Hafeez Kidwai
इन मुस्कुराहटो की क़ीमत पता है आपको, नही मालूम होगी क़ीमत । जब यह बच्चे अचानक हुए हमलों में अपना घर बार छोड़ भागे होंगे । अपने आँगन को,अपने कमरों को,अपनी छतों को,अपने महफूज़ घरों से जब यह फ़साद ने भागे होंगे, तो जानते हैं यह वहाँ सबसे क़ीमती चीज़ क्या छोड़ आए थे । वह थी यह मुस्कुराहट ।
राहुल ने उनके जले घरों से,टूटे दरवाजों से,बिखरे सामान से,बहते आंसुओं से,चीखों से,दर्द के ढेर से,खून की छीटों से,भागते पैरों के बीच से यह मुस्कुराहट वापिस लाकर इन्हें दी है । आपको नही पता कि इनके चेहरों पर यह मुस्कुराहट आखरी बार कब दौड़ी थी,यह कितने दिनों बाद मुस्कुराए हैं ।
मुस्कुराना सिर्फ़ मुस्कुरा भर देना नही होता है, बल्कि बतलाता है कि मेरी आँखों में सपने मरे नही हैं, मेरा दिल अभी मायूस होकर बुझ नही रहा है । यह मुस्कुराहट की क़ीमत भला वह कैसे समझेंगे, जिन्होंने मुस्कुराहट छीनने का या तो काम किया है, या फिर उनके सहयोगी रहे हैं या फिर उनके समर्थक,वह भला क्या जाने की फ़साद के दिनों में जो सबसे ज़्यादा छिनती है, वह है मुस्कुराहट ।
राहुल मणिपुर चले गए,हर उससे मिलने की कोशिश की जो फ़साद में दर बदर हो गए । लोग उनसे मिलकर रो पड़े,फ़साद में रो पड़ना स्वाभाविक है मगर जो असाधारण काम है, वह है रोते हुए बच्चों को मुस्कुराहट के लायक माहौल देना,जो राहुल ने कर दिखाया ।
हमारे घरों में कितनी ही लाशें आईं,कितने ही तक़लीफ़ के दिन देखे,जो चीज़ उन दिनों हमारे घरों से ग़ायब थी,वह थी मुस्कुराहट,इसलिए जानते हैं कि रोती हुई आंखों से क्या क्या बहता है और क्या समेटा जा सकता है । इस मुस्कुराहट की क़ीमत वही समझ सकेगा,जिसने तक़लीफ़ से भरे दिन देखें हों और राहुल के करिश्मे को वही समझेगा,जिसमें संवेदना हो,वरना पीआर स्टंट कहकर हर आदमी अपने हल्केपन का सबूत देकर निकल सकता है ।
राहुल अशांत मणिपुर के मायूस बच्चों के बीच मुस्कुराहट के बीज बो चुके हैं । यह बीज बहुत जल्द उस माटी को वापिस उसके सुक़ून भरे दिन की ओर लौटा ले जाएगा । यह मिट्टी बहुत जल्द इससे उबरकर शांत हो जाएगी,तब समझ आएगा कि मुस्कुराहट भरी यह तस्वीर कितनी अहमियत रखती हैं ।
राहुल का राहत शिविरों में पहुँचना, लोगों को गले लगाना, उनका दुःख दर्द सुनना, उन्हें सांत्वना देना और उम्मीद देना, किसी के लाखों करोणों रुपयों के पीआर कैम्पेन को हवा में उड़ा देना हुआ । राहुल के पांव उधर पड़ चुके हैं, शांति भी आ ही जाएगी मगर हमें खुद से सोचना होगा कि क्या और किसी शीर्ष नेता से देश के एक राज्य में फैली इस आग में जाने का साहस नही था या इच्छा नही थी और हम उनके सीने की चौड़ाई नाप नाप कर बल्लियों उछलते हैं ।
राहुल,यह बच्चों के चेहरे पर बिखरी मुस्कुराहट को देखकर इतना ही कहेंगे कि नोआखाली में एक गांधी भी यही करने गए थे और सैकड़ों गांवों में लाखों लोगों में मुस्कुराहट बिखेर आए थे,आप भी वैसे ही कर रहे हो,यह इतिहास बन रहा है, देश आपकी तरफ उम्मीद से देख रहा है, आख़िर उसकी भी तो मुस्कुराहट रोज़ बरोज़ घट रही है…राहुल के साथ लोग आ रहे हैं, हम एक से एक व्यक्ति को बदलते देख रहे हैं, यह बहुत सुखद है । इन बच्चों की मुस्कुराहट घर घर पहुँचेगी, क्योंकि इसे पाने को इन्होंने बेपनाह आँसू बहाए हैं, इतनी तक़लीफ़ से उपजी मुस्कुराहट अपना रंग ज़रूर दिखाएगी,मोहब्बत जीत जाएगी,एक दिन….





