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न्याय पर कुछ  कविताएं 

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(1975 से लेकर आज तक भारतीय न्यायपालिका पर मैंने जो कविताएं लिखी है और उनके साथ अपनी एक अतिलघुकथा को मनीषियों सम्मुख के प्रस्तुत कर रहा हूँ।)रामकिशोर मेहता

लघुकथा
फैसला
रामकिशोर मेहता

न्यायाधीश ने 1 रु का जुर्माना लगाया और फिर माफी माँगते हुए कहा कि हजूर एक रुपये से कम के मूल्य का कोई सिक्का प्रचलन में ही नहीं है वर्ना फैसला तो दो कौड़ी का भी नहीं था।

न्याय
न्याय!
तुम पहले अंधे थे
अब अंधे और बहरे हो
पहले तर्क पर टिके थे
अब
कमीशन पर ठहरे हो।
न्याय!
जिस दिन तुम
राजनीति के साथ
उसके बिस्तर पर सो जाओगे
सच मानो न्याय!
उस दिन तुम
गूंगे भी हो जाओगे।

न्याय
सुनवाई
बंद कमरे है
लगता है
कुछ हिसाब
बाकी है।
एक तरफ
सच का दबाव है
दूसरी तरफ
कुछ लुभाव
बाकी है।
निर्णय
तो कब का
चुका है
पर
धाराएँ
क्या क्या लगेंगी
बस यह चुनाव
बाकी है।

तारनहार
पाताल लोक की
गहराई में
उतर गया है
न्याय का
बामन
भगवान
पापी -पुजारियों का
तारन हार बन कर

जाग जाओ माई लार्ड
माई लार्ड
तुम जितना ऊपर पहुँच सकते थे
पहुँच चुके हो।
शुरू हो चुका है तुम्हारा अधोपतन
और कितने रसातल नापोगे ?
किस किस को बनाओगे नायक
अपनी आलोचना से।
एक न एक दिन
लोगों के मन से
निकल ही जायेगा सारा भय
‘कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट’ का,
कारावास की सजा का।
विदूषकों तक के लिए
बन कर रह जाओगे
हास्य के पात्र।
कोई भी तुम्हें
न्यायाधीश कह कर
अपनी जुबान खोटी नहीं करेगा
और इतिहास में लिखा जायेगा
तुम्हारे नाम के सामने
“मालिक का कुत्ता”
दुःख इस बात का
कि यह तुम्हारी अवमानना नहीं
अपमान
उस पद का है
जिस पर तुम बैठे हो।

न्याय
स्वयंभू न्यायाधीश
कभी नहीं होता बंदर।
घटती हुई रोटियों की संख्या
उसे बनाती है न्यायाधीश।
उसे बनाती है न्यायाधीश
फैलती जाती भूख,
आपाधापी में व्यस्त बिल्लियाँ।
बिल्लियाँ
जो काल के अनुकूल
कर बैठती है
अपने साथियों पर अविश्वास
दूसरों की रोटी पर दावा
और थमा बैठती है
अपनी रोटी बंदर के हाथ।
तब जाकर कर
कर पाता है बंदर न्याय।
तोलते तोलते तराजू के पलढ़े में
बाँट लेता है रोटी
अपने ही हिस्से में।
क्या हुआ यदि
हाथ मलती
मुँह ताकती रह जाती हैं बिल्लियाँ।
स्वयंभू न्यायाधीश
कहाँ होता है बंदर ?

अवमानना
मी लार्ड !
क्या हुआ उस मुकदमें का
जो चलाया जा रहा था
एक विदूषक के खिलाफ
अदालत की अवमानना के लिए?
क्या रख दिया गया है उसे
ठण्डे बस्ते में
इस सोच के साथ
कि यदि फिर कभी खतरा हुआ
तो निकाल लाया जायेगा।
क्या न्यायालय सोचता है
कि सर पर लटकी हुई
तलवार का भय
सजा से ज्यादा कारगर है?
क्या न्यायालय भी अब
अवसर वादी हो गया है,?
नहीं….. नहीं
मी लार्ड
मुझे कदाचित ऐसा नहीं कहना चाहिए था
न्यायालय को
अवसरवादी कहना भी तो
उसकी अवमानना ही है।

न्याय

न्याय तुम्हारे लिए नहीं है
यह मैं तुम्हें
पेड़, चिड़िया या नदी के प्रतीक से
नहीं समझा पाऊँगा।
क्योंकि ये
कभी भी
किसी से भी
कुछ भी नहीं माँगते।
न्याय भी नहीं।
लंगोटी में
तमाम उम्र गुजार देने वाले!
कहाँ से लोगे
वकील की फीस
गवाह का वाक्चातुर्य
और कई उम्र ?
कहाँ से लाओगे
न्यायालय की
प्रतिष्ठा के अनुकूल परिधान।
इसीलिए तो कहता हूँ कि
न्याय आज मांगने से नहीं
छीनने से मिलता है।
अतः
तान लो मुठ्ठियाँ
और कर लो
श्रृंखला बद्ध हाथ
फिर देखना
न्याय स्वयं आकर
तुम्हारा दरवाजा खटखटायेगा
जिनको नहीं मिला कभी
उनको भी मिल जायेगा।

रामकिशोर मेहता

Ramswaroop Mantri

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