प्रशांत द्विवेदी
हॉलीवुड में चरम प्रसिद्धि बटोर कर अपने वतन लौट कर आया हुआ एक शख़्स लंदन के एक महँगे होटल के लग्ज़री सुइट में सूटेड-बूटेड बैठा है। वह अपनी फ़िल्म ‘सिटी लाइट्स’ के प्रीमियर के लिए आया है। अब वह राजनेताओं से राजनीति की चर्चा में रुचि भी लेने लगा है। उसे किसी ने बताया कि एक ‘अधनंगा फ़कीर’ भी संयोग से इधर लंदन में ही है। आप उससे मिल लीजिये इससे आपकी फ़िल्म को प्रमोशन भी मिलेगा। वह सेलेब्रिटी अपने होटेल की बालकनी से निकल कर देखता है और लंदन की हवा में भी उस ‘अधनंगे फ़कीर’ की उपस्थिति महसूस करता है। वह देखता है कि कैसे पूरा लन्दन उसका जय-जयकार कर रहा था। लाठी टेकते उस कृशकाय महामानव के सामने वह ख़ुद को बहुत ज़्यादा असहज पाता है। लंदन के एक महँगे होटल के लग्ज़री सुइट में सूटेड-बूटेड हँसी का सौदागर एक ‘अधनंगे फ़कीर’ से आख़िर क्यों मिलना चाह रहा था ? वही फ़कीर जिसे चर्चिल जेल में डालना चाहता था, लेकिन उस सेलेब्रिटी ने कहा कि एक फ़कीर को जेल में डालोगे दूसरा फ़कीर पैदा हो जाएगा।
अंततः उस सेलेब्रिटी ने ‘अधनंगे फ़कीर’ को पोस्टकार्ड लिख दिया। लेकिन ‘अधनंगा फ़कीर’ उस सेलेब्रिटी को जानता ही नहीं था इसलिए जब उस सेलेब्रिटी ने ‘अधनंगे फ़कीर’ के पास मिलने का संदेश पहुंचाया तो ‘अधनंगे फ़कीर’ की पहली प्रतिक्रिया थी, ‘कौन हैं ये महाशय और करते क्या हैं?’’
इस प्रश्न से शुरू हुआ परिचय दोनों के बीच एक मुलाक़ात से मुकम्मल हुई।
वह सेलेब्रिटी था: पीड़ा का मूकनायक हास्य अभिनेता – चार्ली चैपलिन और वह ‘अधनंगा फ़कीर’ था: अहिंसा का महानायक गांधी जी ।।
इन दोनों की मुलाक़ात हुई लंदन के एक स्लम एरिया में। 22 सितंबर, 1931 की शाम : यह फ़ोटो तभी की है। इसकी एक छोटी सी रिपोर्ट गांधीजी के निजी सचिव महादेव देसाई ने ‘यंग इंडिया’ में छापी थी। लेकिन चैप्लिन ने बाद में इसका ज़िक्र अपनी ऑटोबायोग्राफ़ी में किया था।
असल में गांधी जी उस समय द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन आये थे और वे पूर्वी लंदन के एक पिछड़े इलाके में किंग्सली हॉल (अब गांधी फ़ाउंडेशन) में रुके थे। गांधी जी ने चार्ली चैपलिन से मुलाक़ात के लिए कोई होटेल न चूज़ कर लंदन के कैनिंग टाउन इलाके में, ईस्ट इंडिया डॉक रोड पर एक भारतीय डॉक्टर चुन्नीलाल कतियाल के छोटे से घर को चुना। डॉक्टर कतियाल ही लंदन में गांधी जी के मेज़बान थे।
शिष्टाचार बातचीत के बाद चार्ली चैपलिन ने अपना गला साफ़ करते हुए कहा, ‘मैं स्वाधीनता के लिए भारत के संघर्ष के साथ हूँ, पर आप मशीनों के ख़िलाफ़ क्यों हैं? उनसे तो दासता से मुक्ति मिलती है, काम जल्दी होता है और मनुष्य सुखी रहता है।”
गांधीजी ने मुस्कुराते हुए शांत स्वर में उन्हें अहिंसा से लेकर आजादी के संघर्ष का सार पेश कर दिया और अंधाधुंध मशीनीकरण के बजाय गांधीजी ने उन्हें ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘अपरिग्रह’ के सिद्धान्त को समझाया। गांधीजी ने आगे कहा कि हमें मशीन और ब्रिटिश, दोनों ने ही ग़ुलाम बना रखा है। इसलिए हम स्वदेशी और स्व-राज की बात करते हैं। हमें अपनी जीवन-शैली बचानी है।
चार्ली चैपलिन गांधी जी से इतना ज़्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने 1936 में एक फ़िल्म भी बना डाली, जिसका टाइटिल था ‘मॉर्डन टाइम्स’। इस फ़िल्म में उन्होंने ऊटपटांग अंधाधुंध मशीनीकरण के साइड इफैक्ट्स पर फ़ोकस किया था। एक तरह से चार्ली चैपलिन ने भी अपनी इस फ़िल्म में यही संदेश दिया कि ज़रूरत से ज्यादा मशीनों का चक्कर छोड़ो और आत्मनिर्भर बनो।
फिर बात करते-करते गांधी जी अचानक से रुक गए। और कहा कि माफ़ कीजिए, हमारी प्रार्थना का वक्त हो गया है, आप चाहें तो यहाँ रुक सकते हैं। चैपलिन रुक गए। सोफ़े पर बैठे हुए उन्होंने देखा: गांधीजी और पाँच अन्य भारतीय जन जमीन पर पालथी मार कर बैठ गए और “रघुपतिराघव राजा-राम, पतित-पावन सीता-राम” और “वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाणे रे” समवेत स्वर में गाने लगे।
बचपन में कोट-पैंट पहनने वाला लड़का आज धोती पहने अधनंगा फ़कीर है और बचपन में फटे-पुराने चीथड़े पहनने वाला लड़का आज सूटेड-बूटेड जेंटलमैन। यह उनकी नियति थी या उनकी च्वाइस ? लेकिन यह समय चक्र ज़रूर था।
चैपलिन ने उसी वक़्त महसूस कर लिया होगा कि उफ़्फ़! ब्रिटिश ने तो देर कर दी। अब तो दुनिया को हास्य के अलावा केवल अहिंसा, शांति और करुणा से ही जीता जा सकता है।
आगे, एक अखबार को दिए गए अपने इंटरव्यू चार्ली चैपलिन ने बताया था कि गांधीजी मेरी जिंदगी में मिलने वाले सभी व्यक्तियों में सबसे बड़े एंटरटेनर थे।
चार्ली चैपलिन का बचपन काफी मुश्किलों और ग़रीबी से भरा हुआ था। लंदन की एक झुग्गी झोपड़ी में रहने वाला अभागा चार्ली ! बेपरवाह और शराबी पिता के कारण जिसका बचपन बुरी तरह से तबाह हो गया था। चैपलिन की ग़रीब माँ पागलपन की शिकार हो गई थीं। इसका नतीज़ा यह हुआ कि चैपलिन को सात साल की उम्र में एक ही एक अनाथालय में जाना पड़ा। ग़ुरबत ने उनका स्कूल जाना भी बंद करवा दिया और 13 साल के चार्ली मज़बूरन मनोरंजन की दुनिया में आए।
चार्ली चैपलिन की बायोग्राफ़ी में एक लाइन कही जाती है, “कचरे से निकलकर रत्न तक पहुँचने की यह जीवन यात्रा हास्य में लिपटी एक करुण गाथा है।”
एक विश्व युद्ध झेल चुके और दूसरे विश्व युद्ध के कगार पर खड़ी दुनिया को चार्ली चैपलिन ने अपने हास्य से संभालने की कोशिश की थी।
भला हास्य और हिंसा का क्या साथ? हास्य सर्वाइव करेगा तो केवल शांति और अहिंसा के ही साथ। इसीलिए चार्ली और गांधी जी की यह फ़ोटो आज भी प्रासंगिक और ऐतिहासिक है। नफ़रतों वाली बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया के लिए आज चार्ली चैपलिन की जयन्ती पर इस फ़ोटो से कुछ सीख लेनी चाहिए।
फ़ोटो: चार्ली चैप्लिन के ठीक पीछे खड़े हैं डॉ चुन्नीलाल कतियाल और दाएं कोने में खड़ी हैं सरोजिनी नायडू
Courtesy: Bombay Sarvodaya Mandal & Gandhi Research Foundation





