निश्छल, निर्मल, सहज, सरल व संवेदनशील, जिसके मुखमंडल पर न केवल मुस्कान, बल्कि ठहाके विराजमान थे। जो आत्मीयता से मिला, उससे आत्मीय रिश्ते बनाने वाले। रिश्तों में दल को दूर रख विरोधी दल से भी नाता बनाने वाले। जो पार्टी का सच्चा व समर्पित सिपाही था, जिसके लिए संगठन ही सर्वोपरि था। जाहि विधि राखे राम… की तर्ज पर जो पार्टी-संगठन-नेतृत्व ने तय कर दिया, वो ही स्वीकार का जिसका स्थायी भाव था। पद-प्रतिष्ठा के मामले में न कोई ज़िद, न कोई राजी-नाराजगी। जो मिला वो ही सही। न मिला तो भी कोई गम नहीं। अंतिम समय तक पार्टी के लिए पसीना बहाने वाले। राष्ट्र आराधना में सदैव कर्मरत। सबके सुख-दुःख के साथी थे गोविंद मालू। आपने अपने अंक में इतनी जल्दी उन्हें क्यों समा लिया गोविंद?
नितिन मोहन शर्मा
हे…गोविंद! अभी उनकी कोई उम्र थी क्या आपका सामीप्य पाने की। अभी तो उन्हें बहुत कुछ करना शेष था। कई उम्मीदें थीं उनके मन में। कई की उम्मीदों का केंद्र थे। असीम संभावनाओं से वे लबरेज थे। ऊर्जा, ओज और जोश से भरपूर थे। भीषण गर्मी में भी वे धार संसदीय सीट का प्रभार होने के नाते पसीना बहा रहे थे। कभी खाली नहीं बैठे वे। जिम्मेदारी नहीं रही, तब भी वे अपने स्तर पर पार्टीहित में सक्रिय रहते थे।
कुछ नहीं तो दिल्ली प्रवास कर केंद्रीय मंत्रियों से संपर्क संवाद स्थापित करते और जनहितैषी योजनाओं व कामकाज को समझते थे। जनहित में उसका प्रचार-प्रसार करते थे। खूब पढ़ते थे, ताकि तर्क धारदार रहे और विरोधी निरुत्तर। उनकी लाइब्रेरी व पुस्तक संग्रह ही बताता है कि वे कितने अध्ययनशील थे। सदा तर्कपूर्ण व तार्किक बात रखते थे। कमियों को स्वीकारने में वे कभी झिझकते नहीं थे। ऑन रिकॉर्ड नहीं तो ऑफ द रिकॉर्ड ही सही, मन की बात बड़े मन से कह देते थे। उनकी साफगोई के सब यूं ही कायल नहीं थे। लेकिन गोविंद! ये आपने क्या कर दिया?
हे…गोविंद! वे दिनभर आपको ही तो भजते थे। भजनानंदी थे वे। जय श्रीमन्नारायण उनका मूल मंत्र था। आपके बाद भाजपा ही उनका भजन थी। पार्टी को भी वैसे ही भजते थे गोविंद, जैसे आपको भजते। वे पार्टी के दुर्दिनों के दौर के साथी थे। जब पार्टी की दो लाइन भी अखबारों में मशक्कत के बाद नजर आती थीं, तब उन्होंने मीडिया और भाजपा के बीच रिश्तों की कमान संभाली। तब तक दल में ही नहीं पता था कि कोई मीडिया विंग भी होना चाहिए। उस दौर में न्यूनतम संसाधन के साथ उन्होंने मीडिया और भाजपा के बीच रिश्तों की बुनियाद रखी।
वे नींव के उन चुनिंदा पत्थरों में से एक हैं जिनके अनथक परिश्रम, अनूठी सोच के दम पर आज पार्टी का मीडिया तंत्र सबसे अलहदा व सफल है। दीनदयाल भवन की पहली मंजिल का सबसे आखिरी का कमरा मिला था उन्हें, मीडिया के कामकाज के लिए। खाली कमरा। धूलभरा। एक टेबल व कुर्सी से शुभारंभ हुआ था उनकी अगुआई में पार्टी के मीडिया कामकाज का। कोई आ जाए तो बैठने का सोफा तो दूर, कुर्सी तक नहीं थी। आज वो ही कक्ष दीनदयाल भवन का केंद्रबिंदु बना हुआ है और मीडिया व भाजपा के सुमधुर रिश्तों का साक्षी भी।
हे..गोविंद! इतनी जल्दी क्या थी आपको। आप तो कृपा निधान हैं, तो फिर अपने गोविंद पर कृपा क्यों नहीं बरसाई? या बस इतनी ही पटकथा लिखी थी आपने उनकी? वे अनंत संभावनाओं से लैस थे। पार्टी उनका शतांश ही उपयोग कर पाई। विधायक बनने की उनकी प्रबल इच्छा थी, लेकिन टिकट की राजनीति में वे वैसे कभी सक्रिय नहीं हुए, जैसे अन्य नेता हुए और टिकट ले उड़े। प्रदेश व देश के शीर्षस्थ नेताओं से आत्मीय रिश्तों के बावजूद वे गुटीय राजनीति से परे थे।
शायद तभी वे विधायकी से भी परे रह गए और उनके मुंह सामने के नेता विधायक बन गए। सत्ता व संगठन, दोनों के वे प्रिय थे। लिहाजा चुनावी राजनीति से हटकर पार्टी उनका उपयोग करती रही। वे स्वयं भले ही चुनाव न लड़े, लेकिन अनेक चुनाव लड़वा दिए। इंदौर में ताई, यानी सुमित्रा महाजन के आठ चुनाव में उनकी अहम भूमिका रही। वर्तमान में भी वे धार संसदीय सीट के प्रभारी का दायित्व निभा रहे थे और काल से साक्षात्कार के ठीक एक दिन पहले वे धार में ही प्रधानमंत्री की सभा में सक्रिय रहे। स्वयं मुख्यमंत्री इसके साक्षी थे।
हे गोविंद! अब समूची भाजपा व इंदौर साक्षी रह गए गोविंद की कर्मशीलता के। उनके बनाए रिश्तों के। भाजपा के मीडिया मैनेजमेंट के। सबको हतप्रभ छोड़ गोविंद के प्रिय “गोविंद’ ब्रह्मलीन हो गए। उसी खामोशी के साथ, जिस खामोशी के संग वे पार्टी के काम में निमग्न थे।
‘खुलासा फर्स्ट’ परिवार गोविंद मालू के श्रीचरणों में अश्रुपूरित श्रद्धासुमन समर्पित करता है। परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना भी करता है कि कलम के धनी मालूजी के परिजन, प्रियजन व शुभचिंतकों को भी इस हृदयविदारक अवसान पर ढाढ़स देना।
काश! उनके साथ मैं धार चला जाता काश! मैं उनके साथ धार का एक प्रवास कर लेता। अब जीवनभर मलाल रहेगा। क्या पता था मुझे कि ये उनका आखिरी प्रवास होगा। वे इस अकिंचन पर भ्रातृत्व स्नेह रखते थे। हमेशा शिकायत करते थे- यार पंडित, तुम हमारा फोन नहीं उठाते हो। जब भी बतियाते तो फिर 60 मिनट कब गुजर जाते, दोनों को अहसास ही नहीं होता। बहुत जिद की थी उन्होंने धार चलने के लिए। बोले- पंडित, तुम गजब ही जर्नलिज्म कर रहे हो। तुमसे बहुत सारी बात करना है। बीते शुक्रवार को उनका आग्रह आया कि कल चलते हैं। शनिवार की हां भी हुई, लेकिन फिर उन्हें बताया कि शनिवार वल्लभाचार्य जयंती है, नहीं चल पाऊंगा। उन्होंने रविवार का तय किया और सुबह से ही फोन भी आने लगे।
हमेशा की तरह मैं उनका फोन नहीं उठा पाया तो उन्होंने मित्र संजय पंडित से वाट्सएप मैसेज करवाया कि चल रहे हो न धार? फिर उन्हें फोन कर बताया कि भाई साहब, याद नहीं रहा और मैं रूटीन की तरह खबरों की दुनिया में डुबकी लगा रहा हूं। माफ कर दो।
अगली बार पक्का वादा। उन्होंने कहा भी कि चलते तो अच्छा रहता, आज वहां बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस भी है। खैर, वे मान गए। मुझे क्या पता था कि वे धार की इस अधूरी यात्रा में मुझे ही क्या, सबको मंझधार में छोड़ जाएंगे? जीवनभर उनकी एक बड़े भाई, अनन्य मित्र और मार्गदर्शक के रूप में कमी खलेगी।





