मैं पचास रुपए जेब में लेकर मामा के इस आश्वासन के साथ भोपाल से दिल्ली चला आया था कि मुझे नौकरी ज्वाइन करते ही सैलरी तो मिल ही जाएगी।
इस घटना का जिक्र मैंने कल किया। कई लोगों ने मेरे पास संदेश भेजा कि संजय सिन्हा जी, 1988 में 50 रुपए इतने नहीं होते थे कि आपके 31 दिन उसमें कट जाते।
एक छोटी-सी घटना आपको सुनाता हूं। मैं छोटा था। सर्दियों के दिन थे, मां को कहीं किसी के घर जाना था। घर में कोई नहीं था। मां ने मुझे छत पर एक मोढ़े पर धूप में बिठा दिया, हाथ में एक अमरूद देकर कि तुम यहीं धूप में बैठना, मैं अभी आती हूं।
मां ने कहा था, मैं चुपचाप बैठ गया था। मां पड़ोसी के घर चली गई, फिर वो चली आई और दोपहर में पिताजी के लंच में घर आने का समय हो गया था तो मां खाना बनाने लगी। वो भूल गई कि उसने बेटे को छत पर बैठने के लिए कहा है।
मैं बैठा रहा। अचानक काफी देर बाद मां को याद आया…. वो भागी-भागी ऊपर आई। मैं वैसे ही मोढ़े पर बैठा था। चुपचाप। हाथ में अमरूद लिए। धूप तेज हो गई थी, पर मैं अपनी जगह से हिला नहीं था।
आगे की कहानी लंबी हो सकती है, बुरी हो सकती है, मां के आंसुओं से सराबोर हो सकती है लेकिन मेरे लिए ये कहानी सिर्फ आदेश की तरह है। मां के कहे की कहानी भर।
मामा ने कहा था कि पचास रुपए रख लो, मैंने तो वो भी नहीं सोचा था। क्यों सोचता? एमजी वैद्य सर, जो भोपाल में डॉ. एव्ही बालिगा रूसी अध्ययन संस्थान चलाते थे, की प्रेरणा से मैं पत्रकारिता में आया था, और उन्होंने मेरे लिए एक इंतज़ाम दिल्ली में कर दिया था। उन्होंने मेरे लिए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस, जो बंगाली मार्केट के पास था तीन-चार दिनों के लिए एक कमरा बुक करा दिया था। वहां मुझे रहने, खाने का खर्चा नहीं देना था। सिर्फ तीन या चार दिनों के लिए।
उसके बाद मामा ने अपने एक जज दोस्त को फोन कर दिया था, जो किदवई नगर में रहते थे। वहां भी रहने-खाने का खर्चा नहीं देना था। और?
और इस तरह महीना निकल जाना था। पान, सिगरेट, गुटका, शराब का खर्चा नहीं था। फिर खर्चा क्या था? रोज बस में चलने के लिए 45 पैसे का डीटीसी का टिकट।
मामा ने हिसाब लगा लिया होगा। वैसे भी तब डीआईजी होते हुए उनकी सैलरी से पचास रुपए एक्स्ट्रा नहीं निकलते थे, ये मैं भी जानता था। तो मैं दिल्ली चला आया थाा।
(मोटा मोटी राम भरोसे)
मैं जानता था कि इस देश में बहुत से लोग दिल्ली मुंबई बिना चवन्नी लिए भी पहुंच जाते हैं, और फिर शुरू होती उनकी संघर्ष और कामयाबी की कहानी।
मुझे बिना पैसों के जीने का अभ्यास मां के निधन के तुरंत बाद ही हो गया था। आपको पता ही है कि मैं एक बार साधुओँ की टोली के साथ पटना से दिल्ली और फिर कश्मीर पहुंच गया था। और फिर किसी तरह घर लौटा भी था। साधुओं के साथ मैं गया था इस नश्वर संसार से मोह-भंग होकर।
और दिल्ली मैं आया था एक नए संसार में प्रवेश हेतु, मोह-युक्त होकर।
तीन दिन कट गए जेएनयू के गोमती गेस्ट हाऊस में। वो जगह मेरे ऑफिस से पास थी, पैदल आने-जाने लायक़। फिर भी पहले दिन रास्ता नहीं मालूम था, तो पांच रुपए निकल गए थे आटो में।
और तीन दिनों बाद मैं पहुंच गया था जज अंकल के घर। जज अंकल भी मेरे मामा जैसे ही थे। वही ईमान का भूत सवार था। तब कोई कितना भी बड़ा अधिकारी होता, चाहे लाख सुविधाएं (घर, गाड़ी, नौकर) हों, लेकिन ईमानदार था, तो उसकी सैलरी उतनी ही होती थी, जितने से 30 दिन गुजर जाएं।
जज अंकल की तीन बेटियां थीं (चौथी भी थी, लेकिन वो भोपाल में थी)। दो मुझसे बड़ी, एक छोटी। एक बेटा भी था। जज अंकल का तीन बेडरूम का मकान था। एक में जज अंकल। दूसरे में तीनों बेटियां। तीसरे में बेटा। रुकिए, मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा कि वो किदवई नगर वाला सरकारी मकान तीन कमरों का था या दो ही कमरे थे, एक ड्राइंग रूम, एक बरामदा। क्योंकि मुझे जगह मिली थी ड्राइंग रूम में।
लगता है उम्र का असर हो रहा है, मेमोरी लॉस हो रही है। एकदम से भूल ही गया हूं कि वो मकान कैसा था? अब तो वो टूट चुके हैं और वहां ऊंची सरकारी इमारतें बन गई हैं। जज आंटी पहले ही संसार से जा चुकी थीं, जज अंकल जज होने के साथ-साथ संत हो गए थे। एक बेटी पत्रकार थी, दूसरी-तीसरी पढ़ रही थीं। बेटा भी पढ़ रहा था।
तीन-चार दिनों में ही पता चल गया कि वहां गुजारा नहीं है। मेरी ड्यूटी लगी थी रात 8 बजे से रात 2 बजे तक। अब 8 बजे तो मैं निकल गया 45 पैसे की बस में सवार होकर आईटीओ के पास एक्सप्रेस बिल्डिंग। पर रात में?
राम नाथ गोयनका ने नहीं, जस्टिस पालेकर ने यह व्यवस्था पत्रकारों के लिए की थी कि रात 11 बजे के बाद ड्यूटी कर जो भी पत्रकार घऱ जाएगा, उसके लिए कंपनी को गाड़ी देनी होगी। तो अपने लिए एक स्टेशन वैगन कंपनी की तरफ से भेड़-बकरी की तरह हमें बिठा कर निकलती। जिसका घर पहले आता, वो पहले उतरता। उसमें भी गाड़ी में लड़की हुई तो पहले वो, भले उसका घर दूर हो।
तो मैं अक्सर रात तीन बजे, साढ़े तीन बजे जज अंकल के घर के बाहर घंटी बजाता। घंटी की आवाज सुन कर छोटी वाली बेटी दरवाजा खोलती और फिर मैं चुपचाप ड्राइंग रूम में चला जाता।
अब कोई मेरे लिए जगा रहे, दरवाजा खोलने के लिए ये तो मेरी ओर से अत्याचार था।
मेरे मामा का बेटा उस समय जेएनयू में पढ़ रहा था और वो झेलम हॉस्टल में रहता था। छुट्टी के दिन मैं उसके पास गया। अपनी समस्या उससे साझा की। पहले तो वो मुस्कुराया, “अच्छा है भैया कोई आपके लिए जागती है…, “फिर मेरे धर्म संकट युक्त चेहरे को देख कर उसने कहा कि आप ऐसा कीजिए कि मेरे पास हॉस्टल चले आइए।
मैं अपना बक्सा लेकर पहुंच गया जेएनयू।
वो पूरी कहानी एक अलग संघर्ष गाथा है। इतना सब हो गया था मेरे पचास रुपए में। अभी कुछ रूपए बचे भी थे और कई दिन भी बचे थे।
मेरे ममरे भाई के कमरे में उसका एक रूम साझेदार भी था- कोई दक्षिण भारतीय। शुरू में हमने दोनों बिस्तरों को जोड़ कर तीन के सोने का जुगाड़ किया। मैं रात में चुपके से आता, चुपचाप सोता और सुबह किसी को फर्क नहीं पड़ता था। मामा का बेटा हॉस्टल मेस में जाकर खाना खाने की जगह थाली में भर कर डबल खाना लाता और हम दोनों उसे खा लेते। उसने मेरी बहुत मदद की। उसकी एक गर्ल फ्रेंड भी थी, वो भी मेरी दोस्त हो गई थी। तो इस तरह हम तीन की तिकड़ी बन गई थी। गर्ल फ्रेंड गंगा हॉस्टल में रहती थी।
अति परिचय होत है, अरुचि अनादर भाए।
धीरे-धीरे ममेरे भाई का जो रूम मेट था, उसे मेरी मौजूदगी खटकने लगी। इस चक्कर में एक दो बार ऐसा हुआ कि मैं गंगा हॉस्टल के सामने पार्क में बने बेंच पर एक कंबल लेकर सोया। सुबह उठ कर मैं नहा-धो कर तैयार हो जाता और किसी तरह दिन काटता था। लेकिन इसका एक लाभ हुआ। मुझे पता चला कि जेएनयू कैंपस से सटा हुआ ही है IIMC (भारतीय जन संचार संस्थान)। भविष्य में मैंने वहां आवेदन किया, और मेरा सेलेक्शन हो गया तो दिन काटने का झंझट तो खत्म हो गया था। इधर इस काटा-काटी में महीना भी निकल ही गया था। तो एक तारीख को मुझे पहली सैलरी मिली थी बतौर ट्रेनी 1100 रुपए।
अब मैं अमीर हो गया था।
लेकिन अब हॉस्टल में रहना मुमकिन नहीं था। कई घटनाएं घटीं, उनकी चर्चा फिर कभी। जनसत्ता में मेरे एक मित्र बने इंद्र कुमार जैन। उन्हीं दिनों उनका ट्रांसफर हो गया मुंबई। वो काका नगर में एक आंटी के घर पेइंग गेस्ट थे। पांच सौ किराया और उसी में बिजली बिल, कभी-कभी नाश्ता और खाना भी।
इंद्र कुमार जैन ने मेरी भरपूर मदद की। वो मुंबई चले गए और कमरा मुझे दे गए। साथ में एक फोल्डिंग चारपाई, गद्दा, कंबल और कुछ अपनी कमीज भी।
उस दौर को याद करता हूं तो याद आता है कि कुछ लोग आपके जीवन में सचमुच मददगार बन कर आते हैं, और वो मदद सुनने में छोटी लग सकती है, लेकिन बड़ी होती है।
मेरे शुरुआती दिनों में मैं एक्सप्रेस बिल्डिंग के पीछे दोपहर में खाना खाने गया था, चार रुपए का खाना। लेकिन वो मेरा पहला ही महीना था, और पचास का हिसाब कमजोर हो रहा था। उन्हीं दिनों में से किसी एक दिन मेरे खाना खा कर निकलने के बाद Sanjaya Kumar Singh ने मेरे चार रुपए का भुगतान कर दिया था और बिना बताए हुए चले गए थे। तब मेरी उनसे दोस्ती भी नहीं हुई थी। वो सीनियर थे और अलग डेस्क पर थे। मैं जेनरल डेस्क पर, वो राज्य डेस्क पर। बाद में हम एक हुए और जो एक हुए तो आज तक एक ही हैं। वो पूरी कहानी आपको पता है। लेकिन वो चार रुपए राहत के मरहम की तरह थे।
इतनी लंबी कहानी क्यों?
बात चली थी पत्रकारिता की। मार्च 1988 के 31 दिन मैंने काटे थे पचास रुपए में। बिना चेहरे पर शिकन के। बिना पिताजी, मामाजी को कभी ये लिखे या बताए कि फांके के दिन कट रहे हैं। उन दिनों में एक दिन ये भी शामिल है कि एक बार डीटीसी की बस की दिल्ली में हड़ताल हो गई थी और मैं आटो नहीं कर सकता था, तो एक्सप्रेस बिल्डिंग से रात नौ बजे मैं जेएनयू के लिए निकला था (उस दिन शिफ्ट दोपहर 3 से 9 की थी)। अगर मैं ग्यारह बजे तक रुक भी जाता तो मुझे कंपनी की गाड़ी नहीं मिलती, क्योंकि मेरी शिफ्ट 9 बजे रात में पूरी हो चुकी थी। हमारे जेनरल मैनेजर सुदर्शन कुमार कोहली नियमची थे और स्टाफ उनसे डरता था।
मैं रात में जेएनयू के लिए चला, मुझे नहीं पता कि वो दूरी कितनी थी, पर मैं सुबह तीन बजे हॉस्टल पहुंचा और चुपचाप लॉन में सीमेंट के बेंच पर बिना कंबल लिए सो गया था। हल्की सर्दी थी, मुझे बुखार हो गया था।
छत पर गर्मी से बुखार हुआ था, जेएनयू में सर्दी से।
दोनों यादें रह गई हैं। मैं पत्रकार था। सहने की आदत डालनी थी। सभी ने कहा था सैलरी कम मिलेगी। मैं सैलरी का रोना कभी नहीं रोया। मैंने अपने पांव का आकार घटा लिया था, छोटे से चादर में सिमटने के लिए।
लंबी कहानी है। कहानी शुरू यहां से हुई कि मैंने मामा से सीखा था कि जितना है, उतने में जीना आना चाहिए। कम हो तो कम खाना चाहिए। और मामा के उस ज्ञान का मैंने आजीवन पालन किया।
कई लोग बिना जाने तोहमत लगाते हैं कि कांग्रेस काल में ये लोग…
जी नहीं। बिल्कुल नहीं। कभी नहीं। एक बार भी नहीं। और हम तो डेस्क पर थे, रिपोर्टर नहीं थे। बाहर खाना, प्रेस कांफ्रेंस में गिफ्ट रिपोर्टर को मिल सकते थे या नहीं मिल सकते थे, लेकिन अपने को क्या? न चाह थी, न राह थी।
इसलिए आप जब बिना विचारे आरोप लगाते हैं तो आरोप की अहमियत घट जाती है। बाद में ज़ी न्यूज़ मैं रिपोर्टर बना। टीवी में मेरी सैलरी बढ़ी। मेरी पत्नी टाटा में गई। वहां उसकी सैलरी बढ़ी। हम अमेरिका गए, वहां मेरी किताब छपी तो डॉलर मिले। और फिर हमने बीएमडब्लू कार, मर्सडीज कार, सब खरीद कर, बेच कर अपने शौक पूरे किए। लेकिन सौ फीसदी अपनी कमाई के दम पर। खुल्ले में।
फिर नौकरी छूटी, तो कई लोगों के मन में प्रश्न उठा कि इस सरकार में दाल नहीं गली?
दाल तो जितनी गलनी थी, इसी सरकार में गलनी थी। पहले अपने पास दाल ही नहीं थी, दाल की चाहत ही नहीं थी। मोदी राज आया 2014 में और संजय सिन्हा पहली बार चैनल हेड बने 2014 में। इस तरह दाल आ गई थी, लेकिन दाल खाने का मन ही नहीं था। साल 2021 तक तो जो लोहा थे, चुंबक से जाकर सट गए थे। लेकिन सोना चुंबक में कब और कैसे सटता?
आप कहेंगे कि अपने मुंह से खुद को सोना कह रहे हैं संजय सिन्हा?
तो मुझे याद आया, अमेरिका में मेरी एक पड़ोसन थी। मेरी बहन जैसी सुंदर। तो मैने पहली मुलाकात में उसे बहन बुलाया। इंडियन थी, पति से दोस्ती हो गई थी- तो एक दिन खाने पर मैंने बहन से कहा कि तुम तो हीरा हो हीरा।
उसने थोड़ा शर्माते हुए कहा था, नहीं भैया, हीरा या सोना तो नहीं, आप चांदी कह सकते हैं।
हम हंस पड़े थे। आज मैं आपसे कह रहा हूं कि आप सोना न कहें, लेकिन चांदी तो कह ही सकते हैं अपने संजय सिन्हा को। यकीन मानिए, सोशल साइट पर खुले में कह रहा हूं, भ्रष्टाचार का एक मौका नहीं आने दिया जीवन में। आठ आने की भी बेईमानी नहीं की। न वैचारिक रूप से, न आर्थिक रूप से।
पिताजी, मामा का ज्ञान मेरे पास था। मां का मान मेरे पास था। मेरे जेहन में ये भय हमेशा रहा, रहता है कि एक दिन कभी न कभी मां के पास जाऊंगा तो क्या मुंह दिखलाऊंगा? मां क्या कहेगी, इतनी कहानियां सुना कर तुम्हे पाला बेटा, और तुम…?
ये मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा भय है। यही मेरी सबसे बड़ी ताकत है। शक न कीजिए, भरोसा कीजिए। जो कह रहा हूं, वही सच है। 24 कैरेट सोने जितना खरा सत्य।
नोट-
2. कैलकुलेटर पर जोड़ लीजिए, 50/31 = 1.61
3. पूरा महीना इतने में गुज़रा और मैं विचलित नहीं हुआ। राह में आए इन 31 दिनों में जितने भी मददगार थे सबका मैं ताउम्र शुक्रगुज़ार हूं, रहूंगा।
4..और सिर्फ इसी दम पर मेरा सबसे प्रिय डॉयलॉग है, मैं झुकता नहीं साला…![]()
5.. तस्वीर 1988 की, IIMC Campus की
6.. इसका एक हिस्सा शायद कल ![]()
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