दिल्ली के उपराज्यपाल श्री विजय कुमार सक्सेना साहब ने आम आदमीं पार्टी के मुख्य संयोजक व दिल्ली के मुख्य मन्त्री श्री अरविन्द केजरीवाल जी को पत्र लिखकर नोटिस भेजा है कि वह अपनी पार्टी के प्रचार/ प्रसार पर व्यय धनराशि 163. 62 करोड़ रूपया 10 दिनों के अंदर सरकारी ख़ज़ाने में जमा करे । नोटिस के मुताबिक़ पार्टी ने विज्ञापनों पर यह धनराशि राजनितिक उद्देश्यों से व्यय की है और इस व्यय को पार्टी को स्वयं वहन करना होगा । उप राज्यपाल महोदय द्वारा मा. सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी की उन संस्तुतियों का भी हवाला दिया है जिसमें राजनीतिक दलों के विज्ञापनों पर सरकारी ख़ज़ाने से रोक लगाने की सिफ़ारिश की गई है ।
यद्यपि आम आदमीं पार्टी द्वारा उप राज्यपाल महोदय के इस नोटिस की तीखी आलोचना की जा रही हैं और पार्टी ने उप राज्यपाल महोदय से उन विज्ञापनों की सूची मॉगी है जो उनके अनुसार राजनीतिक उद्देश्यों से दिये गये हैं । दिल्ली सरकार के उप मुख्यमंत्री श्री मनीष सिसोदिया जी ने यह भी कहा है कि तमाम बीजेपी की राज्य सरकारे दिल्ली के अख़बारों में भी विज्ञापन प्रकाशित कराती रहती है तो क्या बीजेपी की केंद्र सरकार उनसे भी धनराशि वसूल करेगी ? उप राज्यपाल महोदय के इस नोटिस को आप आदमीं पार्टी द्वारा इसे बीजेपी के इशारों पर बदले की कार्रवाई कहा जा रहा है।
दरअसल यह अकेले दिल्ली सरकार का मामला नही है । देश की तमाम राज्यों की दलीय सरकारें अपनी कथित उपलब्धियों का , योजनाओं के लंबे चौड़े विज्ञापन प्रकाशित कराते रहती हैं और यहॉ तक कि जिन राज्यों में उनकी पार्टी का कोई नामलेवा भी नही है उन राज्यों के क्षेत्रिय अख़बारों मे भी उनके विज्ञापन प्रकाशित होते रहते है । धरातल पर भले ही कुछ न किया हो पर इनके विज्ञापनों को देखकर तो ऐसा लगता है कि जैसे इन्होंने अपने राज्य को स्वर्ग बना दिया हो । ज़ाहिर है कि इन महँगे विज्ञापनों पर होने वाला व्यय सरकारी ख़ज़ाने से ही होता है और इससे जहॉ एक और मीडिया मोटी कमाई कर उपकृत होता है तो दूसरी और जनता भी काफ़ी हद तक भ्रमित होकर उन्हें सत्ता भी दे देती हैं । राज्य सरकारें अपनी योजनाओं/ उपलब्धियों की जानकारी अख़बारों में सूचनाओं/ विज्ञप्ति के द्वारा भी जनता को पहले देती रही है पर अब अख़बारों में कई कई पृष्ठों में विज्ञापनों को देकर , फ़ोटो छपवा कर अपने सरकार/ दल का प्रचार प्रसार कर रहे है , भले ही धरातल पर कुछ भी नहीं हुआ हो।
मेरा यह मानना है कि सरकारों द्वारा ग़ैर ज़रूरी और अनावश्यक विज्ञापनों के प्रकाशन पर कोई नीति होनी चाहिए ताकि जनता का पैसो का राजनैतिक दल अपनी पार्टी के प्रचार करने पर दुरूपयोग न कर सके। जैसा की पूर्व में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी द्वारा भी सिफ़ारिश की गई हैं ।





