अग्नि आलोक
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कुछ क्रांतिकारी शेर….

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एक किरण नूर की
जुल्मात पर भारी होगी
रात तुम्हारी ही सही
सुबह हमारी होगी।

चारागर को चारागरी से गुरेज है
वरना हमें तो दर्द हैं वे लादवा नहीं।

मैं आधा हिंदू हूं, आधा मुसलमान हूं,
कोई माने ना माने, मैं पूरा हिंदुस्तान हूं।

इस अंधकार के मौसम में
हम चंदा तारे दिनमान बनें
यह मारकाट की नगरी है
हम होली और रमजान बनें।

कौन किसकी पनाहों में है
सब वक्त की निगाहों में है,
कल जो लूटते थे काफिले
आप वो सरबराहों में है।

इधर उधर की बात न कर
यह बता काफिले क्यों लूटे,
मुझे रहजन से गरज नहीं
तेरी रहबरी का सवाल है।

मत पूछ कि मेरा कारोबार क्या है
मुहब्बत की दुकान है, नफरत के बाजार में।

जो किया करते हैं, करें,
नफरतों की बात
हम तो करेंगे मरते दम तक
मुहब्बतों की बात।

माना कि इस चमन को न
गुलजार कर सके,
कुछ खार कम तो कर गए
गुजरे जिधर से हम।

आंधियों में कुछ इस तरह बदहवास हुए लोग
जो पेड़ खोखले थे उन्हीं से लिपट गए।

पढ़ना है तो चेहरों को पढ़ने का हुनर सीख,
चेहरों पर लिखा है किताबों से ज्यादा।

वतन को कुछ नहीं खतरा
निजाम-ऐ-जर है खतरे में,
हकीकत में जो रहजन हैं
वही रहबर है खतरे में।

जात धर्म के झगड़े छोड़ो
समता ममता के बात करो,
बहुत रहे लिए अलग-थलग
अब मिलने जुलने की बात करो।

वक्त चल रहा है बहुत बुरा, होश सम्भालो
किसानों मजदूरों एकजुट होओ, देश संभालो

मालो-दौलत ही नहीं
लूट लिए सपने भी,
ऐसे तो रहजन भी न थे
जैसे ये रहबर निकले।

मुनेश त्यागी, वरीष्ठ ऐडवोकेट, मेरठ

संकलन-निर्मल कुमार शर्मा,

Ramswaroop Mantri

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