अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

बंगाली नामों में सरनेम को लेकर एसआईआर का नोटिस थमाया

Share

कोलकाता. पश्चिम बंगाल में इन दिनों चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभ्यास ने एक अजीब-सी स्थिति पैदा कर दी है. मुख़र्जी, बनर्जी और चटर्जी जैसे आम बंगाली उपनाम अब “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” की कैटेगरी में आ गए हैं. वजह सिर्फ इतनी है कि एक-दो पीढ़ी पहले परिवार के लोग अपने लंबे पारंपरिक ब्राह्मण उपनाम – मुखोपाध्याय, बंद्योपाध्याय और चट्टोपाध्याय – इस्तेमाल करते थे, जबकि आज की पीढ़ी उनके संक्षिप्त रूप लिखती है.

दरअसल, ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक सुविधा के लिए कई लंबे बंगाली उपनामों को छोटा कर दिया गया था. गांगोपाध्याय बना गांगुली, मुखोपाध्याय बना मुखर्जी, चट्टोपाध्याय बना चटर्जी और भट्टाचार्य बना भट्टाचार्जी. समय के साथ लोगों ने छोटे नामों को अपनाया, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड -खासतौर पर शैक्षणिक दस्तावेजों और पुराने मतदाता सूचियों – में लंबे उपनाम दर्ज रह गए. अब यही फर्क मतदाताओं के लिए परेशानी बन गया है.

हाजरा के निवासी 35 वर्षीय स्पंदन भट्टाचार्जी को 29 जनवरी को सुनवाई के लिए बुलाया गया है, क्योंकि 2002 की SIR सूची में उनके पिता का नाम अशोक भट्टाचार्य दर्ज है. स्पंदन ने ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ से कहा, “लगता है चुनाव आयोग के सिवा सब जानते हैं कि भट्टाचार्जी और भट्टाचार्य एक ही हैं. मेरी BLO भी भट्टाचार्य हैं, लेकिन उनका कहना है कि नोटिस आया है तो सुनवाई में जाना अनिवार्य है. उम्मीद है पासपोर्ट से बात साफ हो जाएगी.”

नेताजी जयंती के एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को बंगाल की सांस्कृतिक समझ से जोड़ते हुए कहा कि केवल उपनाम के आधार पर लोगों को तलब करना राज्य की परंपरा को न समझने का उदाहरण है. उन्होंने सवाल उठाया, “मैं अंग्रेज़ी में ममता बनर्जी लिखती हूं और बंगाली में ममता बंद्योपाध्याय. इसमें समस्या क्या है?”

बारासात नगरपालिका के पूर्व चेयरमैन अशनी मुखोपाध्याय के बेटे और प्रोफेसर बिदित मुखर्जी को भी यह साबित करने के लिए बुलाया गया है कि वे उसी व्यक्ति के पुत्र हैं. बिदित ने टीओआई से बातचीत में कहा, “मेरे पास 2014 से वोटर आईडी है और मैं सभी मानदंडों पर खरा उतरता हूं. फिर इसे लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी कैसे कहा जा सकता है?” हालांकि, कई BLO और AERO मानते हैं कि ये असल में उपनाम का बेमेल नहीं है, लेकिन उनका कहना है कि चुनाव आयोग का सॉफ्टवेयर इन्हें ‘मिसमैच’ के रूप में चिन्हित कर रहा है. एक AERO ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हम जानते हैं कि इसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है, लेकिन हमें निर्देशों का पालन करना पड़ता है.”

फूलबागान के सामीरन चटर्जी भी इसी वजह से कतार में खड़े दिखे. उनके कुछ दस्तावेजों में चट्टोपाध्याय लिखा है और कुछ में चटर्जी. वे कहते हैं, “मैं आमतौर पर चटर्जी लिखता हूं, लेकिन पढ़ाई से जुड़े काग़ज़ों में लंबा नाम है. इसी वजह से मुझे नोटिस मिला.” दरअसल, कुछ दशक पहले तक कलकत्ता विश्वविद्यालय और स्थानीय बोर्ड केवल लंबे पारंपरिक उपनामों के इस्तेमाल पर ज़ोर देते थे. नतीजा यह हुआ कि लाखों लोगों के शैक्षणिक रिकॉर्ड में लंबे नाम दर्ज हैं, जबकि बाकी सभी दस्तावेजों में छोटे.

श्यामबाज़ार की मतदाता अरुणिता बनर्जी का मामला तो और भी दिलचस्प है. उन्हें इसलिए बुलाया गया क्योंकि 2002 की मतदाता सूची में उनके पिता का उपनाम ‘बंद्योपाध्याय’ दर्ज है, जबकि उनके सभी दस्तावेजों में ‘बनर्जी’. अरुणिता कहती हैं, “हमें नहीं पता चुनाव आयोग ने उनका उपनाम क्यों बदला. आज सारे दस्तावेज जमा कर दिए हैं.” बंगाल में यह सवाल अब ज़ोर पकड़ रहा है कि क्या तकनीक और सॉफ्टवेयर के नियम स्थानीय संस्कृति और इतिहास से ऊपर हो सकते हैं, या फिर व्यवस्था को इंसानी हकीकत के मुताबिक ढलना होगा.

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें