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उस वक्त की “नई दुनिया” और आज की पत्रकारिता – अभय छजलानी को श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ बातें!

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विजय दलाल

*जो व्यक्ति इंदौर शहर और मध्यप्रदेश के अखबारों का पुराना और सुधीर पाठक रहा है उसका नई दुनिया समाचार पत्र और उसके अधिकतम समय तक उसको चलाने और लोकप्रिय बनाने वाले अभय जी ना बोले और ना देखे भी अपनेपन का गहरा रिश्ता रहा है।* *हालांकि मेरी तो उनके उत्तरार्ध में खेल प्रशाल में विभिन्न संगठनों की सभाओं में मुलाकात होती रही उन्हें सुना उनके इस शहर को हर पैमाने पर खुबसूरत बनाने की उनकी चिंता और जुनून महसूस करता था।*

*मुझे याद है मेरा हरसिद्धि मंदिर और पंढरीनाथ मंदिर के बीच का आड़ाबजार का घर और फिर सामने कड़ावघाट पर “नई दुनिया” अखबार का प्रेस।** *प्रदेश में सबसे पहले घर की पहली मंजिल की खिड़की पर हाकर द्वारा फैंके गए अखबार की आहट से नींद खुलना  फिर भाई बहनों के बीच पहले समाचार पढ़ने के लिए खींचतान।*

*सबसे पहले हरिशंकर परसाई जी का साप्ताहिक कॉलम “सुनो भई साधो” और फिर अपने शहर की खबरों का अभयजी का साप्ताहिक कॉलम “गुजरता कारवां” । शहर के कोने कोने की छोटी बड़ी घटनाओं की रिपोर्टिंग।*

*छोटा था गर्व होता था देश का ऐसा लोकप्रिय और शानदार समाचार पत्र घर के पास छपता है।* 

*राहुल बारपुते जी और राजेन्द्र माथुर और भी सैकड़ों नामी साहित्य, कला और खेल के पत्रकारों, आलोचकों और समीक्षकों का जमावड़ा रहा।*

हमारी पीढ़ी के कितने ही लोग “नई दुनिया “पढ़कर शिक्षित दीक्षित हुए। हमारी पीढ़ी और इंदौर शहर अभय छजलानी जी के उस  “नई दुनिया”का हमेशा ॠणी रहेगी।

*वरना आज की” नई दुनिया ” मैं इंदौर से बाहर था उस दिन का नई दुनिया मेरे हाथ लग गया। एक दिन पहले सरकार ने किसानों की मांगें मानकर आंदोलन खत्म हुआ था पेपर में संपादकीय वाले पेज के सभी लेखों में सरकार के इस फैसले की आलोचना थी। उसके बाद मैंने 7 दिन तक “नई दुनिया” खरीदा इस संबंध में सातों ही दिन मोदी भक्त पत्रकारों के प्रमुख लेख और कई संपादकीय छपे।*

*आज की पत्रकारिता का यह हाल है।* मैं अपना अनुभव बताता हूं। सूत्रधार संस्था के सत्यनारायण व्यास जी और इंदौर प्रेस क्लब के सचिव अरविंद तिवारी जी ने इंदौर प्रेस क्लब में कविता पोस्टर कोने के आयोजन की बहुत ही अच्छी शुरुआत की।

पोस्टर के विमोचन के बाद जिस कवि के पोस्टर का विमोचन होता है उसकी कविता का पाठ तो होता ही है किंतु खुला मंच है कोई भी आए अपनी कविता,गीत और शायरी करें। उनके इस अनूठे प्रयास ने मुझ जैसे लोगों को गुजराती कालेज जाते वक्त छावनी वाले रोड पर बाईं ओर का चर्च का बोर्ड  याद दिला दिया  जिस पर लिखा था “जो चाहे सो आवे” मुझे बहुत आकर्षित करता था या लंदन का हाईड पार्क कोई भी आए और अपनी प्रस्तुति दे।

मैं पहले भी गीतकार शैलेन्द्र की कविता के पोस्टर के दिन भी गया था और अभी 25 मार्च को भवानी प्रसाद मिश्र की कविता पाठ वाले दिन भी। मैं तो 25 मार्च के शहीद पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की पूण्यतिथि और दो दिन पहले भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत पर शहीद फिल्म का गीत व क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश की कविता पाठ के लिए गया था। ऐसे आयोजन में भी प्रेस क्लब में उपस्थित कई पत्रकार ऑफिस में बैठकर गपशप करते हुए मिले। उन्हें ऐसे आयोजन में कोई रूचि नहीं दिखीं।

पत्रकारिता के इस सूखे में अभयजी जैसे लोग हमेशा याद आते रहेंगे।

श्रद्धा सुमन अर्पित 🌹

विजय दलाल

Ramswaroop Mantri

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