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सेल्फी उतारना नहीं सेल्फिश होना ग़लत

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शशिकांत गुप्ते इंदौर

मोबाइल का उपयोग आपसी सम्पर्क,संदेशों के आदान प्रदान के लिए व्हाट्सएप और फेसबुक और सेल्फी तक पहुँच गया है।Selfie सेल्फी का मतलब स्वचित्र उतारना।स्वयं ही खुद का चित्र खेचना।
वर्तमान में सेल्फी भी सियासी हो गई है।कानून के रक्षक का गणवेष पहने हुए युवतियों के लिए सेल्फी का प्रयोग गैर कानूनी हो गया है। उन पर एफआईआर दर्ज हो गई है?
सियासत के घटते स्तर को देखते हुए आश्चर्य होता है।।महज एक सेल्फी के पीछे सियासत इतनी सेल्फिश(Selfish) हो गई है?
सेल्फी अत्याधुनिक तकनीक का अविष्कार है।तकनीकी क्षेत्र में नित नए अविष्कार हो रहें हैं।तकनीक का उपयोग कब कैसे,क्यों,और कितना करना चाहिए यह स्वविवेक पर निर्भर है।
ठीक इसीतरह जो लोग मादक पदार्थो के नशे के आदी हो जातें हैं,वे प्रताड़ित किए जातें हैं।
मादक पदार्थो का उत्पादन करने वाले और उसे बाजार में उपलब्ध ( Available) करवाने वालों पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं होती है?
यह भी बहुत ही आश्चर्यजनक बात है कि, मादक पदार्थो को ड्रग कहा जाता है?
बहरहाल एक अभिनेता का सुपुत्र
मादक पदार्थ के सेवन के आरोप में गिरफ्तार होकर लगभग अपराधी की श्रेणी में आने ही वाला है?
वैसे नशा करने वाले सेल्फ (Self ) अर्थात स्वयं नशा करतें हैं।नशे के बाद भी अपने स्वार्थ (selfishness) के लिए सचेत रहतें हैं।
इस प्रसंग पर सन 1964 में प्रदर्शित फ़िल्म लीडर का यह गीत जिसे गीतकार शक़ील बदायुनी ने लिखा प्रासंगिक लगता है।
मुझे दुनिया वालों,शराबी न समझों
मै पीता नहीं हूँ,पिलाई गई है
नशा करने वाला दार्शनिक भी बन जाता है, और कहता है।
नशे में हूँ लेकिन,मुझे ये खबर है
के इस जिंदगी में सभी पी रहें हैं
नशा करने वाला सामाज में पीड़ित,वर्चस्व रखने वालों के साथ शोषण करने वालों पर तंज कसते हुए कहता है।
किसी को नशा है,जहां में खुशी का
किसी को नशा है,गम-ए-जिंदगी का
कोई पी रहा है, लहू आदमी का
समाज में दोहरी जिंदगी जीने वालों के लिए कहा गया है।
जमाने के यारों,चलन है निराले
यहाँ तन है उजले,मगर दिल है काले
ये दुनिया है दुनिया,यहाँ मालोजर (धनदौलत) में
दिलों की बुराई छुपाई गई है
इसलिए तकनीक का इस्तेमाल करना अपराध नहीं हो सकता है।
सेल्फी से ज्यादा खराब है सेल्फिशनेस।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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