डॉ. विकास मानव
सभी भावों का राजा काम है। इस राजा का निवास स्थान है, सप्तम भाव। यहाँ यह शेषषय्या पर सोता है। इसके नाभिकमल पर विद्यमान ब्रह्मा सृष्टि करते-करते बूढ़ा होकर मर जाता है पर उस शक्ति को नहीं जान पाता जिससे वह सृष्टि रचता है। यह शक्ति काम है। इसका कार्य रति है। जहाँ काम है वहाँ रति।
रति और काम, बाहर से दो हैं और भीतर से एक हैं। बायें नासा छिद्र में रति नाचती है। दायें नासा छिद्र में काम ताल ठोंकता है। ये दोनों नासा छिद्रों में अलग-अलग हैं। इन छिद्रों से बाहर और भीतर एक हैं। क्योंकि दोनों छिद्र आगे चल कर एक में मिलकर श्वासनली बन जाते हैं। कण्ठ इनका मिलन स्थल है। छिद्रों के बाहर ये आकाश में मिलते हैं। रति चन्द्र है। काम सूर्य है। चन्द्र स्त्री है। सूर्य पुरुष है। इसे हम यों भी कह सकते हैं- जहाँ सूर्य और चन्द्र हैं, वह नाक है।१. नाक = स्वर्ग/द्युलोक/आकाश।
२. नासिका घ्राणेन्द्रिय/ श्वसन द्वार ।
इस नाक में, चन्द्र स्वर एवं सूर्य स्वर निरन्तर रहते हैं। उस नाक में, चन्द्र ग्रह एवं सूर्य ग्रह सतत विराजते हैं। चन्द्रस्वर/ चन्द्र ग्रह = स्त्री/ रति।
सूर्यस्वर/ सूर्य ग्रह = पुरुष / काम।
ये दोनों स्वर सहबासी है ये दोनों यह भी सहवासी हैं। इससे सिद्ध हुआ श्री और पुरुष सहवासी हैं। बिना स्त्री के पुरुष नहीं रह सकता तथा बिना पुरुष के स्त्री नहीं रह सकती।
यही कारण है कि दोनों प्रेम के बन्धन में पड़ते हैं, विवाह करते हैं। जैसे सूर्य और चन्द्र स्वर्ग में बिहार करते हैं, जैसे सूर्य और चन्द्र स्वर नाक (स्वर्ग) में संगम करते हैं, उसी प्रकार स्त्री और पुरुष परस्पर प्रेम सूत्र से बँधकर / विवाह कर अपने जीवन को स्वर्ग बनाते हैं।
आकाश में कोई एक यह (सूर्य वा चन्द्र में से) हो, दूसरा न हो तो प्रलय का ताण्डव होता है, दुःख का सागर हिलोरें लेता है।
इसी भाँति नाक रूपी व्योम में कोई एक स्वर (सूर्य) वा चन्द्र में से) चले तो एक मास में व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, यह शरीर प्राणहीन हो जाता है। ऐसे ही विवाहित स्त्री पुरुष एक स्थान पर साथ-साथ न रहें तो उनके जीवन में विषाद के बादल घिरने लगते हैं। ये अपने अपने शोकरूपी उष्ण जल से इन्हें भिगोते रहते हैं।
इसका अर्थ हुआ-सुख (स्वर्ग) के लिये स्त्री-पुरुष का साथ-साथ रहना अनिवार्य है। इस साथ रहने की प्रक्रिया में दोनों में से जब कोई (स्त्री वा पुरुष) व्यवधान उपस्थित करता है तो परस्पर लट्ठमल, मुक्केबाजी, पटकी-पटका, मारा-मारी, न्यायालयी भिडन्त, गाली-गलौज, आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेला जाता है। मंगल शनि राहु सूर्यये चारयह इस खेल के सूत्रधार हैं। ये जब सप्तम भाव बिगाड़ते हैं, युति वा दृष्टि द्वारा तो दाम्पत्य जीवन में विस्फोट होता है, कँपकँपी होती है, उथल पुथल होता है, क्रन्दन होता है, आसूं की नदी बहती है।
ऐसा कोई पुरुष नहीं, जो बिना स्त्री के रहता हो। ऐसी कोई स्त्री नहीं जो बिना पुरुष के जीती हो। किसी की काया से विपरीत लिंगी चिपका होता है तो किसी की कल्पना में उसका वास होता है। किन्तु वञ्चित कोई नहीं है।
यह प्राकृतिक आवश्यकता है। जब कोई स्त्री के तन को छोड़कर वन में जाता है तो इसी उसके मन में आकर रहती है। स्त्री से छुटकारा कहाँ ? पुरुष के मन में स्त्री दो रूपों में रहती है-प्रेम वा तथा घृणा। ऐसे ही स्त्री के मन में भी पुरुष का निवास प्रेम वा घृणा का प्रतिफल होता है।
ये दोनों भाव श्रृंगार एवं वैराग्यमयी कृतियों के रूप में प्रकट होते हैं। जो इन दोनों भावों से परे हैं, उदासीन हैं, उस की कृति में न श्रृंगार होगा न वैराग्य होगा। फिर क्या होगा ? शान्त रस. आत्म प्रकाश, परमात्मानुभूति, निरपेक्ष सुख, शाश्वत आनन्द, समाधि उदासीन स्त्री/पुरुष न तो स्वर्ग में रहते हैं, न नर्क में ही इनका निवास इन दोनों से परे होता है।
यह द्वन्द्व मुक्त स्थान है। यह गोलोक है। यह परमधाम है। इसका वर्णन करते हुए उपनिषद् संकेत करता है :
‘न नेमा तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं विद्युतो भान्ति कुतोऽयमाग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥’
-श्वेताश्वतरोपनिषद् (६ । १४)
वहाँ न तो सूर्य प्रकाशता है, न चन्द्र और तारागण प्रकाश फैलाते हैं, न बिजली चमकती है तो लौकिक अग्नि कैसे प्रकाशित हो सकता है। (क्योंकि) उसी के प्रकाशित होने से ये सब प्रकाशित होते हैं। उसके प्रकाश से यह सारा जगत् प्रकाशित होता है।
इसी तथ्य का समर्थन श्रीमद् भगवद्गीता में भी हुआ है :
“न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावक।
यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद्धराम परमं मम॥”
~गीता (१५।६)
वहाँ जाकर कोई वापस नहीं लौटता। उदासीन मनोदशा ही वह स्थान है। वहाँ कोई प्रकाश नहीं होता का अर्थ है- वह स्थिति अकामता की है। अकामता = स्त्री को पुरुष की चाह नहीं तथा पुरुष को स्त्री को इच्छा नहीं। ऐसे उदासीन स्त्री/पुरुष धन्य हैं। गोलोक = गो (ज्ञान) + लोक (संसार) = ज्ञानावस्था। मन की एक अवस्था जिसमें मन अपने स्वभाव चाञ्चाल्य को छोड़कर स्थिर हो जाता है, को गोलोक कहते हैं।
गोलोकवासी अर्थात् ज्ञानी में काम कहाँ ? काम नहीं तो रति कहाँ ? ऐसा ज्ञानी ही उदासीन कहलाता है। उदासीन सप्तम भाव से परे होता है। रागी और विरागी के सप्तम भाव का विचार होता है। रागी के हृदय में रति काम महोत्सव की नित्य नवीन तैयारियाँ होती रहती हैं। विरागी के हृदय में रति काम महोत्सव के छेदन की विक्रिया सतत चलती रहती है। उदासीन का हृदय शून्य होता है।
उदासीन होना कितना कठिन है । गृहस्थ दम्पत्ति रति-काम-रूप होते हैं। इन दोनों (स्त्री-पुरुष) का संमिलन ही रति काम महोत्सव है। कन्या द्वारा पति के वरण से इस रतिकामोत्सव का प्रारंभ होता है। कन्या को पति की प्राप्ति कैसे होती है ?
वेद कहता है :
“ब्रह्मचर्येण कन्या युवानम् विन्दते पतिम्।
अनड्वान् ब्रह्मचर्येण अश्वो पास जिगीर्षति।।”
~अथर्ववेद (११ । ५ । १८)
ब्रह्मचर्येण = ब्रह्मचर्यया।[ ब्रह्मचर्य (पुंलिंग) बाचर्या (स्त्री लिंग)ब्रह्म= बड़ा महान् श्रेष्ठ, उत्तम। चर्य (चर्या) = मार्ग, व्यवहार, चाल, चलन, आचरण, अभ्यास, अनुष्ठान, व्रत, तप । इस प्रकार, ब्रह्मचर्येण पद का अर्थ हुआ श्रेष्ठ आचरण के द्वारा, महान् व्रत तप से, उत्तम चालचलन से, बड़े मार्ग पर चलने से, बड़े मार्ग को तय कर अर्थात् लम्बी प्रतीक्षा के बाद दीर्घकालिक धैर्य धारण करने से (के बाद)।
विन्दते = (विद तुदादि आत्मने प्र.पु. एक व) प्राप्त करती है। अनवान् साँड़ बैल् । अश्व = घोड़ा। घासम् = घास (भोजन)। जिगीषति = (गृ तुदादि परस्मै सनन्त निगरणे) निगलना चाहता है।
मन्त्रार्थ-
जैसे साँड़ वा घोड़ा दूर दूर तक जाने लम्बा रास्ता अपनाने से अनेकों प्रकार की सुन्दर घासों को देख कर उनको खाने चरने की इच्छा करता है, उसी प्रकार कन्या धैर्यपूर्वक विवाह हेतु लम्बे पथ पर चलती है तो उसे इच्छित वर/ पति की प्राप्ति होती है। ब्रह्मचर्य शब्द का प्रयोग साँड घोड़ा के सन्दर्भ में जैसे हुआ है, वैसे ही कन्या के परिप्रेक्षय में हुआ है। साँड़ वा घोड़ा जहाँ बंधा होता है वहाँ सीमित घास होती है।
निकट की अनुपयुक्त घास भी बाध्यता के कारण चरनी होती है। यदि इसे छोड़कर हाँक दिया जाय तो वह लम्बा पथ चलेगा। कहीं न कहीं उसे सुन्दर और अच्छी पास मिलेगी, जिसे वह चरेगा, खायेगा और इससे प्रसन्न वा स्वस्थ रहेगा। कन्या के लिये यही दृष्टान्त है।
कन्या (कन्या का पिता वा अभिभावक, संरक्षक) वर को ढूंढने के लिये दूर दूर तक जाते हैं। गोत्र से बाहर सु-कुल के युवानों में से कन्या के लिये किसी एक का चयन करते हैं। कन्या इस लम्बे अन्तराल को धैर्य के साथ पार करती है और तब अभीष्ट वर पति पाने में वह सफल होती है। एक देशीय/ क्षेत्रीय वर तक सीमित रहना अब्रह्मचर्य (लघुचर्य) है। वेद इसका समर्थन नहीं करता । ब्रह्मचर्य की परिधि बहुदेशीय/ दूरदेशीय, बहुकालीय/ दीर्घकालिक है।
धीमा चलो, लम्बा चलो, देख कर चलो, और तब चयन करो यह सूत्र है ब्रह्मचर्य का जब ब्रह्मचर्य विधि से कन्या को पति मिल जाय कन्या का विवाह हो जाय तो रति-कर्म/काम-क्रिया/ रति कामोत्सव होगा ही। हर युवान युवती का यह प्रेय है।
सूर्य ब्रह्मचारी है। यह सर्वविदित है कि सूर्य की पत्नी संध्या है। पूर्वी क्षितिज से पश्चिमी क्षितिज का बड़ा लम्बा आकाशीय पथ पार करने से इसे संध्या की प्राप्ति होती है। संध्या को पाकर सूर्य रातभर उसके साथ रति उत्सव करता है। रात्र्यन्त में संध्या रूप उषा से अलग होकर पुनः ब्रह्मचर्य में प्रवृत्त होता है। यह क्रम निरन्तर चल रहा है। संध्या के दो रूप हैं।
१. सायं / पश्चिमी संध्या।
२. पूर्वी / प्रातः संध्या।
पश्चिमी संध्या को संज्ञा तथा पूर्वी संध्या को उषा कहते हैं। रात, रति उत्सव के लिये बनी है। रात में रतिकारक शुक्र तथा रति उदीपक चन्द्र बनवान होता है। दिन ब्रह्मचर्य के लिये बना है। मैथुन मद्धिम एवं सौम्य प्रकाश में प्रशस्त होता है। दिन का तीक्ष्ण प्रकाश इसके लिये उपयुक्त नहीं। चन्द्रतुल्य वा शुक्रतुल्य प्रकाश वाला रात्रिकाल इस रति कामोत्सव के लिये सर्वथा ग्राह्य है। सूर्य संज्ञा प्रणय मिलन की रात में सभी लोग अपना मैथुनोत्सव मनाते हैं। कृष्ण ने इसी काल में गोपियों के साथ यमुनातट पर रास रची थी।
【ब्रह्मचर्य महोद्योग । = महाप्रयत्न ।सूर्य महोद्योगी है।】
सूर्य आत्मकारक / लग्नकारक है। अतः हरजातक को अतिउद्योगशील होना चाहिये। इससे पत्नी मिलती है, जिससे रति की जाती है।
सूर्य जब तक सप्तम भाव में नहीं आता, तब तक उसे संध्या रूपी पत्नी से मिलने का अवसर नहीं मिलता। इसी प्रकार जातक जब तक अग्नि के सात फेरे (चक्कर) नहीं करता अर्थात् सप्तम स्थान में नहीं आता, तब तक उसे पत्नी नहीं मिलती। सप्तम भाव में सूर्य सप्तम में संध्या (संज्ञा)। जातक द्वारा अग्नि (सूर्य) के सात फेरे जातक का सप्तम में पहुंचना = पत्नी की प्राप्ति।
इससे सिद्ध हुआ बिना ब्रह्मचर्य के रतिकामोत्सव नहीं होता। सूर्य हम सबका आदर्श है। वह पत्नीवान् है, पुत्रवान् है, पुत्रवान् है सूर्य होना ही गृहस्थारंभ का परिचयपत्र प्रवेश पत्र है।
युवती पत्नी को पाकर युवान पति कहता है :
“अमोऽहमस्मि सात्वं सामाहमस्म्युक् त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वं।
ताविह संभवाव प्रजामा जनयावहै।”
~अथर्ववेद (१४ । २ । ७१)
[अमः अहम् अस्मि सा त्वम्। साम अहम् अस्मि ऋक् त्वम्। द्यौः अहम् पृथिवी त्वम्। तौ इह सं-भवाव प्रजाम् आ-जनयावहै ॥]
आमः = अम् (गतौ भ्वादि पर, अमति) + घञ्। = गति । सामूस आम (अम + अणु स्वार्थे) गतियुक्त गीत।
ऋक् = ऋ (गतौ भ्वादि पर ऋच्छति) + क्विप्। = गति।
आ जनयावहै = आङपूर्वक जन् धातु आत्मने लोट् उ.पु. द्विव. । = सब ओर से पैदा करें।
मन्त्रार्थ-
रतिमहोत्सव को पूर्वपीठिका पर पति अपनी पत्नी को स्वबाहुपाश से बाँधते हुए कहता है-मैं गति हुँ, तम (भी) वही (गति) हो। यहाँ गति=गो= ज्ञान। पति अपने को ज्ञानस्वरूप कहता है। उसकी पत्नी जड़ कैसे हो सकती है। अतः वह उसे भी ज्ञानस्वरूपा कहता है। यहाँ पति अपने ही समान पत्नी को मानता है। दोनों में अभेद है, गुण साम्य है। कोई किसी से न तो बड़ा है, न छोटा है।
तात्पर्य यह है कि पति की दृष्टि में पत्नी तत्सम है। पुनः वह कहता है-मैं साम हूँ, तुम ऋक हो। यहाँ साम और में किञ्चिद् अन्तर है; गुणवत्ता को दृष्टि से नहीं अपितु प्राकट्य की दृष्टि से उतार-चढ़ाव एवं लय के साथ जो मन्त्र गाया जाता है, संगीत बद्ध किया ताता है, वह साम है जो मन्त्र गाया नहीं जाता, भलीभांति बोला कहा वा पढ़ा जाता है, वह ऋ है। गति तो दोनों में है। ऋ अक्षीय है जबकि साम परिवृत्तीय है।
ऋक् में विस्तार नहीं है, साम में विस्तार है। पृथ्वी अपनी अक्ष पर स्थिर रह कर घूमती है। इस कारण यह ऋ है। यह पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती हुई सूर्य के चारों ओर घूमती है। इससे यह साम है। साम में परिवृत्तता है, ऋक में विन्दुता है। पुरुष साम है, का अर्थ है वह घर के बाहर दूर-दूर तक अपने क्रिया कलाप में व्यस्त रहता है। स्त्रीऋ है, का अर्थ है वह घर के भीतर उसकी चाहार दीवारी में बन्द रह कर गृहस्थी के कार्यों का सम्पादन करती है।
इस सन्दर्भ में में विषय से थोड़ा हटकर अथर्व और यजुः पर विचार करता हूँ। जो हिले डुले नहीं एक स्थान पर स्थिर रहे, अथर्व है। न धरति स अथर्वः थर् (कम्पने गतौ वा) + वन् धर्व, कम्पनशील कम्पायमान गतिमान असहिष्णु, धैर्यहीन। नञ् + धर्व अथर्व सुस्थित सुस्थिर अडिग सहिष्णु धैर्यशील। पृथ्वी अथर्वा है। सूर्य अथर्व है। शीयमान पुरुष वा स्त्री अथर्व / अथर्वा है। यज् (त्यागे हवने च) + उसि = यजुस् जो प्रसन्नतापूर्वक त्यागता / दान करता है वा हवन करता है आहुति देता है, अन्न वीर्यादि की वह यजुः है। पृथ्वी यजुः है।
सूर्य यजुः है। स्त्री और पुरुष भी यजुः हैं। सूर्य प्रकाश देता है। पृथ्वी अन्न देती है। पुरुष वीर्य देता है। स्त्री आनन्द देती है। कहने का तात्पर्य है कि ऋक् यजुः साम और अथर्व ये चारों साथ-साथ हर देश काल पात्र में रहते हैं, प्रकट वा अप्रकट रूप से पति तीसरी बार कहता है- मैं आकाश हूँ, तुम पृथिवी हो। पृथिवी के चारों ओर आकाश है। पृथिवी आकाश में है। जब पुरुष अपनी स्त्री को अंक में बैठा कर बाहों में भर कर चारों तरफ से उसे आच्छादित कर लेता है तो मानो वह आकाश है विशाल है।
स्त्री संकुचित होकर पुरुष के शारीरिक आधिपत्य में होती है तथा वह उसके दबाव को सहन करती है तो मानो वह क्षमा पृथिवी है।
चौथी बार पुरुष कहता है :
‘तौ इह संभवाव’ हम दोनों इस स्थान में / इस समय में इस जीवन में एक साथ रहें तथा ‘प्रजाम् आजनयाव है’ सन्तान को उत्पन्न करें-प्रजावान् हो। जब तक स्त्री पुरुष साथ-साथ एक देशकाल का सेवन नहीं करेंगे तब तक प्रजोत्पत्ति संभव नहीं।
इसलिये सन्तानोपादन हेतु स्त्री पुरुष को परस्पर प्रीतिमय वातावरण में रहते हुए जीवन यापन करना होगा।





