सन्दीप तोमर
शाम का वक्त था। अविनाश ऑफिस से लौटकर सीधे रसोई में घुसा। गैस पर दूध रखा, बच्चों के लिए ब्रेड-ऑमलेट बनाया और चुपचाप उनकी प्लेट में परोस दिया। रिया और आरव— दोनों छोटे-छोटे, माँ की बीमारी को समझ तो नहीं पाते थे, पर घर की उदासी को महसूस ज़रूर करने लगे थे।
कमरे में स्वाति बिस्तर पर लेटी थी, वही एक जगह, जहाँ पिछले आठ महीनों से उसकी दुनिया सिमटी हुई थी। दायाँ हिस्सा पूरी तरह बेकार हो चुका था— चेहरे से लेकर पैर तक। बोलती थी तो शब्दों में दरारें होतीं, लेकिन आँखें अब बहुत कुछ कहने लगी थीं।
वो वही स्वाति थी, जिससे अविनाश ने प्यार से शादी की थी। खूबसूरत, तीखी आँखों वाली, ज़िंदादिल। पर शादी के कुछ ही सालों में उसका व्यवहार बदलने लगा। किसी भी महिला सहकर्मी से अविनाश की दोस्ती, फ़ोन कॉल, ईमेल, यहाँ तक कि फ़ेसबुक पर कोई पुरानी तस्वीर भी, स्वाति को बर्दाश्त नहीं होती थी।
“मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, लेकिन कोई और तुम्हारी ज़िंदगी में क्यों है?”
“वो सिर्फ़ दोस्त है, तुम्हें क्यों लगता है हर औरत मुझसे प्यार करती है?”
“मुझे नहीं पता, लेकिन मैं तुम्हें बाँट नहीं सकती। किसी से भी नहीं।”
इन झगड़ों में प्यार की गर्मी भी थी, और ईर्ष्या की आग भी। कई बार अविनाश ने ग़ुस्से में कहा, “शायद तुम मुझसे प्यार नहीं, मुझ पर हक जताना जानती हो।” और स्वाति चुपचाप रो पड़ी थी।
लेकिन अब आठ महीनों से सबकुछ उल्टा था।
एक बार अचानक काम पर से लौटे अविनाश को पता चला कि स्वाति बाथरूम में गिर गई थी। आधा चेहरा लटका हुआ, बोलने में दिक्कत, हाथ-पैर बेकार। डॉक्टर ने कहा, “लकवा है, तेज़ टेंशन और ब्लड प्रेशर की वजह से।”
शुरू में अविनाश भीतर ही भीतर ग़ुस्से और ग्लानि के बीच झूलता रहा। क्या यह उसी अविश्वास का नतीजा था जो स्वाति हर रोज़ अपने भीतर उगाती थी? लेकिन अब शिकायत की कोई जगह नहीं थी।
अब दिन-रात का एक ही क्रम था—बच्चों का स्कूल, ऑफिस की भागदौड़, घर की देखभाल, और फिर रात को स्वाति की दवा, पट्टी, फिज़ियोथेरेपी। वह थक चुका था, लेकिन फिर भी कुछ न कुछ खींचता जा रहा था।
एक रात, जब बच्चे सो चुके थे और कमरे में केवल ऑक्सीजन मशीन की धीमी आवाज़ सुनाई दे रही थी, स्वाति ने बहुत धीमे से कहा—
“अविनाश…”
“हूँ?” वह पास आया।
“तुमसे एक बात कहनी है।”
“क्या?”
“तुम दूसरी शादी कर लो।”
वो चौंक गया। जैसे कानों ने धोखा दिया हो।
“क्या कहा तुमने?”
“तुमने सुना, मैं चाहती हूँ कि तुम दूसरी शादी कर लो। कोई तुम्हारे लिए हो… बच्चों के लिए माँ जैसी हो… और मेरे लिए भी…”
“तुम! तुम ये कह रही हो?” अविनाश की आवाज़ कांप रही थी।
“हाँ… मैं कह रही हूँ। क्योंकि अब मैं तुम्हारे लिए सिर्फ़ बोझ बन गई हूँ। तुम्हारे समय, तुम्हारे जीवन, तुम्हारी नींद पर। और मुझे डर है, अगर मैं नहीं रही तो ये बच्चे… ये कैसे पलेंगे?”
उसकी आवाज़ टूट रही थी, पर आँखें एकदम स्पष्ट थीं।
“लेकिन तुम तो कभी किसी से मेरी बात तक बर्दाश्त नहीं करती थीं…”
“शायद… शायद वही मेरी भूल थी। प्यार को मैंने अधिकार समझ लिया। अब जब मैं बिस्तर पर पड़ी हूँ, तो तुम्हारी आँखों के नीचे गहराते काले घेरे और तुम्हारे झूठे मुस्कान की कीमत समझ आई है।”
अविनाश की आँखों में आँसू थे।
“स्वाति… मैं तुमसे भागा नहीं। मैंने साथ छोड़ा नहीं। तुम हो, यही बहुत है। मैं ज़िंदा हूँ, बच्चे ठीक हैं, यही काफ़ी है।”
वो पहली बार मुस्कराई। लकवे की मारी उस मुस्कान में एक अधूरा-सा वक्र था, लेकिन उसमें एक गहराई थी— स्वीकृति की, क्षमा की, और प्रेम की।
“तो बस… जब कभी तुम्हें लगे… कि तुम्हें कोई चाहिए… मेरी तरफ़ से ‘अनुमति’ है।”
वो रात चुपचाप बीत गई। सुबह वही दूध, वही स्कूल, वही काम। लेकिन आज अविनाश के भीतर कुछ बदल गया था।
वह केवल एक पति या पिता नहीं था— वह एक ऐसा इंसान था, जिसे उसकी पत्नी ने पहली बार पूरी तरह समझा और मुक्त किया।
*** *** ***समय धीरे-धीरे बहता रहा। स्वाति अब बोलने लगी थी, बहुत सीमित, लेकिन भाव समझा सकने लायक। दाहिना हिस्सा अब भी अशक्त था, पर फिजियोथेरेपी ने कुछ सुधार लाया था। अब वह व्हीलचेयर पर बच्चों को स्कूल बस तक छोड़ने के लिए बाहर दरवाज़े तक आती, कभी-कभी उन्हें खाने के डिब्बे में अपने काँपते हाथों से छोटी चॉकलेट भी रख देती।
अविनाश का चेहरा भी अब कुछ शांत दिखने लगा था। वह थकता तो अब भी था, लेकिन उसके भीतर एक स्थिरता आ चुकी थी— जैसे जीवन ने उसे कठोर बनाकर भीतर से नरम कर दिया हो।
बच्चे अब बड़े हो रहे थे। रिया नौ की हो चुकी थी, आरव सात का। दोनों समझदार भी थे और संवेदनशील भी।
एक दिन आरव ने पूछा, “पापा, मम्मा ठीक कब होंगी?”
अविनाश ने कुछ पल सोचा, फिर बोला, “धीरे-धीरे बेटा… समय लगेगा, लेकिन मम्मा बहुत कोशिश कर रही हैं।”
दोपहर में, जैसे ही अविनाश ने ऑफिस से छुट्टी ली और अस्पताल में स्वाति की फॉलोअप रिपोर्ट लेकर लौटा, उसे स्कूल से एक फोन आया— रिया ने ड्राइंग प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार जीता था, पर माँ-बाप में से कोई नहीं जा सका।
वो रात अविनाश को बहुत भारी लगी।
उसने बच्चों को सुलाया, फिर स्वाति के कमरे में गया, उसने धीरे से कहा— “तुमने कभी कहा था कि मेरी ज़िंदगी में किसी को लाने की अनुमति देती हो… याद है?”
स्वाति ने हौले से सिर हिलाया।
“मैं नहीं जानता था उस दिन कि ये विचार भी कभी ज़िंदगी में दस्तक देगा… लेकिन अब लगता है… कि बच्चों को माँ जैसा स्नेह चाहिए, और मुझे…।”
स्वाति की आँखें खुली की खुली रह गईं, लेकिन आज वह रोई नहीं।
“कोई है?” उसने बड़ी मुश्किल से पूछा।
अविनाश थोड़ी देर चुप रहा।
“हाँ… है न… रचना… हमारे पुराने स्कूल में बच्चों की काउंसलर। विधवा है, कोई परिवार नहीं… बच्चों से बहुत लगाव रखती है। और वह जानती है कि तुम मेरी पत्नी हो… और हमेशा रहोगी।”
स्वाति की आँखों में कुछ तिर गया। शायद जलन, शायद अपराधबोध… और शायद एक असहाय स्वीकृति।
“क्या वह मुझसे मिलना चाहेगी?”
अविनाश मुस्कराया।
“उसी ने कहा था कि जब तुम चाहो, हम तीनों मिल सकते हैं।”
कुछ दिन बाद रचना घर आई। सादा साड़ी, बिना मेकअप, आँखों में स्नेह और चेहरे पर संकोच लिए। उसने स्वाति के पास जाकर बैठते हुए धीरे से कहा— “मैं आपके जीवन में कोई जगह लेने नहीं आई हूँ… मैं बस आपके बच्चों को थोड़ा माँ जैसा स्नेह देना चाहती हूँ… और आपको थोड़ा आराम।”
स्वाति ने उसकी हथेली थाम ली। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उसके मुंह से कुछ शब्द निकले- “मैं… तुम्हें… स्वीकार करती हूँ…” फिर, बहुत धीमे से बोली- “क्योंकि मुझे अब समझ में आया है कि प्रेम बाँटने से कम नहीं होता बल्कि बढ़ता है।”
रचना की आँखें भर आईं।
अगले महीने मंदिर में एक सादा-सा विवाह हुआ। रिया और आरव ने फूल बरसाए। रचना ने सफेद साड़ी पहनी, स्वाति के कहने पर।
फोटोग्राफर ने तीनों की एक तस्वीर खींची— अविनाश, रचना, और व्हीलचेयर पर बैठी स्वाति। तस्वीर के पीछे एक पंक्ति लिखी गई:
“कभी-कभी प्रेम का सबसे सुंदर रूप, अनुमति में छिपा होता है।”

सन्दीप तोमर
जन्म: जून 1975
जन्म स्थान: खतौली (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा: स्नातकोत्तर (गणित, समाजशास्त्र, भूगोल), एम.फिल. (शिक्षाशास्त्र) पी.एच.डी. शोधरत
सम्प्रति: अध्यापन
साहित्य: 4 कविता संग्रह , 4 उपन्यास, 3 कहानी संग्रह , एक लघुकथा संग्रह, एक आलेख संग्रह सहित आत्मकथा प्रकाशित।
Ø हिन्दी प्रचारिणी सभा कैनेडा द्वारा कराई लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा “वाजिब कीमत” को तृतीय पुरस्कार, इस प्रतियोगिता में मिली दो हजार रुपये की राशि एक पढ़ने में होशियार परंतु आर्थिक रूप से कमजोर बच्ची के कपड़ो पर खर्च की
Ø साहित्य सरोज द्वारा कराई गयी कहानी प्रतियोगिता में कहानी “नया सवेरा” को द्वितीय पुरसप्रारंभिक लेखन के समय प्रारंभ, मुक्ति, प्रिय मित्र, अनवरत अविराम इत्यादि साझा संकलन में बतौर कवि सम्लिमित हो चुके हैं।
सृजन, नई जंग, हम सब साथ साथ, अभिनव इमरोज जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में बतौर सह-संपादक/अतिथि संपादक सहयोग।
हंस, पाखी, सरस्वती, कथाक्रम. कथाबिंब, प्राची, नूतन कहानियाँ, गगनांचल, आधुनिक साहित्य, अभिनव इमरोज, स्रवंति, निकट, क्षितिज, संरचना, लघुकथा-कलश, दृष्टि, पलाश, विशुद्ध स्वर, नवल, विश्वगाथा, विभोम स्वर, शुभ तारिका, इत्यादि हिन्दी पत्रिकाओं में सतत रचनाओं का प्रकाशन
दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी, राजस्थान पत्रिका इत्यादि समाचार-पत्रों में रचनाएँ प्रकाशित
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षा, आलोचना, व साहित्यिक-सामाजिक आलेख प्रकाशित
लघुकथा डॉट कॉम, पुरवाई, साहित्य कुञ्ज, शब्दांकन, सेतु, रचनाकार,शब्द-बिरादरी, स्त्रीकाल, इरा, इत्यादि वेब पत्रिकाओं में कहानी, कविता, लघुकथा, नज़्म और समीक्षाओं का लगातार प्रकाशन
तेलुगु, उड़िया, कन्नड़, नेपाली, इत्यादि भाषाओँ में रचनाएँ अनुदित
रामदरश मिश्र, ममता कालिया, दीप्ति गुप्ता सहित विभिन्न साहित्यिक हस्तियों के साक्षात्कार प्रकाशित, साथ ही विभिन्न पत्रिकाओं में विभिन्न साहित्यिक व्यक्तियों द्वारा मेरे लिए साक्षात्कार प्रकाशित
सम्पर्क: ड़ी 2/1 जीवन पार्क,
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