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शिवपाल भी हो सकते हैं नेता प्रतिपक्ष? क्या है अखिलेश यादव की तैयारी

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समाजवादी पार्टी पिछली बार से ज्यादा मजबूत होकर विधानसभा में दस्तक देने जा रही है। उसकी सीटें करीब ढाई गुना बढ़ चुकी हैं। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका बढ़ेगी।

पिछली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे राम गोविंद चौधरी इस बार बलिया की बांसडीह सीट से चुनाव हार चुके हैं। अब किसी नए नेता को प्रतिपक्ष का नेता बनाया जाना तय है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा रहता है। कैबिनेट मंत्री की ही तरह उसे सारी सुविधाएं भी मुहैया होती हैं।

up election result 2022: शिवपाल भी हो सकते हैं नेता प्रतिपक्ष? क्या है अखिलेश यादव की तैयारी, जानिये रेस में कौन-कौन शामिल

अखिलेश यादव खुद पहली बार विधानसभा का चुनाव जीते हैं लेकिन सरकार नहीं बनने से वह करहल से विधायक की जगह आजमगढ़ से सांसद ही बने रहना चाहेंगे। माना जा रहा है कि वह विधानसभा की सीट से इस्तीफा दे देंगे। 

अखिलेश के बाद सपा के जीते नेताओं पर गौर करें तो इस बार कई दिग्गज चुनाव जीतकर आये हैं। ऐसे में सपा के लिए संकट और भी बड़ा हो गया है। वैसे तो सपा में इस समय अखिलेश के बाद सबसे बड़ा नाम चाचा शिवपाल यादव का ही है। परिवारवाद के आरोपों के साथ ही कई ऐसे कारण हैं जिसकी वजह से शायद शिवपाल के नाम पर चर्चा न हो।

अखिलेश की नजरें अब लोकसभा चुनाव पर होंगी। ऐसे में नए नाम से कई राजनीतिक संदेश देने की भी अखिलेश यादव की कोशिश होगी। बसपा के वोटों में गिरावट और सपा के वोटों में दस प्रतिशत की बढ़ोतरी बताती है कि मायावती का वोट बैंक अखिलेश की तरफ आया है। बसपा से सपा में आए कई कद्दावर नेता चुनाव भी जीत चुके हैं। रामअचल राजभर, लालजी वर्मा और इंद्रजीत सरोज ऐसे ही नाम हैं। 

राम अचल राजभर
अम्बेडकरनगर से जीते राम अचल राजभर पुराने बसपाई है लेकिन समाजवादी पार्टी में आस्था दिखाई और जीत भी गये। पिछड़ों की गोलबन्दी के काम आ सकते हैं। कमी यही है कि वह सपा का पुराना काडर नहीं बल्कि बसपा से आए हैं।

लालजी वर्मा
इनकी कहानी भी राम अचल राजभर जैसी ही है। अंतर बस इतना है कि ये पार्टी से निकाले जाने से पहले विधानसभा में बसपा विधानमण्डल दल के नेता थे। यानी विधानसभा में पार्टी के अगुआ। कमी यही है कि ये भी पुराने बसपाई है, लेकिन पिछड़ों की गोलबन्दी के काम आ सकते हैं।

इन्द्रजीत सरोज
कौशाम्बी की मंझनपुर सीट से जीते इन्द्रजीत सरोज सूबे के बड़े दलित लीडर रहे हैं। वैसे तो ये भी पुराने बसपाई हैं, लेकिन चुनाव से बहुत पहले (चार साल पहले) ही सपा में आ गये थे। मायावती के बिखरते कुनबे को सपा की ओर मोड़ने में सहायक हो सकते हैं। प्रखर वक्ता भी हैं और फायर ब्राण्ड भी। राम गोविन्द चौधरी के तीखे तेवरों की कमी पूरी हो सकती है।

ओम प्रकाश सिंह
पुराने समाजवादी नेता हैं। गाजीपुर की जमानियां सीट से विधायक बने हैं। वाराणसी से सटी गाजीपुर सीट पर सपा ने क्लीन स्वीप किया है। अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री थे। छात्र आंदोलन से ओम प्रकाश सिंह की राजनीति शुरू हुई थी और जयप्रकाश नारायण के संघर्ष में भी शामिल रहे। जमीनी नेता हैं। 

रविदास मेहरोत्रा
लखनऊ मध्य सीट से जीते रविदास मेहरोत्रा भी नेता विरोधी दल की रेस में आगे दिख रहे हैं। कड़े तेवर और संघर्षों वाले नेता रहे हैं। कोरोना काल में भाजपा सरकार को जमकर घेर चुके हैं। नेता विरोधी दल बने तो भाजपा सरकार की घेरेबन्दी तगड़े से कर सकेंगे।

इसके अलावा माता प्रसाद पांडेय, जय प्रकाश अंचल और अवधेश प्रसाद जैसे नेता भी जीतकर आये हैं। मुस्लिम बिरादरी से शाहिद मंजूर, फरीद महफूज़ किदवई और महबूब अली जैसे नेता भी विधानसभा पहुंचे हैं। लेकिन इनकी संभावना ना के ही बराबर है। सॉफ्ट हिन्दुत्व वाली सपा ऐसा करने से बचेगी। 

Ramswaroop Mantri

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