डॉ .सलमान अरशद
बदलाव की किसी भी कोशिश की शुरुआत वर्तमान की यथार्थ समझ से शुरू होती है। वर्तमान की समझ के लिए ज़रूरी है कि अतीत की गहरी पड़ताल हो।
दरअसल इंसान को समझने के लिए उसको दो हिस्सों में बांट कर देखना होगा, पहला उसका भौतिक अस्तित्व, यानि प्रकृति ने उसे जिस तरह रचा है, इस भौतिक अस्तित्व के लिए भोजन, सेक्स, सुरक्षा और आनंद, चार मूल भूत ज़रूरतें हैं। इन चार मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जो व्यवस्थाएं बनीं उनमें निरंतर बदलाव होता रहा। इन बदलावों का इतिहास ही सभ्यता का इतिहास है।
आज हमारे सोचने, विचारने का जो ढंग है, नैतिकता- अनैतिकता के जो सिद्धांत हैं, न्याय व अन्याय के जो पैरामीटर हैं इन सबकी जड़ें हमारे अतीत में हैं। इनकी समझ से वर्तमान की समझ का सीधा रिश्ता है और इस समझ से भविष्य के बेहतरी की हर कोशिश की शुरुआत होनी है।
भारत में एक बेहतर भविष्य का निर्माण इस प्रश्न से शुरू हो सकता है कि भारत के आम आदमी की मानसिक निर्मिति की वर्तमान अवस्था क्या है !
भारत के सियासी जगत में, बौद्धिक दुनिया में और शक्ति के लगभग सभी केंद्रों में अगर भारत के सवर्ण हिन्दुओं का निर्णायक कब्ज़ा है, तो क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ है ?
भारत की महिलाओं का समाज और शासन व्यवस्था में आज भी हिस्सेदारी अगर नगण्य है तो क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ है?
वामपंथी सियासी संगठन भी अगर दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को अपने संगठनों में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी नहीं दे पाए तो क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ है ?
वामपंथी मठाधीशों ने लाखों नौजवनों के जीवन को बदलाव की राजनीति के नाम पर बर्बाद करके अपने लिए सम्पदा अर्जित किया है, क्या ये महज़ उनकी चारित्रिक दुर्बलता थी/ है ?
विचारधारा और दर्शन पर व्याख्यान देने वाले, इस बिना पर सियासत करने वाले अगर इसे अपने व्यवहारिक जीवन में जगह नहीं देते तो क्या ज़रूरी नहीं है कि व्यक्तित्व के बुनियादी ढाँचे पर भी विचार किया जाए ?
भारत में व्यक्ति पूजा अगर हर सियासी धारा में विद्यमान है, तो क्या इसे महज़ इत्तेफ़ाक़ माना जाये ?
इन सब प्रश्नों का उत्तर सांस्कृतिक पोस्टमार्टम से मिलेगा।
इस पोस्टमार्टम के बिना न तो राहुल और कांग्रेस से बेहतर भविष्य निकलेगा न कॉमरेड के लाल सलाम से और न हिन्दू राष्ट्र के नाम पर बरपा की जा रही तबाही से !
आप अपनी सुविचारित टिप्पणी से मेरी समझ को और बेहतर कर सकते हैं, इसलिए आपकी आलोचना, सुझाव और नए विचार पढ़ना अच्छा लगेगा !
~ Dr. Salman Arshad





