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जनतंत्र की चाल पर …कुछ संदेश 

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दो चीजें अनंत हैं: एक ब्रह्माण्ड और दूसरी इंसानों की मूर्खता। और हां, मैं ब्रह्मांड के बारे में जरूर पक्का नहीं हूं।’ -अल्बर्ट आइंस्टीन का विचार

आइंस्टीन ने अपनी रिलेटिविटी थ्योरी में एक गलती की, उन्होंने क्वांटम मैकेनिक्स में अनिश्चितता का सिद्धांत शामिल नहीं किया। भगवान भी इस सिद्धांत को तोड़ नहीं सकता।’ -स्टीफन हॉकिंग का प्रति-विचार

इन दोनों वैज्ञानिक कथनों का कल के चुनाव परिणामों से क्या सम्बन्ध है? क्या उतना ही, जितना एग्जिट पोल के मनोरंजन और वास्तविक आंकड़ों के बीच है? या फिर न हॉकिंग, न आइंस्टीन-दरअसल यह अपनी-अपनी कामनाओं से भरे विशिष्ट व्यक्तियों का समूह गान है, जो सुनने के लिए हम सब धीरे-धीरे अभ्यस्त होते जा रहे हैं?

वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी ने कहा ही है, ये कांग्रेस की हार पर जो विश्लेषण अब आ रहे हैं, वे तब क्यों नहीं आए, जब टिकट बंट रहे थे, जब प्रचार चल रहा था, जब वोट पड़ चुके थे और जब एग्जिट पोल भी आ चुके थे। जब नतीजे आ गए, तो चारों तरफ विश्लेषण ही विश्लेषण दिख रहे हैं।

आंकड़ों का गलत होना और चौंकाने वाले नतीजों का आना कोई नई बात नहीं है। खासतौर से तब, जबकि हर कोई पूरी रिपोर्ट के बाद लिख दे- देखते हैं ऊंट किस करवट बैठता है। (ऊंट पर सब डालकर भार-मुक्त होना भी एक आर्ट होती होगी।) मगर नतीजों से पहले तक हर कोण से यह सिद्ध करने की कोशिश करना कि यही होने जा रहा है-जबकि वास्तविकताएं विपरीत हों- यह नई बात है। कहीं-कहीं तो यह भी कह दिया गया था कि जनता ने मूर्खताएं न कीं, तो सही नतीजे आ जाएंगे। यानी मन मुताबिक न हो, तो जनता ही मूर्ख ठहरी। यह एक अनूठा सिद्धांत है, जो हर मैथ के भक्तों की नई पांत ने हाल में प्रस्थापित किया है।  दिलचस्प यह है कि इस सिद्धांत को अलग-अलग जगह चयनित रूप से लागू किया जाता है।

मुफ्त की चीजें बांटने का सिद्धांत हो या अदाणी नामक मुहावरे का इस्तेमाल, अलग-अलग जगहों से पर अलग अलग जेबों से ये रूमाल निकलते हैं। यहां तक कि ‘हिंदू राष्ट्र’ और ‘सनातन की सेवा’ भी सुविधानुसार हर तरफ से हो रही है। जब नैरेटिव बनाने की कला पर सर्वाधिक समय, श्रम और धन खर्च होने लगे, तो संदेह का विचित्र वातावरण बन जाता है और कोहरे में पहाड़ भी नहीं दिखाई देते। इसीलिए, कल सुबह-सुबह उठकर राष्ट्र के नाम सन्देश की तरह ट्वीट करने वाले दोपहरी तक दर्शनशास्त्र की पंक्तियां कहने लगे। शाम आते-आते उन्हीं विचारों में परब्रह्म विराजमान हो गए।

दरअसल चुनाव तो राजनीतिक दलों द्वारा लड़े जाते हैं। समकालीन परिस्थितियां, वैचारिक संघर्ष, देश का मिजाज दलों की अंदरूनी परिस्थितियां, नेतृत्व की रणनीति और जन-विश्वास की गारंटी इसके मुख्य कारक होते हैं। जनता का मन जानना एक गहरी निरपेक्षता से ही संभव है। इमर्जेन्सी के बाद चुनाव हुए, तो उसी विश्वास की नब्ज पर हाथ रखते हुए विद्वान संपादक शृंखला लिख सकते थे-कि-इन्हें वोट क्यों न दें! क्योंकि उसमें समग्र विश्वास की गारंटी थी, चयनित विचारों का प्रोपोगेंडा नहीं। जब क्षरित विश्वास के वातावरण में मुद्राओं का बाजार गर्म होने लगे, तो प्रतिमाएं गढ़ी जाने लगती हैं, जो थोड़े-थोड़े समय में अपने ही अंतर्विरोधों से टूटकर बिखरती भी जाती हैं। फिर-फिर प्रतिमाएं बनाई जाती हैं और फिर-फिर इस पर कथित विश्वास का नृत्य-निर्देशन संपन्न होता है। यह क्रम चलता रहता है और उसे ही सिद्धांत का रूप दे दिया जाता है। इतना सुनियोजित कि यह अचानक सत्य की खुदाई किताब लगने लगता है।

मगर, अंततः होता क्या है? जैसा कि एक अन्य साथी ने कहा, ‘यदि आप तीन राज्यों में भाजपा की जीत और एक राज्य में कांग्रेस की जीत पर ताली बजा रहे हैं, तो आप पत्रकार नहीं, कुछ और हैं। अगर आप तीन राज्यों में कांग्रेस की हार पर आंसू बहा रहे हैं, तो भी आप पत्रकार नहीं, कुछ और हैं।’

ताली और आंसू विशेषज्ञों और विचारकों का काम नहीं है। यदि आप थर्मामीटर हैं, तो उबलते पानी में डूबने पर सही तापमान ही बता सकते हैं, बर्फ नहीं। अन्यथा, या तो थर्मामीटर खराब है या जहां डुबोया गया है, वहां पानी ही नहीं है। लेकिन जनता क्या करे? अंततः वही बेहतर जानती है, वह अपना काम करती है, करती रहेगी। परसाई ने कहा ही है, ‘जब शर्म की बात गर्व की बात बन जाए, तो समझो जनतंत्र बढ़िया चल रहा है।’

Ramswaroop Mantri

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