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*महाराष्ट्र के स्कूल में छात्राओं के साथ महिला प्राचार्य द्वारा यौन उत्पीड़न*  

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  -सुसंस्कृति परिहार 

महिला प्राचार्य द्वारा यौन उत्पीडन की आश्चर्यजनक खबर विगत दिनों महाराष्ट्र के ठाणे के शाहपुर में एक प्राईवेट स्कूल से सामने आई है। यह अपने तरह की एक अनूठी घटना है।अब तक प्रिंसिपल और एक महिला कर्मचारी को इसके लिए  जिम्मेदार मानते हुए गिरफ़्तार किया गया है।   उन पर आरोप है कि इन दोनों ने  छात्राओं के कपड़े उतरवाकर देखा कि वे मासिक धर्म से हैं या नहीं क्योंकि उन्हें स्कूल के शौचालय की दीवार पर ख़ून के धब्बे मिले थे। धब्बे दिखने के बाद  छात्राओं से पूछा गया कौन कौन छात्राएं मासिक धर्म से हैं ? जिन्होंने हां कहा उनके फिंगर प्रिंट लिए गए लेकिन जिन्होंने ना में जवाब दिया उन्हें ले जाकर उनके अंडरगार्मेंट उतरवाकर मासिक धर्म की जांच करने उनके प्राईवेट पार्टस की तलाशी ली गई। कि वो झूठ तो नहीं बोल रहीं हैं।यह जांच बताया जा रहा है लगभग 125 नाबालिग बालिकाओं के साथ की गई। जिससे उन्हें शर्मिंदा होना पड़ा।

इस जांच के बारे में  सिर्फ एक छात्रा ने अपनी मां से साझा किया। बाकी सब शर्म, संकोच और प्राचार्य के डर से भयभीत होकर चुप्पी साध लीं। इस बच्ची की मां की पहल पर यह बात सबके घर पहुंची। वे सब दूसरे दिन एकत्रित होकर विद्यालय पहुंची और प्राचार्य के उत्पीड़न पर गिरफ्तारी की मांग करने लगीं। महिलाओं के आक्रोश को देखते हुए पुलिस ने शाला की प्राचार्य महोदया एवं एक शिक्षिका को गिरफ्तार कर लिया है।

यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि भारत देश में मासिक धर्म की बात छुपाई जाती है। इस विषय पर घर में मां बहिन और स्कूल में सहेलियों से भी बात नहीं होती।बड़ी संख्या में लड़कियां इन दिनों छुट्टी मनाती हैं यदि जाती भी हैं तो चुप रहती हैं।इसी शर्म और संकोच के वशीभूत हो आगे अध्ययन में रुचि नहीं रखती। मां-बाप भी मासिक धर्म शुरू होते ही लड़की पर तिरछी नज़र रखते हैं तथा उसकी जल्द शादी के इंतजाम में लग जाते हैं।

 विदित हो इस स्कूल में नर्सरी से लेकर कक्षा दस तक लगभग 600 छात्राएं पढ़ती हैं।जिन छात्राओं के साथ यह घृणित और पीड़ा दायक कृत्य हुआ वे सब नाबालिग थीं। इसीलिए दोनों गिरफ्तार महिलाओं पर पास्को एक्ट के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। यह किशोर होती लड़कियों को भयातुर करने वाला मामला है।इसका उनके नाज़ुक मन पर क्या असर होगा मनोविज्ञानी ही बता पाएंगे लेकिन इससे छात्राएं गहरे तनाव और अवसाद में होंगी। क्योंकि ऐसी बात जिसकी बात वे जुबां पर लाने में सकुचाती हैं वह बात जब सार्वजनिक हुई होगी तो उन पर निश्चित कहर बरपा होगा।

आइए इस नाजुक और चिंताजनक सवाल पर छात्राओं को जागरूक करने की पहल की जाए। ताकि वे उसे संकोच और शर्म का विषय ना समझें। मासिक धर्म प्रक्रिया पर गर्व महसूस करें और इसे सहजता से लेते हुए इसे जीवन में शामिल करें और तनाव मुक्त रहें उनके लिए  स्कूल, दफ्तर, हर काम की जगह सैनिटरी नेपकिन की नि: शुल्क उपलब्धता होनी चाहिए ।इस विषय पर खुलकर बहस होनी चाहिए ताकि बच्चियों को ऐसे वक्त में शर्मिंदा ना होना पड़े।

हालांकि उक्त घटना को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता है किंतु ऐसी स्थितियों का डटकर सामना करने की मानसिक तैयारी होनी चाहिए। यह दायित्व मां के साथ पिता का भी हो तभी जाकर यह अपराध जैसी भावना ओढ़े लड़की को मजबूती मिलेगी। एक दीवार पर लहू के दाग़ देखकर उत्तेजित प्राचार्य पर कठोरतम कार्यवाही होनी चाहिए। जबकि वे खुद इस स्थिति में भी कभी रहीं होंगी इसके बावजूद यह आपत्तिजनक काम किया। यह शर्मसार करने वाला कृत्य है। समाज में महिलाएं ही जब बच्चियों के साथ अपमान जनक व्यवहार करेंगी तो उन्हें संरक्षण भला कौन देगा?

Ramswaroop Mantri

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