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इंदौर के आजादी के दीवानों की कहानियां….उम्र के इस पड़ाव में उनके मन में आज भी देशभक्ति का जज्बा वैसा ही है

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इंदौर

पूरा देश 15 अगस्त को आजादी की 74वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है जबकि सबसे पहला स्वतंत्रता दिवस 1947 में मनाया गया था। तब देश के लिए लड़ने वाले हजारों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी इसमें शामिल होकर आने वाली पीढ़ी के लिए देशभक्ति का जज्बा जगाते थे। प्रभातफेरियां निकाली जाती थी, वृक्षारोपण किया जाता था और देशभक्ति व मंगलगान गाए जाते थे। इसमें इंदौर के भी हजारों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जो आजादी की लड़ाई लड़ने वाले दीवानें अपनी ही धुन के पक्के थे। कुछ साल पहले शहर में 732 स्वतंत्रता सेनानी थे जिनमें से अब इनकी संख्या गिनती की है। उम्र के इस पड़ाव में उनके मन में आज भी देशभक्ति का जज्बा वैसा ही है और नई पीढ़ी को भी यही संदेश देना चाहते हैं। वतन के रखवालों का देश के प्रति कैसा था जज्बा जानिए उनकी और उनके उत्तराधिकारियों की जुबानी…।

Freedom fighter fighter anand mohan mathur

नाथूराम ने गांधीजी को गोली मारी तो स्वतंत्रता सेनानी नत्थूराम ने अपना नाम ही बदल दिया

नरेंद्र सिंह तोमर शहर से 25 किमी दूर ग्राम पिवडाय में रहते हैं। 4 मार्च 1923 का जन्म है। अब शरीर थक चुका है, लेकिन कुछ देर बैठ लेते हैं और कही गई बातों को समझ लेते हैं। कुछ साल पहले पैरालिसिस अटैक के आने के कारण तब ये बोल नहीं पाते। परिवार के लोग खुद इन्हें अपने हाथों से चाय-नाश्ता, भोजन कराते हैं। बेटे योगेश्वर के मुताबिक कोरोना संक्रमण में भी परिवार ने उन्हें कांच के बर्तन की तरह सहेज कर रखा। खास बात यह कि आज भी ये संतुलित आहार लेते हैं और फिर हाथ से थाली दूर कर मना कर देते हैं।

वयोवृद्ध नत्थूसिंह अपने बेटे योगेश्वरसिंह के साथ। स्व. इंदिराजी ने उन्हें ताम्रपत्र दिया था।

वयोवृद्ध नत्थूसिंह अपने बेटे योगेश्वरसिंह के साथ। स्व. इंदिराजी ने उन्हें ताम्रपत्र दिया था।

दादा गीत गाकर देशभक्ति का अलख जलाते थे

योगेश्वर के मुताबिक तब हम छोटे थे लेकिन बताते हैं कि पूरे गांव में प्रभातफेरी निकाली गई थी। 15 अगस्त 1947 को गांव में अशोक के वृक्ष का रोपण हुआ था और पर्व काफी धूमधाम से मनाया गया था। यहां अशोक के वृक्ष को आज भी लोग काफी पूजते हैं। पिता जब अच्छे थे तो अपने जेल के किस्से हमें बताते थे। वे कहते थे कि आजादी के पहले देश अंग्रेजों का गुलाम था। तब कांग्रेस के नेता आते थे तो वे लोगों को समझाते थे कि देश को आजाद करना है। ऐसे में लोगों में आजादी के प्रति अलग अलख जगे व इसके लिए भीड़ एकत्रित हो तो दादा (पिता) के गीत स्टेज पर गाए जाते थे। तांगे में डोंगी पिटी जाती थी कि आज नरेंद्रसिंह तोमर के गीत सुभाष चौक या राजबाडा चौक पर होंगे। ऐसे में हजारों की भीड़ एकत्रित होकर बड़े ध्यान से सुनती थी और उनमें देशप्रेम की भावना जागती थी। स्थिति यह थी कि जब दादा के गीत से भीड़ बहुत हो जाती तो दादा को बैठाकर नेताओं के भाषण चालू होते थे तो फिर जब जनता भाषण बिना सुने जाने लगती थी तो तो फिर से दादा के गीत शुरू कर दिए जाते थे और भीड़ रुक जाती थी। इसी कारण तब इन्हें गिरफ्तार किया गया। आंदोलन के दौरान वे कई बार जेल गए।

सम्मान निधि लेने से मना कर दिया था

बकौल योगेश्वर पिता का जन्म का नाम नत्थूसिंह था लेकिन जब नाथूराम गोडसे ने गांधीजी को गोली मारी तो उन्हें अपने नाम से इतनी नफरत हुई कि उन्होंने अपना नाम बदलकर नरेंद्रसिंह तोमर कर लिया। जेल रिकॉर्ड में भी उनका नाम नत्थूसिंह था। 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र से सम्मानित किया तो उसमें उनका नाम नत्थूसिंह उर्फ नरेंद्रसिंह तोमर लिखा गया। तब उज्जैन में इंदिराजी ने एक वृद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को गले ताम्रपत्र पहनकर घूमते देखा तो बहुत दुख हुआ और सभी सेनानियों के लिए सम्मान निधि स्वरूप 250 रु. प्रति माह की पेंशन शुरू की। इस पर पिता ने उसे लेने से यह कहकर मना किया कि हम देश को आजाद कराने के लिए इसलिए जेल नहीं गए थे कि हमें मुआवजा मिले।

धर्म निरपेक्षता की मिसालआज भी घर में पीरबाबा दरगाह पर इबादत

तब मां टीचर थी और उन्हें 150 रु. प्रति माह मिलते थे। इस पर परिवार के लोगों ने उन्हें समझाया कि जीवन यापन के लिए सम्मान निधि लेना ठीक रहेगा क्योंकि हम छह भाई और एक बहन भी छोटे थे। इस पर पिता बमुश्किल तैयार हुए। खास बात यह पिता शुरू से ही धर्म निरपेक्ष रहे। उन्हें सभी जाति के लोगों से लगाव रहा। उन्होंने सालों पहले घर में ही पीर बाबा की दरगाह स्थापित की है जिसे आज भी परिवार के लोग उसे रोज पूजते हैं, इबादत करते हैं

अधिकार सभी चाहते हैं कर्त्तव्य निभाना कोई नहीं चाहता

योगेश्वर का कहना है कि यह देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि लोगों को आजादी का सही मतलब समझ में नहीं आया। लोग अधिकार चाहते हैं लेकिन कर्त्तव्य निभाना कोई नहीं चाहता।। पहले जब ग्राम पंचायत के चुनाव होते थे। तब गांव के लोग सारे बुजुर्गों को इकट्‌ठा करते और कहते थे कि आज अपने गांव के लिए सरपंच चुनना है। तो सभी ये निश्चित करते थे कि फलां व्यक्ति सम्मानित है, उसे सरपंच बनाते हैं। आज दुर्भाग्य यह है कि सरपंच का चुनाव लड़ने के लिए 20-25 लाख रु. खर्च किए जाते हैं। राजनीति अब व्यापार हो गई है। लोग खुद के घर के सामने पड़ी गंदगी की सफाई करने की भावना नहीं रखते। आजादी अभी भी सही ढंग से नहीं मिली है और न ही नैतिकता का कोई मापदंड है। रुपयों से सरकार गिरा दी जाती है।

लोग जज्बा कायम रखें व सपनों को साकार करें

95 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी (एडवोकेट) आनंद मोहन माथुर को अफसोस है कि आज भी आजादी के बाद का सपना पूरा नहीं हुआ है। वे आजादी की लडा़ई के किस्से बयां करते हैं कि कि 9 अगस्त 1942 बंबई (अब मुंबई) में बहुत बड़ी अखिल भारतीय कांग्रेस की सभा हुई हुई थी जिसमें गांधीजी उपस्थित थे। उन्होंने नारा दिया था कि ‘करो या मरो, अंग्रेजों भारत छोड़ो’। इस पर देश का हर नौजवान आजादी के लिए मर मिटने के लिए तैयार रहता था। इस दौरान तब गांधीजी गिरफ्तार कर लिए गए थे। पं. जवाहर नेहरू, अब्दुल कलाम आजाद आदि को भी गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया था। इसमें इंदौर के नेताओं को भी 10 अगस्त को गिरफ्तार कर लिया गया था। तब सेनानी मनोहरसिंह मेहता को कहा गया था कि आप बाहर बैठे मदद करें। मेरा कार्य क्षेत्र उज्जैन, इंदौर, शाजापुर था जहां मैं जाता था और लोगों को संगठित करता था। फिर वहां मेरा वारंट निकलता था तो मैं दूसरी जगह चला जाता था। हमने 26 जनवरी 1943 भी बड़ी धूमधाम से मनाया था।

आनंद मोहन माथुर

आनंद मोहन माथुर

उन्होंने कहा कि मुझे दुख है कि हमने जो सपने देखे थे वे पूरे नहीं हुए। गरीब बच्चों को फ्री शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएं भी नहीं मिल रही है। हमारी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं व बोलने की आजादी नहीं है। हमारी बात सुनी नहीं जा रही है, यह सोचा नहीं था। सोचा था कि पहली कक्षा से लेकर उच्च शिक्षा फ्री में रहेगी और कोई भी व्यक्ति फ्री में इलाज करा सकेगा। लोगों से कहता हूं आप अपना जज्बा कायम रखें और हमारे सपनों को साकार करने का प्रयास करें।

आजादी के लिए बहुत लंबी लड़ाई लड़ीअब देश उन्नति करता रहे

95 वर्षीय रखबचंद बावेल पत्नी शशिकला के साथ।

95 वर्षीय रखबचंद बावेल पत्नी शशिकला के साथ।

देश के लिए आजादी की लड़ाई लड़ने वाले 95 वर्षीय रखबचंद बावेल इंदिरा गांधी नगर में रहते हैं। सात साल से पीठ की तकलीफ के कारण पूरी तरह से बिस्तर पर हैं। अब इन्हें दिखाई-सुनाई नहीं देता। परिवार में पत्नी शशिकला, सात बेेटे व एक बेटी हैं। इनमें से एक बेटा व बेटी की मौत हो चुकी है। पोता अक्षय सीएस है। अक्षय ने बताया कि जब मैं छोटा था तो वे आजादी के किस्से सुनाते थे। कई बार जेल भी गए। पत्नी शशिदेवी ने बताया कि पति ने आजादी के लिए बहुत लड़ाई लड़ी। पहली बार आजादी का जश्न इंदौर में मनाया था और फिर पति गांव-गांव जाकर लोगों में आजादी मिलने की खुशियां बांटते थे। बावेल दम्पति की कामना है कि देश उन्नति करता रहे।

बहू भाग्यश्री तात्या टोपे व लक्ष्मीबाई की तरह जज्बा रखें

तात्या टोपे परिवार की तीसरी पीढ़ी की बहू भाग्यश्री।

तात्या टोपे परिवार की तीसरी पीढ़ी की बहू भाग्यश्री।

1857 की क्रांति में विशेष योगदान देने वाले योद्धा तात्या टोपे के परिवार की पांचवीं पीढ़ी लोकमान्य नगर में रहती है। तीसरी पीढ़ी की बहू भाग्यश्री पति स्व. रमेश टोपे (76) , उनके बेेटे विपुल, मुकुल व बहू विजया सहित परिवार के सभी लोग तात्या टोपे के बलिदान दान को याद कर गौरवान्वित होते हैं। विपुल ने बताया कि हमें गर्व हैं कि हम उनके ‌‌‌वंशज हैं। तात्या का जन्म 1814 में येवला (नासिक) में हुआ था। 1857 की क्रांति में उनका विशेष योगदान था। उन्होंने व महारानी लक्ष्मीबाई ने नाना साहब के नेतृत्व में अंग्रेजों से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहूति दी थी। तात्या को 1859 में शिवपुरी में अंग्रेजों की हुकुमत ने फांसी की सजा सुनाई थी। बहू भाग्यश्री का कहना है कि नई पीढ़ी को चाहिए कि वे देश के लिए तात्या टोपे व महारानी लक्ष्मीबाई जैसा जज्बा रखें।

अमर शहीद लाला हुकुमचंद जैन : देश के प्रति वफादार रहें

अमर शहीद लाला हुकुमचंद जैन परिवार के पांचवीं पीढ़ी के अजय जैन।

अमर शहीद लाला हुकुमचंद जैन परिवार के पांचवीं पीढ़ी के अजय जैन।

अमर शहीद लाला हुकुमचंद जैन का परिवार वैसे तो हांसी (हरियाणा) में रहता था। तब शहीद लाला ने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए। उन्हें इसी साल फांसी दी गई थी। इसके बाद परिवार का बिखराव शुरू हुआ और अब उनकी पांचवीं पीढी के अजीत जैन का परिवार जेल रोड, इंदौर में रहता है। यहीं परिवार का इलेक्ट्रिक आइटम का व्यवसाय है। परिवार के उनके दस्तावेजी यादों व फोटो को सहेजे हैं। अजीत का यही कहना है कि लोग देश के प्रति वफादार रहे। देश बस ऐसा ही तरक्की करता रहे।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए प्रतिबद्ध उत्तराधिकारी संगठन

मामले में देश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की हर समस्या, सेवा और सम्मान के लिए संस्था गीता रामेश्वरम, नेताजी सुभाष मंच एवं अ.भास्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन सक्रिय हैं। उत्तराधिकारी संगठन के प्रदेश अध्यक्ष मदन परमालिया व पूर्व विधायक सत्यनारायण पटेल सालों से इनके लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इंदौर में 732 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जिनमें से अब 8-9 ही जीवित हंैं। इनका और इनके परिवारों व वंशजों का ध्यान रखना हर आमजन का कर्त्तव्य है। इन तीनों संस्थाओं ने 9 अगस्त को इन वयोवृद्ध सेनानियों व उनके ‌वंशजों के घर-घर जाकर इनका शाल, श्रीफल व सम्मान पत्र से सम्मानित किया। ये संस्थाएं सालों से यह काम कर रही है। शहर में अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉदत्तात्रय कापसे, बंसीलाल पाण्डे आदि भी हैं जो अब काफी वृद्ध हैं और बोल-सुन नहीं सकते। इनके परिवार के लोग इनके प्रति काफी सजग हैं।

Ramswaroop Mantri

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