
–सुसंस्कृति परिहार
छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपनी रचना ‘राम की शक्ति पूजा’ जो पौराणिक – मिथकीय प्रसंग पर आधारित एक लंबी प्रबंधात्मक कविता है । इस कविता के कथानक का मुख्य आधार बांग्ला भाषा की रचना ‘कृतिवास रामायण’ है लेक़िन निराला ने अपनी मौलिक कल्पनाओं को भी इसमें समाहित करते हुए इसे नए कलेवर में प्रस्तुत किया है। राम की शक्तिपूजा का संवेदनात्मक उद्देश्य रचना के देश और काल तथा समाज के संदर्भ में ही खोजा जा सकता है निराला ने राम की शक्ति पूजा में राम को अंतर्द्वंदों से संपृक्त कर उसे अलौकिकता से उठाकर लौकिक धरातल पर स्थापित किया है।इसे आत्मसात कर ही इसे पढ़ा जाना चाहिए।
इस प्रकार राम आधुनिक भावबोध से जुड़ते दिखाई पड़ते हैं। ‘राम की शक्ति पूजा ‘ में निराला ने रावण जय -भय की आशंका को दूर करते हुए शक्ति की मौलिक कल्पना द्वारा शक्ति को अर्जित किया है।यह कविता अपने देश और काल के संदर्भ में भारत की मुक्ति की लड़ाई से जुड़ जाती है क्योंकि इसमें जिस शक्ति की प्रतीकात्मक पूजा है, वह अपने स्वरूप में भारत माता की छवि है, असल में वह प्रतीकात्मक रूप में भारत की जनशक्ति है जिसे न्याय के पक्ष में होना है।खास बात ये है कि युद्ध की निराशा के अलावा शक्ति पूजा से पहले और अंत के समीप भी राम निराश दिखते हैं। जहाँ पहली निराशा मात्र घटनाओं से है, वहीं दूसरी निराशा स्वयं शक्ति और तीसरी निराशा स्वयं के जीवन से है।
इस कविता का सार निराला ने यह बताया कि एक दिन राम रावण युद्ध अनवरत जारी था। युद्ध भूमि में राम का रण कौशल क्षीण हो रहा था। वो जो भी बाण चलाते वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाता। तब राम युद्ध भूमि में दिव्य दृष्टि से देखे की वास्तव में आज क्या कारण है कि आज युद्ध में मेरा प्रभाव क्षीण हो रहा है। तो उन्होंने देखा कि आज तो साक्षात दुर्गा (शक्ति) रावण के रथ पर आरूढ़ है। तब राम किसी भी तरह युद्ध की आचार संहिता अर्थात् सूर्यास्त तक इंतजार किए। युद्ध से लौटकर जब उस दिन राम रात्रि विश्राम के समय अपने सेना नायकों के साथ शिला पट्ट पर बैठे थे तो पहली बार उनके नेत्र से आंसू गिरे। इस घटना से आहत होकर जाम्वंत ने पूछा प्रभु क्या बात है आज आपके नेत्र से आँसू। इस पर राम ने मात्र इतना ही बोला की अब ये युद्ध मैं जीत नहीं पाऊंंगा। जब पूरी सृष्टि जानती है कि मैं सत्य की रक्षा के लिए युद्धरत हूँ तो फिर शक्ति को मेरे साथ होना चाहिए। आज दुर्गा अन्यायी के साथ है। “जिधर अन्याय शक्ति उधर”
यही मेरे आत्मीय कष्ट का कारण है। अन्यायी शक्तियाँ काफी संगठित है सबसे मूल बात यह है कि डर उनकी सबलता के कारण नहीं बल्कि मूल्यपरस्त शक्ति के उनसे हाथ मिलाने के कारण है। राम कहते है नैतिक मूल्यों की समझ पर यह गहरी चोट है। हर संक्राति कालीन युग में सात्विक विवेक को यह सनातन चोट इसी तरह कचोटती है। राम की व्यथा वस्तुत: मानव मन की जानी पहचानी हुई व्यथा है।
“रावण अधर्मरत भी, अपना, मैं हुआ ऊपर” इस व्यथा को विभिषण समझ नहीं पाते मगर जाम्वन्त तुरंत समझ जाते है वे राम को सलाह देते है:-“आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर, शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन” आराधन वैयक्तिक लाभ-अर्जन की प्रक्रिया है रावण इसी से जुड़ा है इसके प्रत्युत्तर में दृढ़ आराधन बाह्म शक्ति से आंतरिक शक्ति के संतुलन की प्रक्रिया हैऔर यह तभी संभव है जब राम इस लड़ाई को व्यक्तिगत हानि-लाभ से ऊपर उठकर पूरे जगत के लिए लड़े। अर्थात् आराधन व्यक्ति परक है और दृढ़ आराधन लोक मंगल परक और इस दृढ़ आराधन से ही शक्ति का मौलिक उद्रेक होगा। वह हुआ।की अवरोध सामने आए किंतु विजय न्याय की हुई।
यह युद्ध सामान्य युद्ध नहीं है। यह राम-रावण का युद्ध उतना नहीं जितना यह रामत्व और रावणत्व के बीच का युद्ध है। हर युग में रावणत्व के खिलाफ राम संघर्ष करता है। रावणत्व बार-बार पराजित होता है तथा हर नए युग में वह फिर सर उठाता है। कवि का कहना है कि रावणत्व एवं रामत्व के बीच होने वाला युद्ध कभी खत्म नहीं हुआ यह युद्ध अपराजेय और निरंतर है। इस युद्ध में राम की चिंता का सबसे बड़ा कारण है “अन्याय जिधर है उधर शक्ति” यहीं चिंता निराला के युग की भी चिंता थी और आज तो यह चिंता कुछ अधिक ही प्रासंगिक है। आज जो लोग दिन रात सत्य को साथ लिए कार्यरत हैं पसीने उनको आज जीवन की मूलभूत सुविधाएं भी मयस्सर नहीं है और जो जितना झूठा, कपटी ,छली है वो दिन दूना रात फल फूल रहा है।
वर्तमान परिदृश्य ऐसा ही है किंतु राम के दृढ़ आराधन का जो दौर प्रारंभ हुआ है उससे लगता है ‘होगी जय ,होगी जय / हे पुरुषोत्तम नवीन ।’






