
सुधा सिंह
मैंने देखा है कि गाँव के घरों, पेड़ों और झुरमुटों में गौरैयों का वास और उनके कलरव का मधुर स्वरगान होता था. बड़े और घने पेड़ों पर तो हजार तक उनकी संख्या होती थी, और उनका संयुक्त गान ऐसा मादकता पैदा करता था कि हर सुनने वाला उन स्वरलहरियों में खो जाता.

संयुक्त गायन के पहले उनका गाँव के ऊपर आकाश में इधर से उधर पैंतरेबाज़ी भरी उड़ानें होती थीं. फिर धीरे-धीरे उनका स्वर कम होता जाता और फिर एकदम शांत.
सभी गौरैये मानो शयनकक्ष में सोने चले जाते. सुबह होते ही यही क्रम फिर दुहराया जाता. चन-चन, चिन-चिन और चुन-चुन का झंकार भरी स्वरलहरियां एक अजीब शमां बांधती थीं.
ऐसा लगता था मानो सारी गौरैये मिलकर गांववासियों को उस प्रतिदान के रूप में सुबह और शाम गीत सुनाती थीं, जो उन्हें ग्रामीणों द्वारा उनकी जरूरतों के रूप में मुहैया कराई जाती. मड़ई, छप्पर, झुरमुट और मिट्टी की दीवारें उनकी शरणस्थली होती थीं, जहाँ वे अपने घोंसलों में सुरक्षित रहतीं और अंडे भी देती थीं, जो कुछ ही दिनों में अंडों से बाहर आकर आसमान में उड़ान भरने लगतीं.
गर्मी का मौसम आते-आते उनकी संख्या बहुत अधिक बढ़ जाती. छप्पर पर और आंगन में उनका झुंड के झुंड उतरना, अनाज या भोजन के दाने चुगना और फिर फुर्र करके उड़ जाना बड़ा ही मोहक लगता था. गर्मी बढ़ने पर हर घर में छाए में मिट्टी के बर्तन में उनके लिए ठंडा पानी रखा जाता, जिसे पीकर वे तृप्त हो जातीं.
आंगन या बाहर सहन की धूल में उनका लोटना, जिसे घर की औरतें नहान कहती थीं, हम बच्चों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था.
पर, आज वे सारे दृश्य स्मृतियों तक सिमट कर रह गए हैं. बाग-बगीचे तो कट ही गए, गाँव के भीतर के पेड़ भी कट गए. अब तो कहीं-कहीं सहजन के कुछेक पेड़ बचे हुए हैं, जिन पर कभी-कभार कोई गौरैया दो-चार की झुंड में दिखाई देती हैं.
आखिर सिमेंट के जंगल वे मंगल कैसे मनातीं? गाँव और गांववालों के लिए अब वे अवांछित बन गई हैं. कोई अब उनके बारे में सोचता तक नहीं. किसी को इसकी कोई परवाह ही नहीं है कि गाँव में गौरैयों का ऐसा अकाल क्यों है?
पत्थर के घर में रहते-रहते सभी खुद भी पत्थर के हो गए हैं. अब तो घरों में आंगन और बाहर सहन तक नहीं हैं. उन्हें घर से बेघर कर दिया गया है. अंडे देने के लिए भी कहीं कोई जगह नहीं. बैलों से खेती का रिवाज ही खत्म हो गया.
गाय और भैंस भी अब सबके घरों में नहीं हैं. अब वे एक शरणार्थी की तरह एकाकी जीवन यापन के लिए मजबूर हो गई हैं. आज के बच्चों या जवानों पर इसका कोई असर शायद न हो, पर जिन लोगों ने उस परिदृश्य को देखा है और देखकर कभी आनंदित हुए हैं, उनके लिए यह दृश्य किसी पीड़ा से कम नहीं है.
हम पहले गाँव के न सिर्फ लोगों को, बल्कि सभी घरों के जानवरों और पक्षियों तक को पहचानते थे. अब तो लोग अपनों को भी पहचानने से इंकार कर रहे हैं.
अपने-आप में सिमट कर रहने वालों के लिए ऐसा होना भले ही स्वाभाविक लगे, पर हमें तो यही लगता है कि हमारा अपना कुछ खो गया है.





