ज़ख्म” करार दिया। यह टिप्पणी न केवल ऐतिहासिक और संवैधानिक दृष्टि से ग़लत है, बल्कि उनके संवैधानिक पद की गरिमा के भी प्रतिकूल है।
यह लेख इस टिप्पणी का तथ्यों, न्यायिक निर्णयों और संवैधानिक दृष्टिकोण से तीखा और सटीक खंडन करता है। साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि क्या उपराष्ट्रपति जैसे उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को ऐसी टिप्पणी करना शोभा देता है।
I. ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों की संवैधानिक स्थिति
भारतीय संविधान की प्रस्तावना भारत को एक “सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य” घोषित करती है। “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्द 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़े गए थे, लेकिन इनका मूल भाव संविधान में पहले से ही समाहित था।
- पंथनिरपेक्षता (Secularism):
संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक धर्म की स्वतंत्रता और राज्य द्वारा सभी धर्मों के समान व्यवहार की स्पष्ट व्यवस्था पहले दिन से है।
डॉ. आंबेडकर, नेहरू, और सरदार पटेल जैसे नेताओं ने संविधान सभा में स्पष्ट किया था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा।
1976 में “पंथनिरपेक्ष” शब्द केवल उसी मूल भावना को औपचारिक रूप से प्रस्तावना में शामिल करने के लिए जोड़ा गया।
👉 भारत का सर्वोच्च न्यायालय अपने ऐतिहासिक निर्णय एस.आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार (1994) में स्पष्ट कर चुका है कि पंथनिरपेक्षता संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का हिस्सा है।
- समाजवाद (Socialism):
“समाजवाद” का अर्थ समानता, सामाजिक न्याय, और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण से है—न कि कम्युनिज़्म से।
संविधान के अनुच्छेद 38, 39, 41, 43 जैसे निदेशक सिद्धांत (Directive Principles) पहले दिन से ही राज्य को सामाजिक-आर्थिक न्याय की दिशा में कार्य करने को कहते हैं।
“समाजवादी” शब्द का समावेश केवल इस नीति-निर्देशक लक्ष्य को प्रस्तावना में प्रतिबिंबित करता है।
👉 मिनर्वा मिल्स बनाम भारत सरकार (1980) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समाजवाद संविधान की मूल आत्मा है।
II. क्या उपराष्ट्रपति ऐसी टिप्पणी कर सकते हैं?
भारत के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति के रूप में श्री जगदीप धनखड़ एक संविधानिक संस्था के प्रतीक हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे राजनीतिक तटस्थता और संविधान के प्रति पूर्ण निष्ठा बनाए रखें।
- शपथ का उल्लंघन
अनुच्छेद 69 के तहत उपराष्ट्रपति “भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा” की शपथ लेते हैं।
संविधान के अंग—जैसे कि प्रस्तावना—को “बलात्कार” या “पाप” कहना न केवल शपथ का उल्लंघन है, बल्कि संविधान के खिलाफ़ अभद्र और असंवैधानिक भाषा का प्रयोग है।
- राजनीतिक तटस्थता का हनन
राज्यसभा के सभापति के रूप में वे संसद के एक तटस्थ अध्यक्ष हैं। उनसे यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे संविधान के स्थापित सिद्धांतों पर राजनीतिक और वैचारिक टिप्पणी करें।
- संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन
भारत में संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का यह तकाज़ा है कि उच्च पदस्थ व्यक्ति संविधान की आत्मा को नष्ट करने की नहीं, उसे लागू करने की जिम्मेदारी निभाएं।
इस तरह की टिप्पणी करना न्यायपालिका की व्याख्या और संसद द्वारा पारित संशोधन को सार्वजनिक रूप से चुनौती देना है—जो कि उपराष्ट्रपति जैसे पद के लिए सर्वथा अनुचित है।
III. इस टिप्पणी के खतरनाक निहितार्थ
यह टिप्पणी केवल शब्दों की बहस नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा वैचारिक अभियान चल रहा है जिसमें—
• पंथनिरपेक्षता को खारिज करके बहुसंख्यकवाद को वैधता देना,
• समाजवाद को मिटाकर पूंजीवादी और कार्पोरेट हितों को सर्वोपरि बनाना,
• और संविधान की मूल संरचना को बदलने का मार्ग प्रशस्त करना—
स्पष्ट लक्ष्य हैं।
👉 यह संवैधानिक पुनर्लेखन (rewriting of Constitution) की कोशिश है, जो हमारे लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के विचार के लिए अत्यंत घातक है।
IV. नागरिकों और संसद की जिम्मेदारी
जब संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति ही संविधान की आत्मा को अपमानित करें, तब मौन रहना अपराध है।
नागरिक क्या कर सकते हैं:
- संसद में जनप्रतिनिधि इस बयान पर बहस और निंदा प्रस्ताव लाएं।
- संवैधानिक विशेषज्ञ और न्यायिक समुदाय सार्वजनिक प्रतिक्रिया दें।
- मीडिया और नागरिक समाज संविधान की रक्षा में आवाज उठाएं।
- संविधान की प्रस्तावना को पढ़ाएं, समझाएं और जिएं।
निष्कर्ष
“पंथनिरपेक्ष” और “समाजवादी” शब्द भारत के संविधान की आत्मा हैं, न कि कोई ‘घाव’।
उपराष्ट्रपति द्वारा इन शब्दों पर की गई टिप्पणी न केवल संवैधानिक दृष्टि से ग़लत है, बल्कि यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत भी है।
यह समय है जब हम सभी डॉ. आंबेडकर के उस कथन को याद करें, जब उन्होंने कहा था:
“एक अच्छा संविधान भी बुरा साबित हो सकता है, यदि उसे चलाने वाले लोग बुरे हों।”
अब समय है तय करने का—क्या हम संविधान को चलाने वालों के विवेक पर छोड़ देंगे या जनता की ताक़त से संविधान की रक्षा करेंगे?
संदर्भ:
- भारतीय संविधान – प्रस्तावना, अनुच्छेद 25–28, 38, 39, 69
- 42वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1976
- एस.आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार (1994) – धर्मनिरपेक्षता पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
- केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) – मूल संरचना सिद्धांत
- मिनर्वा मिल्स बनाम भारत सरकार (1980) – समाजवादी सिद्धांतों की रक्षा
- संविधान सभा की बहसें – नेहरू, आंबेडकर, पटेल के भाषण
- 2025 में उपराष्ट्रपति के बयान के मीडिया स्रोत





