दिव्यांशी मिश्रा
_जो सेहतमन्द है , वह जन्नत में है। स्वस्थ होना ही दरअसल देवता होना है। जो शारीरिक-मानसिक आधियों-व्याधियों से विमुक्त है , वह स्वर्गजीवी-देवदेही है। ढेरों लोग लेकिन इस स्वर्ग से जब-तब मृत्यु की ओर गिरा करते हैं , कोई कम तो कोई थोड़ा अधिक। आगे जो कहानी है , वह इसी स्वर्गच्युति-स्वर्गारोहण की मानव-कथा है।_
रुग्ण त्रिशंकु स्वर्ग जाना चाहता है ; उसे स्वास्थ्येन्द्र बनने की आकांक्षा है। उसका रोग ही उसे पार्थिव बनाये हुए है , अन्यथा वह भी आज देवताओं की कोटि में होता ! रोग उसे पार्थिवता देता है , पृथ्वी उस-जैसे पार्थिव रोगियों का अस्पताल है। अपनी अतृप्त स्वास्थ्य-इन्द्राकांक्षा लिए वह मृत्यु से जूझ ही रहा है कि उसके जीवन में वैद्य विश्वामित्र का प्रवेश होता है।
विश्वामित्र उसे आश्वासन देते हैं कि वे उसे स्वर्ग पहुँचाएँगे। अपने तपोबल से उसे स्वस्थ देवों के बीच स्थापित करेंगे। उसे मरने न देंगे , उसे नवजीवन देंगे। सेहत से भरपूर संजीवनि-शक्ति लेकर वह जिएगा ! ख़ूब जिएगा !
विश्वामित्र उसपर चिकित्सा आरम्भ करते हैं। बीमार त्रिशंकु रोग-मुक्त होपर ऊपर उठता है। वह स्वर्ग पहुँचता है , पर वहाँ टिक नहीं पाता। देव-प्रकृति उसे नीचे ठेल देती है। फलस्वरूप वह बेचारा नीचे गिरता है। विश्वामित्र उसका अधोपतन देख रहे हैं। वे उसे ढाढ़स बँधाते हैं , “ठहर जा ! तू गिरेगा नहीं ! वहीं रुक ! मैं तुझे अपनी तपस्या के बल से वहीं स्थिर कर देता हूँ !”
त्रिशंकु का पतन रुक जाता है। पर उसका ऊर्ध्वगमन प्रकृति नहीं होने दे रही। विश्वामित्र उसे नीचे नहीं आने दे रहे , कुदरत उसे ऊपर नहीं पहुँचने दे रही। स्वास्थ्य और रोग के बीच में अधजिया-अधमरा वह हवा में अटका-लटका है। अधर में झूलता , अर्धजीवित-अर्धमृत !
मेडिकल साइंस ज्यों-ज्यों उत्तरोत्तर नये-नये तपोबल अर्जित कर रही है , उसमें लोगों को और लोगों को उसमें सेहत दे सकने का भरोसा बढ़ रहा है। नित्य नवीन विश्वामित्र ट्रेन होकर रोगी त्रिशंकुओं के उपचार में रत हैं , उन्हें भरोसा दिलाते कि वे उन्हें स्वास्थ्य-स्वर्ग में स्थापित करेंगे। वे पूरे मनोयोग से त्रिशंकुओं का उपचार भी आरम्भ करते हैं।
_त्रिशंकु कुछ ठीक भी होते हैं , पर पूरी तरह नहीं। ऐसे में वे जीवन और मृत्यु के बीच लटक जाते हैं : उम्मीद पर धन-समय-आशाओं के संसाधन लुटाते हुए !_
नित्य महँगे होते उपचार से प्रश्न यह किया जाना चाहिए कि क्या यह रोगी के लिए सचमुच स्वास्थ्यकारी है। क्या इसे देने से बीमार को गुणवत्ता-परक स्वास्थ्य लाभ होगा ? पैसों को पानी की तरह बहाने से रोगी दरअसल अपने लिए प्राप्त क्या कर पा रहा है ? अगर कुछ क्वॉलिटेटिव नहीं , तो ऐसे उपचार को अनवरत चलाये रखने का क्या लाभ !
सेहत कोई संख्या नहीं है : उसे किसी इम्तेहान की मार्कशीट नहीं समझना चाहिए। युद्ध से भी रोग का शमन इस मामले में भिन्न है कि युद्ध करने वाले युद्धभूमि के प्रति संरक्षण-भाव नहीं रखते। जबकि डॉक्टर मरीज़ के जिस्म में पनप रही मारक बीमारी से इस तरह लड़ता है कि उसका ध्यान जिस्म को भरसक बचाते हुए बीमारी को मिटाना होता है।
घातक बीमारी के उपचार के समय वह बीमार को नहीं मिटने दे सकता। चिकित्सा जीवित को जिलाये रखने के लिए तो है ही , उसका ध्यान इसपर भी रहना चाहिए कि जीवित जीकर कैसा जीवन जिएगा। अगर जीवित मौत से बदतर जीवन जीने पर मजबूर है , तो ऐसे जीवन से क्या मृत्यु श्रेयस्कर न होगी ?
_स्वास्थ्य एक क्वॉलिटेटिव उपलब्धि है। डॉक्टर विश्वामित्र के लिए इतना दम्भ अच्छा नहीं कि बीमार त्रिशंकु को स्वर्ग से गिरने नहीं दिया गया। त्रिशंकु की क्या व्यावहारिक मेडिकल-काउंसिलिंग बेहतर न होती कि उसके लिए स्वर्ग सम्भव नहीं है और उसे मृत्युलोक पर ही जितने दिन शेष हों , यथासम्भव सुखी और निष्पीड़ित रूप में जीने चाहिए ?_![]()





