*नरेन्द्र कुमार
दिल्ली के अग्नि दुर्घटना में 50 के आसपास मजदूर स्वाहा हो गए। मजदूरों की जीवन स्थिति के बारे में किसी टीवी चैनल में जोरदार बहस नहीं हुई। पिछले 30 वर्षों में लगातार पूंजी के पक्ष में श्रमिकों के खिलाफ कानून बनाकर मालिक तथा सरकार का संयुक्त हमला हुआ जिसे न्यायपालिका ने नजरअंदाज कर इस क्रूर अभियान का हिस्सेदार बना। श्रम कानूनों में आए बदलाव का आर्थिक सामाजिक संबंधों में जो सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन आया कि आज की तारीख में मजदूर अपने पेशे के अनुरूप किसी एक कारखाने में लंबे समय तक काम कर पाने की स्थिति में नहीं है। अक्सर उसे काम से हटा दिया जाता है। वह कभी गांव लौट कर खेती करने लगता है या फुटपाथ पर सब्जी अंडे और दूसरी चीजें बेचने लगता है या फिर दूसरे शहर या फैक्ट्री में काम की तलाश में निकल जाता है। मजदूर वर्ग अपनी पहचान खोता जा रहा है।
इस क्रूर हमले में बुद्धिजीवी और सिद्धांतकारों ने भी कम पाप नहीं किया है। पूंजी के पैरोकार इन बुद्धिजीवियों ने पिछले दशकों में नए-नए सिद्धांत गढ़कर उत्पादक शक्तियों के रूप में मजदूर वर्ग, यहां तक कि किसान वर्ग के भी सामाजिक महत्व को नकार दिया है। इसने मजदूर आंदोलन को विखंडित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है । गांव के परिवेश में जातीय समूह में बंटा यह श्रमिक वर्ग– दलित तथा पिछड़े समुदाय से या आदिवासी क्षेत्रों से ज्यादा आते हैं, लेकिन श्रम शक्ति बेचे जाने वाली मंडी में पहुंचकर यह सभी मजदूर बन जाते हैं जिनकी श्रम शक्ति को रोज, महीने और साल के हिसाब से मालिक लोग खरीदते हैं। यहां इनकी पहचान मजदूर वर्ग के रूप में अतीत में स्थापित होता था लेकिन अब तो उन्हें ट्रेड यूनियन में संगठित करने वाली पार्टियां ही जब पहचान की राजनीति को आगे बढ़ाते हुए उन्हें दलित, पिछड़ी जाति माइनॉरिटी आदि समूह में बांट रहे हैं, तब इनकी एक मजबूत मजदूर वर्ग के संगठित संगठन के नेतृत्व में संघर्ष का कमजोर हो जाना स्वभाव भाविक है।
सब ने मिलकर एक ऐसा माहौल बनाया कि मजदूर आंदोलन प्रतीकात्मकता से आगे नहीं पढ़ पाता है। कई बार तो ऐसे मजदूरों के ऊपर होने वाले हमले या उनके शोषण उत्पीड़न को भी उनकी पहचान और जातीय दायरे में उछाल दिया जाता है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि मजदूर के रुप में उनकी सीधे-सीधे पूंजी के मालिकों और राज्य से संघर्ष है और उनके खिलाफ एकजुट हुए बिना इनकी समस्याओं का कोई रास्ता नहीं निकल सकता है। एशियाई देश भारत बांग्लादेश नेपाल और देश आदि की जीडीपी दर बढ़ाने के ख्याल से पूंजी के निवेश को लुभाने की आतुरता में सरकारों ने श्रमिकों की सुरक्षा और उनके स्वास्थ्य के ख्याल को बुरी तरह नकार दिया है। कई वर्ष पहले बांग्लादेश में गारमेंट इंडस्ट्री ऐसे ही पुराने खंडहरों में चलाने के कारण मकान के मलबे में दबकर शहीद हो गए।
पूरा मध्य वर्ग ,बौद्धिक वर्ग और मीडिया श्रमिक वर्ग को समाज का नागरिक तो छोड़ दीजिए, उपेक्षा और तिरस्कार भाव से देखता है। चारों तरफ पूंजी के मालिकों का गुणगान होता है उन्हीं के अरबपति खरबपति होने की चर्चा होती है, यशोगान होता है। मजदूर कहीं चर्चा में नहीं है। मजदूरों के सवाल और मांग की चर्चा क्यों हो रहा है, यह विचार करने का समय है। दिल्ली के अग्रिम कांड में शहीद हुए मजदूरो के लिए न्याय की हम इस सरकार और न्याय प्रणाली से उम्मीद नहीं करते हैं, लेकिन मजदूरों के सामाजिक प्रवर्ग के लिए बात करती राजनीतिक पार्टियों से तो हम यह उम्मीद कर ही सकते हैं कि मजदूर वर्ग की स्थिति इतनी दयनीय क्यों हो गई है, इस पर विचार करने के लिए ,उन्हें संगठित करने के लिए, उनके राजनीतिक महत्व को स्थापित करने के लिए ,हमें एक प्लेटफार्म पर बैठना चाहिए, एकजुट होना चाहिए।
*नरेन्द्र कुमार*





