अग्नि आलोक
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कथा गंडूपद जी की

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 (केंचुआ को संस्कृत भाषा में किंचुलुक या गंडूपद कहते हैं.)

       ~ सुधा सिँह

     प्राचीन काल की बात है I भारतवर्ष के किसी पूर्वी जनपद में एक गंडूपदजी निवास करते थे I गंडूपदजी उदार माता-पिता की संतान थे, सो उनके पास कोई काम नहीं होता था I अतः वह इधर-उधर निष्प्रयोजन रेंगा करते थेI

     साहित्य-कला की सर्जनात्मक क्षमता से तो वंचित थे लेकिन सुसंस्कृत होने की दुर्निवार इच्छा के वशीभूत बौद्धिकों के समूहों के बीच रेंगते हुए पहुँच जाते थेI 

      जनपद के अलग-अलग बौद्धिक समूहों में ईर्ष्या-जनित प्रतिस्पर्द्धा और षड्यंत्र स्वाभाविक तौर पर चलते ही रहते थे!

गंडूपद जी उच्च श्रेणी के कर्णीजप (चुगलखोर) और द्विजिह्व (दो जीभ वाले) थे I वह अत्यंत कुशलता से नमक-मिर्च लगाकर इधर की बातें उधर और उधर की इधर किया करते थे और बौद्धिकों के बीच उग्र विवादों की अग्नि प्रज्ज्वलित करके चुपचाप आनंद-विभोर हुआ करते थेI

     बौद्धिक संगति से प्राप्त सूक्तियों को आत्मसात करके वह एक पल्लवग्राही आभासी विद्वान भी बन चुके थे I साथ ही अलग-अलग विद्वानों के अध्ययन-कक्षों से वह पर्याप्त पुस्तकें भी  चौर्य-कला की सहायता से हस्तगत कर चुके थेI

उसी नगर में निपुणिका नाम्नी एक दासी-कन्या भी निवास करती थी, जिसका गंडूपद जी से परिचय था I निपुणिका ने गंडूपदजी से पूछा,”आर्य, आपका मेरुदण्ड क्यों नहीं है ? उसके अभाव में आपको रेंग-रेंग कर चलने में कितना कष्ट होता है!”

     गंडूपदजी अपनी लज्जा छिपाते हुए बोले,”यह प्रभु का वरदान है I रेंगने की विशिष्टता के कारण मैं भूमि के निकट रहता हूँ और ज्ञान-प्राप्ति के लिए कहीं भी पहुँच सकता हूँ I और हे बालिके ! तू इतनी अज्ञानी है कि यह भी नहीं जानती कि ज्ञानार्जन में अतिव्यस्त जनों का मेरुदण्ड विलम्ब से विकसित  होता हैI”

   निपुणिका अपने अज्ञान पर लज्जित हुई और गंडूपद जी से क्षमा माँगकर अपने मार्ग पर प्रस्थान कियाI

उधर ज्ञान के पर्याप्त सूत्र, चौर्य-कर्म से अर्जित पुस्तकें और उत्तराधिकार में प्रचुर स्वर्ण-मुद्राएँ प्राप्त कर लेने के बाद गंडूपदजी को वह क्षुद्र जनपदीय नगर यश-प्राप्ति के उद्देश्य के लिए अत्यंत अपर्याप्त और लघुकाय लगने लगा.

      उससमय तक हस्तिनापुर का वैभव चरम पर पहुँच चुका था I सभी महत्वाकांक्षी कवियों-कलावन्तों-दार्शनिकों-विद्वानों-राजनीति-विशारदों और श्तेव-श्याम धन के स्वामी महावणिकों का वह केंद्र बन चुका था I 

      गंडूपदजी ने सोचा कि जिन कलाओं और क्रीड़ाओं के वह महारथी बन चुके हैं, उनके प्रदर्शन के लिए और प्रसिद्धि नामकी गणिका के साथ विहार-विलास के लिए उपयुक्त नगर तो हस्तिनापुर ही हो सकता है I फिर तो विलम्ब का कोई कारण नहीं था!

 हस्तिनापुर में स्थापित होकर बौद्धिक जगत की वीथियों-उपवीथियों में रेंगने का काम तत्काल प्रारम्भ कर देने लायक स्वर्ण-मुद्राएँ गंडूपदजी की मंजूषा में थीं ही I सो वह तत्क्षण हस्तिनापुर की दिशा में प्रस्थान कर गएI अतिशीघ्र वह वहाँ बौद्धिक वृत्त में स्थान पा भी गए यद्यपि वह स्थान पृष्ठभाग में शौचालय के निकट थाI

     पर गंडूपदजी ने इसकी रंच-मात्र चिंता न की और बिना विलम्ब किये, इधर-उधर रेंगते हुए, बहुतेरे विद्वानों के अन्तःपुरों में और अन्तरंग संगतियों में प्रवेश पाते हुए अपने प्रिय कर्म में संलग्न हो गएI

उधर दासी निपुणिका भी आजीविका के लिए इधर-उधर भटकती हुई हस्तिनापुर पहुँची I एक दिन कला-केन्द्रों के परिक्षेत्र में पृष्ठभाग की एक अर्द्ध-प्रकाशमान उपवीथिका पर सहसा उसने गंडूपद जी को रेंगते हुए देखा और आश्चर्य से चीख पड़ी ! उसने पुकारा,”गंडूपद जी ! कैसे हैं!

     आपकी ख्याति तो शनैः-शनैः इस महानगर में भी प्रसारित होने लगी हैI किन्तु आपके मेरुदण्ड की अस्थि क्या अभी तक विकसित नहीं हुई ?”

      “नहीं मूर्ख कन्या ! यहाँ तो अनेक ऐसे लोग हैं जिनका मेरुदण्ड है ही नहीं ! मेरा मेरुदण्ड तो विकसित हो चुका है, किन्तु उन दुर्भाग्यशाली मित्रों का अनुरोध मैं अस्वीकार नहीं कर पाता और कभी कोई तो कभी कोई मेरा मेरुदण्ड उधार माँग ले जाता हैई

       ऐसे में मैं पूर्व की भाँति रेंगते हुए ही बौद्धिक जगत के मार्गों और वीथिकाओं पर निकल पड़ता हूँI निरर्थक गृहबंदी सा बैठा तो नहीं रह सकता न ! सो रेंगते हुए ही कला-साहित्य और विचार जगत की सेवा में निकल पड़ता हूँ!”

      गंडूपद जी ने तिरस्कार-मिश्रित स्मित हास्य के साथ कहा और रेंगते हुए निकट की रंगशाला की दिशा में मुड़ गएI

Ramswaroop Mantri

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