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देववाणी में यौनजीवन के कतिपय बिम्ब

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डॉ. विकास मानव

      युगपज्जघनोरः स्तनपिधानमधुरे त्रपास्मिताद्रमुखि।
   लोलाक्षि नैव पवनो विरमति तव वसन परिवर्ती।।
 वह नायक बिना उपभोग किए तुझे छोड़ेगा नहीं, ऐसा नायिका से सखी कह रही है :  हे एक साथ जघन वक्षस्थल और उरोजों को ढ़कने वाली सुन्दरी, लज्जा और मुस्कान से स्निग्ध मुख वाली, चंचल नेत्रों वाली, यह पवन रूपी नायक तेरे वस्त्रों को शरीर से हटाए बिना मानेगा नहीं।
   अतः अपने जघन आदि को लज्जा के कारण बार - बार वस्त्रों से ढ़कना व्यर्थ है। अच्छा यही होगा कि तू अपने शरीर से वस्त्रों का यह आच्छादन हटाकर इसके साथ यथेच्छ रमण कर। लज्जा मत कर।

व्यजनादिभिरुपचारैः किं मरुपथिकस्य गृहिणी विहितैर्मे।
तापस्त्वदुरूकदलीद्वैमध्ये शान्तिमैमेति।।
अत्यंत रतिसमुत्सुक (संभोग हेतु व्यग्र) नायक नायिका से कह रहा है –
हे गृहिणी, भयंकर गर्मी से व्याकुल मरुभूमि से आए मुझ पथिक को तुम्हारे पंखे आदि से संपादित उपचारों से कोई लाभ होने वाला नही है।
मेरे शरीर की यह गर्मी – जलन, जिसे केवल मैं अनुभव कर रहा हूँ, तुम्हारे कदली-खंभ जैसी मांसल जंघाओं के बीच में ही शान्त होगी। अतः सखियों का साथ छोड़कर एकांत में चल।

भयपिहितं बालायाः पीवर मूरुद्वयं स्मरोन्निद्रः।
निद्रायां प्रेमार्दःपश्यति निःश्वस्य निःश्वस्य।।
पास होते हुए भी शय्या पर नवोढ़ा नायिका का उपभोग कठिन होता है – ऐसा कोई कह रहा है : नयी नवोढ़ा नायिका शय्या पर संभोग के भय से, नायक से विनती कर, अपनी दोनों मांसल जंघाओं को ढ़ककर सो गयी है।
पास में लेटे हुए बेचारे नायक की नींद कामोत्तेजना से उचट गयी है। वह प्रेमार्द्र प्रिय संभोग न होने से बार बार विवशता में लम्बी साँसें भरता नायिका की दोनों मांसल जंघाओं को देख रहा है।

करचरणकाँचिहार प्रहार विचिन्त्य बल गृहीत कचः।
प्रणयी चुम्बति दयितावदनंस्फुरदघनमरुणाक्षणम।।
केलि क्रीडा से अनभिज्ञ अनुभव शून्य नायक को सखी शिक्षा दे रही है –
हे नायक, तुम्हें निःसंकोच, निर्भय होकर नायिका से संभोग करना चाहिए.
कामकला प्रवीण, प्रतिभाशाली नायक कामोत्तेजित होकर बलपूर्वक नायिका के केशों को पकड़ कर, उसके लाख मना करने – बरजने – क्रोधित होने – निष्ठुर वचन कहने – नहीं नहीं करने के बावजूद, हाथ – पैर – कटि करधनी – हार आदि के प्रहार की चिंता न कर थरथराते लाल अधर वाले तथा गुस्से में लाल लाल आँखों वाले अपनी प्रेमिका के सुंदर मुख को चूम ही लेता है। मन भर कर चुंबन – रस का पान कर ही लेता है।

अद्य शीतं वरीवर्ति, सरीसर्ति समीरणः।
अपत्नीको मरीमर्ति, मरीमर्ति कुचोष्वाम।।
भयंकर जाड़ा है। शीत लहरी शरीर कँपा रही है। ऐसे में जिसके पास पत्नी नही है वह तो ठिठुरकर मर रहा है और जिसे अपनी पत्नी के उरोजों की सुखद गर्मी मिल रही है, उसका मन मस्ती में नाच रहा है।

चक्रे चण्डरूचा समं रणमसौ हेमंतपृथ्वीपतिर्ये।
ये तत्र जिता दिवाकरकरास्ते तेऽमुनातत्क्षणात।
कांतानामकुचभूधरे निदधिरे मन्येऽरहमेवं तदा।
नो चेन्मन्दकरः कथं दिनकरस्तत्पश्च तन्वीस्तनः।।
हेमंत ऋतु में सूर्य की किरणें निस्तेज हो जाती है। कवि कहता है – राजा हेमंत ने सूर्य के साथ युद्ध करते हुए उसे पराजित कर उसकी किरणों को ले जाकर स्त्रियों के स्तन रुपी पर्वत की कन्दरा में बंदी कर दिया। यदि यह बात न होती तो इस ऋतु में सूर्य की किरणें इतनी मंद क्यों होतीं और स्त्रियों के स्तन इतने गर्म क्यों होते?

यो धातुमश्नाति स्कृद्धिमतो तन्नैव व्यथते कदापि।
गृह्यन्ति याः प्रत्यहमेव धातुं स्त्रीणां कुतः स्याद्वत शीतबाधा।।
जाड़े के मौसम में जो एक बार भी रस रसायन (मकरद्ध्वज आदि) का सेवन कर लेता है उसे ठंडक कभी नहीं सताती। फिर वह पुरुष जो प्रतिदिन स्त्रियों का रसायन पान करता है उसे भला ठंडक क्या कष्ट दे सकेगी?

लघुनि तृण कुटीरे क्षेत्र कोणे यवानां
नवकलमपलालस्रस्तरे सोपधाने।
परिहरति सुषप्तं हालिकद्वंद्व मारात कुचकलशमहोष्मा बद्धरेखस्तुषारः।।
ठंड में गरीब किसानों की रात कैसे कटती है, इसकी एक झलक देखें – जौ के खेत में घास फूस की झोपड़ी बनी है। उसी में गद्दा तकिया के स्थान पर जमीन पर पुआल बिछा है। उसी पुआल पर किसान रात को अपनी नई नवेली पत्नी के साथ सो जाता है। प्रचंड शीतलहरी में गरीब किसान की सारी ठंडक अपनी पत्नी के सुपुष्ट उरोजों की गर्मी से दूर हो जाती है।

अपिदिनमणिरेष क्लेशितः शीतसंघैरथ
निशनिज भार्या गाढ़मालिंग्य दोर्भ्याम।
स्वपिति पुनुरुदेवं सालसांगस्तु तस्मात
किमु न भवतु दीर्घा हैमनी यामिनियम।।
शीत काल में रातें बड़ी हो जाती हैं। और सूर्य काफी देर में निस्तेज निकलता है। कवि कल्पना करता है – शीत ऋतु में सूर्य को भी इतनी ठंड लगी कि रात होते ही दोनों बाहुओं से अपनी भार्या को लिपटाकर वे ऐसे सोए कि उन्हें आलस्य वश उठने में काफी देर हो गई। उन्हें पता ही नहीं चला कि रात बीत चुकी है।

Ramswaroop Mantri

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