1990 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रचार हेतु मान्यवर कांशीरामजी दिनांक 21 फरवरी 1990 को ब्यौहारी (शहडोल ) मध्य प्रदेश से रीवा आनेवाले थे, रीवा में मेरे निवास्थान एल आई जी 70 बोदाबाग कॉलोनी रीवा में उनके रुकने की व्यवस्था थी, रात 8 नौ बजेतक वह रीवा पहुंच जाएंगे ऐसी सूचना मिली थी, चूंकि रीवा में मै अकेले ही रहता था अतः मैने हमारे साथी श्री बुद्धसेन माड़व को साहब का खाना उनके घर में बनाकर डिब्बा लाने का जिम्मा दिया था। साहब देर रात 10 बजे मेरे निवास स्थान पहुंचे,घर पर कुछ कार्यकर्ता इकठ्ठा थे 5 10 मिनट बातचीत करने के बाद साहब मुझसे कहने लगे
” मै बहुत थका हु, मुझे खाना दे दीजिए ,मुझे नींद आ रही है “
मैने बुद्धसेन माड़व जी को खाना ले आने को कहां, बुद्धसेन माड़व जी ने मुझे करीब बुलाया और कान में कहने लगे, खाना तो नहीं है, इलाहाबाद के कार्यकर्ताओं ने खाना खा लिया, उनकी बात सुनकर तो मेरे होश ही उड़ गए, मेरे पैर के नीचे की जमीन खिसक गई ,मैने उन्हें फिर से खाना बनाकर लाने को कहा, बुद्धसेन जी का घर मेरे घर से 3 किलोमीटर की दूरी पर था, वे गए स्वाभाविक है जाकर फिर खाना बनाना और फिर ले आने में समय लग रहा था,साहब भी समझ गए होंगे, साहब ने मुझसे कहा ” घर पर जो कुछ है वही खिला दो मुझे बहुत नींद आ रही है ” मै तो मेरिड बैचलर था, घर पर क्या हो सकता है! मैने 2 अंडे उबाले, कुछ नमकीन कुछ बिस्किट और एक गिलास दूध गरम करके साहब के पास रख दिया, साहब वह खाकर सो गए।
चुनाव प्रचार प्रसार के लिए इलाहाबाद से भी कार्यकर्ता आए थे, इधर बुद्धसेन भाई ने अपनी पत्नी को साहब के लिए खाना बनाना है यह निर्देश दिया होगा, यहां की औरते और वह भी वाल्मीकि समाज की पति से ज्यादा सवाल जवाब करती नहीं, कौनसे साहब? कहां से आ रहे है ? यह जाने बिना उन्होंने खाना बना दिया। अब इलाहाबाद से आए कार्यकर्ता ने बुद्धसेन के बेटे जिसका नाम प्रभात है उनसे पूछा कुछ खाने को मिलेगा ? प्रभात अपने अम्मा के पास गया, अपनी अम्मा से कहने लगा” साहब लोगो के लिए खाना है! उसकी अम्मा ने कहा हां है ना! और थाली परोस दी, अम्मा को यह पता नहीं वह जिनको खाना परोस रही है वो वही साहब है जिनके लिए खाना बनाया गया, और बुद्धसेन के बेटे को यह पता नहीं कि मान्यवर कांशीरामजी का खाना उनके यहां बना है! इस तरह साहब का खाना इलाहाबाद के कार्यकर्ता खा गए। साहाब को बिना खाना खाए ही उस रात सोना पड़ा।
दूसरे दिन सबेरे मैने साहब को गार्गल करने के लिए गरम पानी दिया, नहा धोने के बाद चाय और बिस्किट दिए, बुद्धसेन माड़व जी की तरफ से नाश्ता आया हेवी नाश्ता करने के बाद मान्यवर कांशीरामजी जिस सफेद एंबेसेडर में आए थे उस एंबेसेडर में चुनाव प्रचार के लिए जीपों की रैली के साथ निकल पड़े, कार में साहब के साथ मै बुद्धसेन माड़व और श्रीमती विमला सोधियाजी थी।हम लोग मनगवा रीवा विधान सभा क्षेत्र में जा रहे थे गांव के कच्चे रास्ते, भरी दोपहरी की धूप, चारों तरफ धूल उड़ रही है कुछ कुछ धूल कार के भीतर भी आ रही थी, साहब हल्का सा मुस्कुराते हुए कहते है
” यार तुम लोग खाना तो खिलाते नहीं धूल खिलाते हो “
मान्यवर कांशीरामजी की 92 वी जयंती के अवसर पर विनम्र अभिवादन





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