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कभी तो जाति टूटेगी जरूर…कभी तो साकार होगा ….अंबेडकर-लोहिया का दर्शन

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संजय कनोजिया की कलम से

हमारे देश की जाति व्यवस्था इतनी जटिल व उलझी हुई है, कि इसके बावजूद भी इस ओर कोई अभियान-आंदोलन की सफल रचना आज तलक नहीं रची गई…बुराई की इस अनुचित प्रथाओं पर यूँ तो अनगिनित पुस्तकें लिखी गईं, लेख लिखे गए, भाषण हुए, चर्चाएं चलीं, विद्वानों द्वारा वैज्ञानिक आधार पर चित्र, चल-चित्र का सौजन्य प्राप्त हुआ, गॉंव-गांव, क़स्बे-क़स्बे नाटक, नुक्कड़ नाटक, नौटंकी, कठपुतली, गीत-कविता-रागणी व साहित्य का मंचन होता रहा, लेकिन इसे कोई व्यावहारिक नहीं बना सका…जातिय व्यवस्था के खिलाफ़ जमीन पर उतरकर लड़ने वाले नेता तो दिखे, परन्तु अपने चुनावी लाभ की अभिलाषा ने उन्हें भी जातिय जंजाल के कुचक्र में ही उलझा दिया, जबकि जरुरत नेता की नहीं, “सुधारक” की थी…एक काल खंड ऐसा भी था जिसकी विषम-प्रस्थितयों ने जनमानस की मानसिकता इतनी गहरी जकड़ रखी थी कि दकियानूसी-पाखंड-अन्धविश्वास से सनी प्रथाओं पर उनका ये कहना कि सती-प्रथा कभी खत्म ना होगी, बाल विवाह जैसी प्रथा अनंत तक चलती रहेंगीं, विधवा विवाह को मान्यता कभी नहीं मिल सकती, खास-वर्ग को छोड़कर शिक्षा अन्य वर्गों में विभाजित हो नहीं सकती, कभी स्त्रियां भी शिक्षित होंगीं ये एक कोरी कल्पना मात्र है, लेकिन राजा राममोहन राय, अहिल्याबाई, विवेकानंद, ज्योतिराव फूले, सावित्री फूले, पेरियार सहित अन्य और भी महान सुधारकों ने अपने सघन अभियान और जनजागरण कर व अपने अथक प्रयासों से आम जनमानस को जागृत किया और इसी जागरण की बदौलत, आज़ाद हिन्दुस्तान के संविधान में क़ानून बना जिससे स्वस्थ्य समाज के बनने में बल मिला, परन्तु एक नवीन-स्वस्थ्य और उज्जवल समाज  की स्थापना तब ही पूरी होगी जब “जाति टूटेगी” !                         

 1950 के दशक के मध्य के पश्चात 1956 में पहली बार डॉ० अंबेडकर और डॉ० लोहिया के विचारों ने इस ओर गंभीरता से शुरूआती प्रयास, “रोटी और बेटी के रिश्ते” के फार्मूले पर अभियान चलाने की आपसी सहमति जताई थी…अंबेडकर और लोहिया समकालीन थे एवं दोनों का जातिवाद के विरोध का एक ही एजेंडा था…लोहिया पहले गैर शूद्र चिंतक थे जिन्होंने अंबेडकर को समझा, सुना, पढ़ा, और उनका नेतृत्व को स्वीकारने का मन बनाया था…लोहिया जाति के विरोध संघर्ष में अंबेडकर से ही प्रेरणा ग्रहण करते हुए उनकी परियोजना को आगे ही नहीं बढ़ाया बल्कि अधिक सकल व व्यावहारिक स्वरुप दिया…समाजवादी होते हुए भी लोहिया ने अंबेडकर के तर्क को और आगे ले जाते हुए, समाजवादियों की भ्रांतियों और उनके तर्क में दोषों की पहचान कराई…ये इत्तेफ़ाक़ ही है कि एक ऐसा समय भी सुनिश्चित हुआ कि दोनों की राजनैतिक यात्रा साथ-साथ चली लेकिन अंबेडकर-लोहिया आपस में व्यक्तिगत रूप से कभी नहीं मिल पाए…कम से कम उन दोनों के सार्वजनिक रूप से मिलने का कोई दस्तावेज या अन्य प्रमाण नहीं है…शायद  इसी कारण दोनों के वैचारिक साम्य की तलाश देर से शुरू हो पाई… 1956 में दोनों के मध्य पत्राचार शुरू हुआ और केवल 4 ही पत्रों द्वारा दोनों के मिलने की योजना बनी,लेकिन मुलाकात कभी नहीं हुई…6 दिसम्बर 1956 को अंबेडकर का परिनिर्वाण हो गया और इसी कारण दोनों महान चिंतकों के मिलकर काम करने की योजना पर विराम लग गया…अंबेडकर की रिक्तिता ने सबसे ज्यादा लोहिया को बेहद आहात किया, अपनी वेदना को उन्होंने अपने मित्र मधुलिमय को, 1 सितम्बर 1957 को लिखे एक पत्र के माध्यम से उजागर किया था…यदि अंबेडकर और लोहिया एक साथ चल निकले होते तो देश के काया-कल्प की तस्वीर कुछ और ही होती !                      

ऐसा नहीं की केवल लोहिया ही अंबेडकर से आकर्षित हुए, कांग्रेस से अलग हुए समाजवाद के आर्थिक मामलों पर कांग्रेस और कम्युनिष्टों ने भारी विरोध लोहिया की नीतियों का किया था, तब कांग्रेस और कम्युनिष्ट दोनों विचारधाराओं ने “क्लास” पर जोर दिया था  कि दो ही क्लास देश में स्थापित की जा सकतीं है, “अमीरी और गरीबी” जिसपर वर्तमान में दक्षिणपंथी (फासीवादियों) की सत्ता ने अपना रुख बनाया हुआ है…जिसका विरोध 1950 दशक के मध्य से पूर्व लोहिया ने किया था, उनका मानना था कि बात केवल क्लास की ही नहीं की जा सकती जब तक समाज में “Cast” (जाति) है, तब तक आप कास्ट को नहीं भुला सकते…क्लास में एक गरीब तो अमीर बन सकता है, लेकिन कास्ट इंसान का जीवन भर पीछा नहीं छोड़ती, वो उसके साथ मरने के बाद भी लगी रहती है, और जब तक कास्ट को नहीं तोडा जाएगा तब तलक क्लास की बात बेमानी रहेगी, कास्ट टूट सकती है यदि समाज में “रोटी और बेटी के रिश्ते” को एक कर दिया जाए…बस इन्ही शब्दों की गूँज की अनुगूंज जब अंबेडकर के जहन में आईं तो अंबेडकर भी लोहिया की ओर आकर्षित होते हुए मिलने को बेताब हुए थे…अंबेडकर-लोहिया दोनों ही मानते थे कि “जाति” प्रगति, नैतिकता, प्रजातान्त्रिक, सिद्धांतों और परिवर्तन का नकार है…12 ऑक्टूबर 1967 को मात्र 57 वर्ष की उम्र में  ही, लोहिया सबको अलविदा कह गए !                  

    बात कड़वी और कठोर लिखना चाहूंगा कि समाजवादी और अम्बेडकरवादी आंदोलनों ने, इन दोनों महान विचारकों के सिद्धांतों को एक सिक्के के दो रूप में नहीं लिया और यही कारण रहा कि शूद्रों को दो महानायक तो मिले उसके बावजूद शूद्रों का आंदोलन मात्र शूद्रों के तबके के हित साधन का उपकरण बनकर रह गया…आज जो हम बात करते है कि दलित-अति दलित, पिछड़े-अति पिछड़े की, यदि लोग अंबेडकर और लोहिया को साथ लेकर चलते तो ये जातियां आपस में यूँ ना बंटती, हालांकि दो बार अपने को राजनैतिक रूप से अम्बेडकरवादी और समाजवादी मानने वालों ने, जिनमे केवल सत्ता की प्राप्ति का ही मोह था, अंबेडकर और लोहिया की तस्वीर लगाकर उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 1995 में पहलीबार गठबंधन किया, राजनैतिक क्षेत्र में सामाजिक न्याय के मानने वालों के बीच इस गठजोड़ का स्वागत तो खूब किया गया, वोट के आधार पर कांशीराम और मुलायम का ये प्रयोग चुनावी परिणामों में तो सफल भी रहा, परन्तु सैद्धांतिक गठबंधन ना होने के कारण ये गठजोड़ मात्र 2 वर्ष में ही बिखर गया और उपहास बनकर रह गया…दूसरा गठबंधन 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती और अखिलेश यादव ने भी पिछले गठबंधन की ही तर्ज़ में आनन-फानन में गैर सैद्धांतिक व नीतियों के बगैर बनाया, सोशल इंजीनियरिंग जो सामाजिक न्याय की शक्तियों का हथियार है, बड़ी ही चालाँकि से फासीवादियों ने इस हथियार का इस्तेमाल कर इस गठबंधन की हवा निकाल दी, और गठबंधन तक टूट गया…इसके बाद तो मानो चाहे वो राजनैतिक रूप से ही सही लेकिन कार्येकर्ताओं के बीच शून्य खड़ा हो गया, चूँकि देश में अम्बेडकरवादी-समाजवादी विचारक सिपाहियों की कमी नहीं, बस जरुरत है इन सिपाहियों को एक सूत्र में पिरोकर ‘सुधारवाद की दिशा” में ले जाने की, अतः इसी आशा पर एक गैर राजनैतिक प्रायोगिक कार्येशाला का गठन 4 फरवरी 2021 को, दिल्ली में जिसको “बहुजन भाईचारा मैत्री मिशन” के नाम से देश भर में चलाया जायेगा…इस मिशन के संस्थापक सदस्य डॉ० एस.एन गौतम, पूर्व आई.आर,एस. अधिकारी कमल किशोर कठेरिया, वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण मांझी और में स्वयं संजय कनोजिया हैं !    ​               

    “बहुजन भाईचारा मैत्री मिशन” का उद्देश्य है कि “रोटी और बेटी के रिश्ते” वाले फार्मूले के आधार पर ही एक नई शुरुआत “टूंक रोटी और नमक” नामक सन्देश को लेकर अभियान चलाया जाए…जातियों के कुचक्र में सबसे बड़ी विडम्बना है, कि शूद्रों में अधिक जातिगत समन्वय ना के बराबर है, हक़-अधिकार हेतू सबके अपने-अपने जातिय संगठन स्थापित हो रखें है बल्कि जातिय वैमनस्य आपस में कूट-कूटकर भरा हुआ है, इसीलिए चतुर-चालाक वर्ग इनकी इसी कमजोरी का लाभ उठाता है, चाहे वो स्वर्णो के संगठन हों या फिर शूद्रों के ही, केवल सत्ता हासिल कर जाति तोड़ने कि लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती, ना ही जय भीम जय समाजवाद जय लोहिया कहने भर से और ना ही स्वर्ण वर्ग को गाली देने से, यदि हमे अपने महानायकों के दर्शन को गति देनी है तो हमे एक साथ बैठकर आपस में भाईचारा व मैत्री कायम करनी होगी, इसके लिए “बहुजन भाई चारा मैत्री मिशन” ने दिल्ली में एक दर्जन से भी अधिक कार्येक्रम आयोजित कर चुकी है…”टूंक रोटी और नमक” के सन्देश द्वारा 20-25-50 विभिन्न जातियों के लोग एक साथ बैठकर गंभीर स्वस्थ्य चर्चा-चिंतन, मनन कर एक दूसरे को नमक रोटी का टुकड़ा खिलाते हैं, कभी इसी तरह की बैठकों में दाल-रोटी, कभी खिचड़ी तो कोई-कोई चटपटी सब्जियां भी ले आते है…सामूहिक होकर खाते-खाते आपस में अपने-अपने कबीलों और कबीलों के स्थानांतरण, गांव, इतिहास, पूर्वजों के देश के प्रति योगदान या प्रशासनिक-सामाजिक उत्पीड़न, गौत्र, संस्कृति, रीति-रिवाज, खानपान आदि मामलों पर चर्चा करते हैं, क्यों और कैसे लोग मैला उठाने के काम में लगे, कोई कैसे जानवरों के चमड़े उतारकर जूते-चप्पल बनाने लगे, कोई कैसे कपडे धोने और कोई रंगने लगा, कौन जिम्मेवार था कबसे ये परंपरा शुरू हुई, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक लाभों से संख्या के आधार पर कैसे वंचित रहे, संख्या के आधार पर ही जाति का छोटा-बड़ा होने का मानक कैसे बना, और ‘रोटी और बेटी के रिश्ते” का क्या महत्व है ये क्यों जरुरी है, इन्ही सभी विषयों पर गंभीर चर्चा कर बड़े ही उत्साह सहित संगठित होकर समाज के “सुधार का संकल्प” लिया जाता है !                         

       ​जैसे-जैसे मिशन का अभियान अपनी गति पकड़ेगा और सुधारवादियों की संख्या का विस्तार होगा, तब “रोटी और बेटी के रिश्ते” को भी प्राथमिकता देने की शुरुआत की जाएगी…लोहिया आम जनसभाओं में महिलाओं की बिगड़ी स्थिति को लेकर बहुत प्रकाश डालते थे, जिनमे एक कथन बड़ा ही प्रमुख होता था और तब लोहिया की इन बातो का विरोध भी उनके विरोधी खूब किया करते थे…लोहिया कहते थे कि भारतीय महिलाओं को अपने पति के साथ ब्याह करके 8-9 बच्चे पैदा करने से अच्छा है कि वो अपने प्रेमी के साथ ब्याह कर एक बच्चे को ही जन्म दे जिससे भारत के मर्दवादी समाज का महिलाओं पर से नियंत्रण टूटे और वो स्वतन्त्र होकर जी सके…सही मायने में वर्तमान परिवेश में जाति तोड़ने का काम कुछ हद तक उन प्रेमी युगलों ने ही किया है, जिन्होंने समाज के द्वारा बनाये पाखंड का सामना करते हुए अन्तर्जातीय विवाह या प्रेम विवाह किया है…बहुजन मिशन उचित समय आने पर ऐसे प्रेमी-युगलों को देश के हर राज्य में सार्वजनिक सम्मानित करेगा व अन्तर्जातीय विवाहितों को सेना और प्रशासनिक पदों पर पात्रता देने सहित आरक्षण हेतू भी अपना अभियान चलाएगा…बहुजन मिशन कला, सांस्कृतिक उत्सवों सहित लेखन, जमीनी कार्येक्रम और सोशल-मीडिया द्वारा ज़ूम-बेबीनार चर्चाओं द्वारा प्रचार-प्रसार कर व्यावहारिक बनाने के लिए संकल्पित है !!“कभी तो जाति टूटेगी जरूर”.

..लेखक समाजवादी समागम के सक्रिय सदस्य एवं..बहुजन भाईचारा मैत्री मिशन के संस्थापक सदस्य है

Ramswaroop Mantri

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