मेरा कोना – विवेक मेहता –
शिक्षामंत्री देश सेवा में बहुत-बहुत व्यस्त रहते। अपने घर का काम देखने के लिए भी उनके पास समय नहीं होता। देश सेवा के लिए इतनी कुर्बानी तो देना ही पड़ती है। घर कामों के लिए वैसे उनके पास अमचे-चमचों की कमी नहीं रहती। पैसों की भी कोई कमी रहती नहीं। कई नदियां बह कर सागर में जो मिलती रहती।
वे अपना बंगला बन रहे थे। कई बार अपने बंगले का निरीक्षण करने की उनकी इच्छा जोर मार जाती। देश सेवा में व्यस्त रहने के कारण समय निकालना थोड़ा मुश्किल होता। इस बार साप्ताहिक दौरे पर वे अपने विधानसभा क्षेत्र में आए तो बन रहें बंगले की प्रगति देखने निकल पड़ें। काफिला साथ था। व्यक्तिगत काम था इसलिए काफिला थोड़ा छोटा था। काम का निरीक्षण पूरा होता इसके पहले ही फोन बज उठा। भारी शरीर था, ज्यादा देर खड़े नहीं रह सकते। इशारा किया तो लोग कुर्सी लाने के लिए भागें। कुर्सी पर बैठकर वे फोन पर बातें करते-करते काम पर नजरें भी दौड़ाने लगें। फोन पर चर्चा समाप्त होते ही उन्होंने अपने उस आदमी को आवाज लगाई जो बंगले का कंस्ट्रक्शन का काम देख रहा था। बोले- ‘भोस..के रामा, मेरा मकान गिरवायेगा क्या? तेरी इच्छा है कि मैं सोते-सोते ही ऊपर पहुंच जाऊं! ऐसी भी क्या दुश्मनी है? इतने भी पैसे क्या बचाने ?’
‘ मैं समझा नहीं भैया जी।’- घबरा कर रामा बोला।
‘मादर…, मजदूर से ही कारीगर का काम करवा रहा है और बोलता है कि समझा नहीं। देखो-देखो, वह मजदूर माल भी मिल रहा है, ईटें भी ले जा रहा है, और चुनाई भी कर रहा है। ऐसे काम होता है!’
मंत्री जी जब जनता के बीच में नहीं होते तो वे सज्जनता का चोला उतार फेंकते। गालियों के झरने उनके मुंह से बहना आम बात थी। इसका कोई बुरा भी नहीं मानता। मंत्री जी के इस वक्तव्य के बाद लोग रामा को घूरने लगें। कुछ लोगों के मन में लड्डू फूटने लगें। रामा तो अब गया काम से,अब उनकी प्रगति के रास्ते खुल जाएंगे।
‘भैया जी, ऐसा नहीं है। यह तो कारीगर ही है। आज मजदूर नहीं मिला इसलिए यह मजदूर का काम भी कर रहा है।’
‘गां…., रुपया देकर चार आने का काम ले रहा हैं। चूति…. समझा है क्या। देश चलता हूं और ये साला मुझे ही चला रहा है।’- मंत्री जी छटक गए।
‘भैया जी, रामा आपके साथ रह कर बहुत ज्यादा सीख गया। सरकार, विभाग में पैसे बचाने के लिए क्लर्कों की भर्ती नहीं करती। लोग रिटायर हो जाते हैं तो ऑफिस में सीनियर लेक्चर, प्राचार्य से ही क्लर्क का काम भी सरकार करवाती हैं। रामा भी ऐसा ही कर रहा है। मजदूर का काम कारीगर से निकलवा रहा।’ – उनका एक मुंह लगा बोला।
लोगों के ठहाके गूंज उठे। हवा में तैरती गालियां बूमरैंग हो चुकी थी। मंत्री जी क्या कहते! बात बात में कहने वाले ने उनकी सरकारी नीतियों पर गहरी चोट कर दी थी। चोट गहरी थी तो वे भी नेता थे। मोटी चमड़ी वाले। मुखौटा ओढ़ कर मंत्री जी भी ठहाकों में शामिल हो गए।





