अग्नि आलोक
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कहानी:संस्कार के बीज

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शोभा और प्रभास महानगर दिल्ली में रहते हैं। उनका एक प्यारा सा बेटा भी है चिंटू। 

प्रभास और शोभा चाहते थे कि उनके बेटे में संस्कार के अच्छे बीज पड़ें। वह जानते थे कि यह अपनों के साथ में ही संभव है।

प्रभास हर साल गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू होते ही शोभा और चिंटू को अपने गाँव छोड़ जाता और स्कूल खुलने के कुछ दिन पहले आकर उन्हें वापिस दिल्ली ले जाता। 

प्रभास का गांव कानपुर के पास था।

चिंटू अपने गांव में बहुत खुश रहता। जहाँ दिल्ली में उसे जबरदस्ती उठाकर स्कूल भेजा जाता था।

 यहाँ सुबह अपने दादाजी के साथ उठ जाता और खेत पर चला जाता वहाँ जाकर गाय और बछड़ा के साथ खेलता दादाजी दूध दुहते तो चिंटू को एक गिलास गाय का ताजा दूध दे देते। शुरू में चिंटू को अच्छा नहीं लगता था, लेकिन अब उसको अच्छा लगने लगा है, और इसीलिए वह दूध दुहने की प्रतीक्षा किया करता। 

कभी-कभी दादा जी उसे एक बड़े से कटोरे में सत्तू घोलकर भी दिया करते। खेत पर एक किनारे एक बगिया भी थी। इसमें कनेर, गुड़हल, बेला, चमेली के फूल, भिंडी, टमाटर, बैगन, तोरई और लौकी लगी हुई थी। आम, जामुन और कटहल के भी बड़े-बड़े पेड़ थे। चिंटू के दादाजी ने मजदूर से कहकर आम के एक मजबूत शाखा पर मूंज की रस्सी का झूला भी डलवा दिया था। जब चिंटू खेलते खेलते थक जाता तो बड़े आनंद से इस झूले पर बैठता।

कभी-कभी जामुन के पेड़ के नीचे पड़ी चारपाई पर भी लेट जाता और वहीं लेटे- लेटे पके हुये कद्दू के सूखे बीज खाता।

 उसे जब प्यास लगती तो वह जामुन के पेड़ के नीचे रखी हुई सुराही से खुद ने कर पानी पी लेता। फिर खेत पर ही दादाजी के साथ नहाता गीले ही गीले शंकर जी के मंदिर में जल चढ़ाता। बगिया से तोड़कर कुछ फूल चढ़ाता। कुछ फूल और सब्जियाँ लेकर घर आ जाता। वैसे तो वह खेत से नहा कर ही घर आता घर आने पर शोभा उसके हाथ पैर धुलवाकर खाना लगा देती। खाना बहुत ही स्वादिष्ट एवं ताजा होता। 

 घर में भुनी हुई अरहर की दाल जिसमें कच्चे आम पड़े होते, कटहल का अचार, सब्जी, दही, हाथ की बनी हुई चूल्हे पर सिंकी रोटी और उसपर ढेर सारा देशी घी। 

खाना खाकर चिंटू दादा के साथ टीवी देखता और थोड़ी देर के लिये सो जाता। जब शाम को उठता तो दादी के साथ मोहल्ले में चला जाता, वहाँ पर दादी गप्पें हाँकती और चिंटू मोहल्ले के बच्चों के साथ टीपू, गुल्ली डंडा, कंचे, छुपम – छुपाई, खोखो, कबड्डी खेलता। फिर शाम को घर आकर हाथ -पाँव धोकर दादा जी के साथ मंदिर जाता और फिर रात को खाना खाकर दूध पीता और  थोड़ी देर टीवी देखकर सो जाता। 

जब वह गांव आता तो मोबाइल को हाथ भी नहीं लगाता था। 

23 जून से चिंटू के स्कूल खुलने वाले थे। इसलिये प्रभास उन लोगों को लेने के लिये गाँव आया हुआ था। आज सुबह से ही चिंटू बहुत उदास था। उसने मम्मी-पापा से कई बार कहा कि कुछ दिन गांव में और रुक जाओ न। अभी भी जब दादी बैग में अपने हाथ के बनाये हुये अचार, पापड़, बड़ियाँ रख रही थी तो वह उनका पल्लू पकड़ के खड़ा था।

दादी ने बड़े लाड़ से पूछा, “का है लल्ला, कछु चहिये है का?”

चिंटू ने कहा, “दादी आप कहो मम्मी-पापा से कि कुछ दिन और रुक जाएँ।”

दादी ने कहा, “ठीक है लल्ला कह देंगे।”

” नहीं, अभी चलो।” चिंटू ने दादी का आँचल खींचते हुए कहा। 

तभी उसने देखा कि सामने से शोभा आ रही थी। उसने चिंटू को डांट दिया,

 “क्या है चिंटू, दादी को क्यों परेशान कर रहे हो।”

  तो वह आँचल छोड़कर दादी के पीछे खड़ा हो गया। 

चिंटू की दादी ने कहा, “बहू कुछ दिन और रुक जाती चिंटू का बहुत मन है।”

शोभा ने कहा, “मन तो मेरा भी बहुत है अम्मा, पर चिंटू के स्कूल खुलने वाले हैं न, इसलिये जाना जरूरी है।”

दादी ने कहा, “तो छठवें दर्जे में ही तो है, कौन सी कलेक्टरी पढ़ रहा है।”

“हाँ, अम्मा लेकिन आजकल स्कूल शुरू होते हैं और पढ़ाई फ़ौरन शुरू हो जाते हैं, फिर कॉपी कंप्लीट करने के लिये बहुत भटकना पड़ता है। दादी ने आखिरी अस्त्र फेंका, “कोई नहीं, अड़ोस-पड़ोस से मंगवा कर लिख लेगा।”

शोभा ने कहा, “फिर कोई नहीं देता अम्मा, एक बार बहुत परेशान हुये।”

 तब दादी ने चिंटू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि, “लल्ला अभी तुम जाओ फिर हम जल्दी से मक्का के भुट्टा लेकर आयेंगे तुम्हारे लिये, तुम्हें पसन्द हैं न?”

 चिंटू ने एक तरफ सिर हिलाकर मौन सहमति दे दी और अपने दादाजी के पास चला गया। दादाजी ने उसके लिये गीले सरकंडा से तोता और खरगोश बनाकर दिये। चिंटू खुशी-खुशी उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए सामान में रखने लगा। तब उसने देखा कि दादी ने उसकी पसंद की बेसन की बर्फी और गुझियाँ भी बना कर रख दीं। उसकी आँखों में बिछोह के आँसू आ गये। 

 तभी आँगन में दादी भी आ गई, शायद वह भी दिल्ली ले जाने के लिए कुछ सामान रखने आईं थी। चिंटू को देखकर बोली, “अरे चिन्टुआ, का हुई गवा लल्ला काहे रोवत हौ?”

चिंटू ने कहा, “दादी आप भी हमारे साथ चलो न।”

दादी ने उसके सिर पर प्रेम से हाथ फेरते हुए कहा “चलूँगी लल्ला, लो पहले ई पन्नी अपनी मम्मी को दे आ।”

“दादी, क्या है इसमें?” बालसुलभ जिज्ञासा के चलते चिंटू ने पूछा।

“इसमें बीज हैं, जा जाकर अपनी मम्मी को दे आ।”

“हाँ दादी।” कहकर चिंटू ने जाकर वह थैली शोभा को दे दी और कहा।

“मम्मी दादी ने ये दिया, बोलीं कि बैग में रख लेना भूलना नहीं।”

“हाँ बेटा लाओ।”

“मम्मी, ये किसके बीज हैं और इतने सारे बीजों का अपन क्या करेंगे?”

“बेटा, इसमें आम, जामुन, लीची, सीताफल, बेर, संतरा, चीकू और जो भी फल हम लोगों ने खाये हैं, सबके बीज हैं।”

चिंटू ने थैली छूते हुए पूछा “तो अपन इनका क्या करेंगे? “

“जब हम ट्रेन से दिल्ली जायेंगें न, तो रास्ते में कहीं- कहीं पर ये बीज खिड़की से बाहर फेंकते जायेंगे।”

चिंटू ने पूछा, “अच्छा… फिर?”

शोभा ने कहा “फिर क्या जब पानी बरसेगा तो इनमें अंकुर निकलेगा और फिर खूब बड़ा पेड़ बन जायेगा और उससे फल मिलेंगे।”

“पर मम्मी वह फल हमें कैसे मिलेंगे, हम ट्रेन से कैसे तोड़ पायेंगे?”

तभी प्रभास भी वहाँ आ गया, और चिंटू की बात सुनकर सभी हँसने लगे। 

 फिर प्रभास ने कहा, “अरे$$, बुद्धूराम एक बात बताओ, अभी जो फल हम खाते हैं वह पेड़ हमने लगाये हैं क्या ? बताओ ? “

चिंटू ने ‘न’ में गर्दन हिलाई। 

“तो बस फिर, जो भी खायेगा वह हमें आशीर्वाद देगा।”

“पर पापा सारे पेड़ो को पानी कौन देगा?”

“देखो अभी तक हम लोगों ने लाखों बीज कानपुर से दिल्ली की रास्ता में बिखेरे हैं। पर उन लाखों में से कई सौ अंकुरित हुये और थोड़े बड़े बड़े होकर सूख गये।”

“फिर, पापा।”

“फिर बहुत हम पौधे बचते हैं जो प्रकृति के अनुकूल हो जाते हैं और बड़ा पेड़ बनता है।”

“ठीक है पापा, पर इस बार बीज मैं बौऊँगा।”

कहते हुये बाहर की ओर दौड़ गया, जहाँ से उसे दादाजी की आवाज सुनाई दे रही थी।

पूजा अग्निहोत्री

जन्म – 4 सितंबर , 1983
जन्मस्थान – छतरपुर (मध्यप्रदेश)
शिक्षा – इंटरमीडिएट (विज्ञान संकाय), स्नातक (कला संकाय), परास्नातक (अंग्रेजी साहित्य), पीजीडीसीए।
संप्रति – स्वतंत्र लेखन, पटकथा लेखन, ।
अभिरुचि – पाककला, पोषाक सज्जा।
प्रकाशित / अप्रकाशित – “लोक के राम” पुस्तक (2025) स्पर्श प्रकाशन, पटना
लघुकथा कलश, किस्सा कोताह, विश्वगाथा, स्रावन्ति (दक्षिण भारतीय हिंदी प्रचारिणी महासभा), दृष्टि, क्षितिज, क्राइम ऑफ नेशन, पलाश, धर्मयुग, इत्यादि पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में लगातार लघुकथाएँ, कविताएँ, आलेख आदि प्रकाशित।
साझा संकलन – काव्य पुंज, दास्तान-ए-किन्नर।
यूट्यूब चैनल (किडलॉजिक्स, बैडटाइम स्टोरी) के लिये पटकथा लेख ।
विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में साहित्यिक पुस्तकों की समीक्षा प्रकाशित ।

Ramswaroop Mantri

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