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शिक्षा का सिकुड़ता आकाश: बजट, व्यवस्था और भारत का भविष्य

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-तेजपाल सिंह ‘तेज

        भारत की पहचान कभी उसकी सेनाओं या उसके बाजारों से नहीं बनी, बल्कि गुरुकुलों, मदरसों, पाठशालाओं और विश्वविद्यालयों से बनी। यह वही देश है जहाँ नालंदा जलाया गया, तो सदियों तक अंधेरा छाया रहा—और यह भी वही देश है जहाँ संविधान ने शिक्षा को अधिकार का दर्जा दिया।  लेकिन आज, जब हर साल बजट का पिटारा खुलता है, तो सबसे पहले जो प्रश्न उठता है, वह यही होता है— क्या इस देश की शिक्षा अब भी सरकार की प्राथमिकता है?

बजट की भाषा और सत्ता की मंशा:

        काग़ज़ पर देखें तो शिक्षा का बजट “घटाया नहीं गया” कहा जाता है। लेकिन वास्तविकता केवल कुल राशि से नहीं, उसके प्रभाव से तय होती है

2024 के बाद से शिक्षा के बजट में जो प्रवृत्ति दिखती है, वह साफ है—

·       शिक्षा का कुल सरकारी व्यय में प्रतिशत लगातार सिमटा है

·       सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में शिक्षा पर खर्च आज भी 6% के संवैधानिक-नैतिक लक्ष्य से बहुत नीचे है

·       प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की योजनाओं में नाम बदलते हैं, ढाँचे बदलते हैं, लेकिन ज़मीन वही सूखी रहती है

सरकार जब कहती है—“हमने राशि बढ़ाई है”, तो सवाल उठता है—क्या बढ़ी हुई महंगाई, बढ़ती आबादी और डिजिटल अंतराल के अनुपात में भी?

सबसे पहला आघात  : प्राथमिक शिक्षा:

        यदि किसी राष्ट्र को कमजोर करना हो, तो उसकी सीमाएँ नहीं—उसके प्राथमिक स्कूल कमजोर कर दो।

पिछले कुछ वर्षों में:

·       हज़ारों सरकारी प्राथमिक स्कूल “कम नामांकन” के नाम पर या तो बंद किए गए या पास के स्कूलों में “मर्ज” कर दिए गए

·       गाँवों और आदिवासी इलाकों में  बच्चों को अब 3–5 किलोमीटर दूर स्कूल जाना पड़ रहा है परिणामस्वरूप—

·       ड्रॉप-आउट बढ़े

·       खासकर लड़कियां, दलित, आदिवासी और गरीब बच्चे
सबसे पहले शिक्षा से बाहर हुए

        यह कोई संयोग नहीं है। यह वही वर्ग है, जिसकी शिक्षा से सत्ता को कभी सहजता नहीं रही

शिक्षा का स्तर: बढ़ोतरी या भ्रम?

        सरकारी रिपोर्ट कहती हैं—“नामांकन बढ़ा है, स्कूल खुले हैं, डिजिटल शिक्षा आई है।” लेकिन जमीनी सच कुछ और बोलता है—

·       कक्षा 5 का बच्चा आज भी कक्षा 2 की भाषा और गणित से जूझ रहा है

·       शिक्षक हैं, लेकिन—प्रशिक्षित नहीं; स्थायी नहीं; कई जगह एक शिक्षक, पाँच कक्षाएं; स्मार्ट क्लास और टैबलेट हैं, लेकिन बिजली, नेटवर्क और भाषा की समझ नहीं। शिक्षा का स्तर काग़ज़ पर ऊपर गया है, लेकिन सीखने की क्षमता नीचे खिसकी है।

उच्च शिक्षा: अवसर या विशेषाधिकार?

विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में तस्वीर और भी चिंताजनक है—

·       सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को मिलने वाला अनुदान धीरे-धीरे घटाया गया

·       फीस बढ़ी, छात्रवृत्तियां सिमटी

·       शोध के लिए धन कम, लेकिन कॉरपोरेट सहयोग का शोर ज़्यादा

इसका सीधा अर्थ है—उच्च शिक्षा अब अधिकार नहीं, विशेषाधिकार बनती जा रही है। और विशेषाधिकार—हमेशा वही लेता है जिसके पास पहले से साधन होते हैं।

हाशियाकृत समाज पर सीधा प्रहार:

        जब शिक्षा का बजट दबाव में आता है, तो उसका पहला शिकार होते हैं—

·       SC/ST छात्रवृत्तियां

·       अल्पसंख्यक शैक्षणिक योजनाएँ

·       दूरदराज़ इलाकों के आवासीय विद्यालय

·       विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के कार्यक्रम

        इन कटौतियों का मतलब साफ़ है—जो पहले से पीछे है, उसे और पीछे धकेल देना। यह केवल आर्थिक निर्णय नहीं, यह सामाजिक पुनर्संरचना है—
जहाँ बराबरी नहीं, अनुकूलन अपेक्षित है।

शिक्षा और लोकतंत्र का रिश्ता:

        शिक्षा कमजोर होती है, तो सवाल पूछने की क्षमता कमजोर होती है। और जब सवाल कम होते हैं— तो लोकतंत्र सिर्फ एक औपचारिकता रह जाता है।

·       आलोचनात्मक सोच की जगह अनुरूपता

·       बहस की जगह पाठ्य-स्मरण

·       विवेक की जगह आज्ञाकारिता

कमज़ोर शिक्षा, मज़बूत सत्ता के लिए सबसे सुरक्षित जमीन होती है।”

भविष्य-दृष्टि: किस भारत की नींव रखी जा रही है?

        आज का बच्चा—2035 का नागरिक होगा। सवाल यह नहीं कि—

·       कितने AI कोर्स शुरू हुए

·       कितने डिजिटल प्लेटफॉर्म बने

सवाल यह है—

·       क्या वह बच्चा सोच पाएगा

·       क्या वह असहमति जता पाएगा

·        क्या वह बराबरी की भाषा बोलेगा?

        यदि शिक्षा केवल कौशल तक सीमित रही, और संवेदना  से कटती चली गई— तो हम तकनीशियन तो पैदा करेंगे, नागरिक नहीं।

निष्कर्ष: बजट से आगे की लड़ाई:

        शिक्षा को बचाने की लड़ाई केवल बजट बढ़ाने की नहीं है, बल्कि—

·       प्राथमिक स्कूल को केंद्र में लाने की

·       शिक्षक को सम्मान देने की

·       हाशिए के बच्चे को प्राथमिकता देने की

·       और शिक्षा को बाजार नहीं, लोकतांत्रिक अधिकार मानने की लड़ाई है

        यदि यह नहीं हुआ, तो आने वाले वर्षों में हम यह नहीं पूछेंगे—“शिक्षा का बजट कितना है?” बल्कि यह पूछेंगे—“क्या इस देश में शिक्षा बची भी है?”

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Ramswaroop Mantri

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