अग्नि आलोक
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प्रचलित कुप्रथाओ के दौर से बाधित सामाजिक विकास

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भरत गहलोत

वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में कई कुप्रथाओ ने अपने पैर पसार लिए है जो अब दूर होने का नाम ही नही ले रही है ,
सामाजिक कुप्रथाएं वर्तमान में समाज का अभिन्न अंग हो गई है,
जैसे पहले सती प्रथा को समाज का अभिन्न अंग बताया गया समाज मे इसकी आवश्यकता बताया गया,
पति की मृत्यु के बाद उसकी अर्धागिनी को उसकी चिता पर बैठाकर जिंदा जलाया जाता था यह बड़ा ही अमानवीय कार्य था किंतु इसे एक प्रथा के रूप में समाज मे प्रचलित कर दिया ,
कही स्त्रिया अपने पति की मृत्यु के बाद अपने बच्चो के लालन पालन , पोषण के लिए जिंदा रहना चाहती थी किंतु उन्हें जबरदस्ती इस प्रथा का पालन करने के लिए बाध्य किया जाता था,
उसके बाद जब किसी स्त्री के पति का देहावसान हो जाता था तो उस स्त्री को दूसरा विवाह करने की अनुमति नही थी,
अर्थात विधवा विवाह की अनुमति नही थी ,
पुरूष भले दूसरा विवाह कर ले किंतु स्त्री को दूसरा विवाह न करने की प्रथा प्रचलन में आई,
विधवा विवाह पर पाबंदी लगा दी गई,
विधवा अपने पति की मृत्यु के बाद दूसरा विवाह नही कर सकती थी उसे नरकीय जीवन जीने को बाध्य होना पड़ता था उसे इस प्रकार के जीवन को जीने के लिए बाध्य किया जाता था,
न चाहते हुए भी स्त्री दूसरा विवाह नही कर सकती क्योंकि सामाजिक पाबंदी थी,
वर का चयन न करने की प्रथा भी एक बहुत ही विषम व विकट समस्या थी,
इसमे कोई स्त्री (बालिका)अपने वर का चयन करने में स्वतंत्र नही थी,
स्त्री के माता पिता उस स्त्री के लिए जो भी जैसा भी वर का चयन करते थे न चाहते हुए भी उस स्त्री को वर चयनित वर से विवाह करना पड़ता था,
शिक्षा ग्रहण न करवाने की कुप्रथा भी एक विकट कुप्रथा थी,
पहले बालको को विद्यार्जन व व्यवसाय व पुरुषों को घर के सभी फैसले लेनी की स्वतंत्रता थी,
स्त्रियों व बालिकाओ को घर के कामकाज चुल्ला चौकी तक ही सीमित रखा जाता था,
उन्हें विद्यार्जन व व्यवसाय में योगदान नही दिया जाता था,
सर्वप्रथम नारियों के उत्थान के लिए महात्मा ज्योतिबा फुले व राजा राममोहन राय ने सती प्रथा को खत्म करने व विधवा विवाह को प्रोत्साहन देने का बीड़ा उठाया ,
महात्मा ज्योतिबा फुले व सावित्री बाई फुले ने स्त्रियों को शिक्षित करने का कार्य किया,
अब वर्तमान में जो सबसे बड़ी व विकट समस्या जो है वो है भूर्ण हत्या वर्तमान में भूर्ण हत्या के मामले बहुत बढ़ रहे है ,
आए दिन समाचार पत्रों में खबर आती है की अमुक जगह पर अमुक अस्पताल के पास में जीवित मानव भ्रूण प्राप्त हुआ ,
जाँच करने पर पता चलता है कि जो भूर्ण फेका गया है वो लड़की थी,
इसका कारण बच्चियों के लालन पालन व उनके विवाह में दहेज की बड़ी भारी मात्रा में मांग,
जिस कारण कई माताओं को अपने अस्तित्व को त्यागना पड़ता है ,
कोई जानबूझकर त्यागता है तो कोई दवाब में आकर जबर्दस्ती त्यागता है,
समाज को चाहिए कि इस प्रकार की कुप्रथाओ का त्याग कर एक अच्छे समाज के निर्माण में अपनी अहम भूमिका का निर्वाहन करे,

वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में कई कुप्रथाओ ने अपने पैर पसार लिए है जो अब दूर होने का नाम ही नही ले रही है ,
सामाजिक कुप्रथाएं वर्तमान में समाज का अभिन्न अंग हो गई है,
जैसे पहले सती प्रथा को समाज का अभिन्न अंग बताया गया समाज मे इसकी आवश्यकता बताया गया,
पति की मृत्यु के बाद उसकी अर्धागिनी को उसकी चिता पर बैठाकर जिंदा जलाया जाता था यह बड़ा ही अमानवीय कार्य था किंतु इसे एक प्रथा के रूप में समाज मे प्रचलित कर दिया ,
कही स्त्रिया अपने पति की मृत्यु के बाद अपने बच्चो के लालन पालन , पोषण के लिए जिंदा रहना चाहती थी किंतु उन्हें जबरदस्ती इस प्रथा का पालन करने के लिए बाध्य किया जाता था,
उसके बाद जब किसी स्त्री के पति का देहावसान हो जाता था तो उस स्त्री को दूसरा विवाह करने की अनुमति नही थी,
अर्थात विधवा विवाह की अनुमति नही थी ,
पुरूष भले दूसरा विवाह कर ले किंतु स्त्री को दूसरा विवाह न करने की प्रथा प्रचलन में आई,
विधवा विवाह पर पाबंदी लगा दी गई,
विधवा अपने पति की मृत्यु के बाद दूसरा विवाह नही कर सकती थी उसे नरकीय जीवन जीने को बाध्य होना पड़ता था उसे इस प्रकार के जीवन को जीने के लिए बाध्य किया जाता था,
न चाहते हुए भी स्त्री दूसरा विवाह नही कर सकती क्योंकि सामाजिक पाबंदी थी,
वर का चयन न करने की प्रथा भी एक बहुत ही विषम व विकट समस्या थी,
इसमे कोई स्त्री (बालिका)अपने वर का चयन करने में स्वतंत्र नही थी,
स्त्री के माता पिता उस स्त्री के लिए जो भी जैसा भी वर का चयन करते थे न चाहते हुए भी उस स्त्री को वर चयनित वर से विवाह करना पड़ता था,
शिक्षा ग्रहण न करवाने की कुप्रथा भी एक विकट कुप्रथा थी,
पहले बालको को विद्यार्जन व व्यवसाय व पुरुषों को घर के सभी फैसले लेनी की स्वतंत्रता थी,
स्त्रियों व बालिकाओ को घर के कामकाज चुल्ला चौकी तक ही सीमित रखा जाता था,
उन्हें विद्यार्जन व व्यवसाय में योगदान नही दिया जाता था,
सर्वप्रथम नारियों के उत्थान के लिए महात्मा ज्योतिबा फुले व राजा राममोहन राय ने सती प्रथा को खत्म करने व विधवा विवाह को प्रोत्साहन देने का बीड़ा उठाया ,
महात्मा ज्योतिबा फुले व सावित्री बाई फुले ने स्त्रियों को शिक्षित करने का कार्य किया,
अब वर्तमान में जो सबसे बड़ी व विकट समस्या जो है वो है भूर्ण हत्या वर्तमान में भूर्ण हत्या के मामले बहुत बढ़ रहे है ,
आए दिन समाचार पत्रों में खबर आती है की अमुक जगह पर अमुक अस्पताल के पास में जीवित मानव भ्रूण प्राप्त हुआ ,
जाँच करने पर पता चलता है कि जो भूर्ण फेका गया है वो लड़की थी,
इसका कारण बच्चियों के लालन पालन व उनके विवाह में दहेज की बड़ी भारी मात्रा में मांग,
जिस कारण कई माताओं को अपने अस्तित्व को त्यागना पड़ता है ,
कोई जानबूझकर त्यागता है तो कोई दवाब में आकर जबर्दस्ती त्यागता है,
समाज को चाहिए कि इस प्रकार की कुप्रथाओ का त्याग कर एक अच्छे समाज के निर्माण में अपनी अहम भूमिका का निर्वाहन करे,

भरत गहलोत
जालोर राजस्थान


Ramswaroop Mantri

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