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*कहानी – यंत्रणागृह*

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  (हिटलरयुगीन जर्मन सर्जक अर्न्स्ट टोलर की कृति का भाषिक रूपांतर)

✍ कुमार चैतन्य 

स्टुटगार्ट के खुफ़िया पुलिस के अफ़सर ने उस मरते हुए नौजवान से पूछा – क्या तुम्हारी कोई आख़िरी इच्छा है जिसे इस आख़िरी वक़्त पूरा करना चाहो?

      नौजवान सूनी आँखों से उन बन्द खिड़कियों को एकटक देखता रहा जो आसमान को नीले चौकोर टुकड़ों में काट देती थीं। आँगन में शाहबलूत का पेड़ अपने कँटीले फलों से लदा खड़ा था। उसने अपने से कहा – देखो वहाँ कैसे मीठे शाहबलूत के फल लगे हैं, वे तुम्हारे खाने के लिए हैं; और जब वे पक जाते हैं तो मुँह में अपनेआप आ गिरते हैं। मैं उन्हें भरपेट खा सकता था – मैंने अपने को क्यों पकड़ा जाने दिया?

‘कुछ समझे मैं तुमसे क्या कह रहा हूँ?’ अफ़सर ने दोहराया, ‘क्या तुम्हारी कोई अन्तिम इच्छा है?’

     नौजवान ने अपने से कहा – हाँ, एक चीज़ है जो मैं चाहता था, या दूसरी तरह कहो तो नहीं चाहता था। मैं नहीं चाहता था कि फिर से क़ैद हो जाऊँ, मैं नहीं चाहता था कि तुम मुझे मारो, ठोकरें बरसाओ और मेरे मुँह पर थूको। अगर मेरे पास ऐसी कोई इच्छा होती तो क्या मैं खिड़की से कूद गया होता? मैं समझता हूँ कि तुम्हारा यह ख़याल है कि मैंने यह सब महज़ मज़ाक के लिए किया है। है न?

‘शायद तुम अपनी माँ को देखना चाहो, मौत के पहले?’

     मौत, हाँ, यही तो कहते हैं उस काली चीज़ को। लेकिन वह अगर उसका नाम न लेता तो क्या कुछ बिगड़ जाता? मुझे अब यह बताने की ज़रूरत नहीं कि मुझे मरना हैः और उस चीज़ का नाम मेरे मुँह पर लेना बहुत बेहूदा बात है।…मगर वह मरेगा नहीं, वह तो घर जायेगा।

‘हाँ मैं अपनी माँ को देखना चाहूँगा।’ कितना अच्छा आदमी है कि उसे इस बात का ख़याल है; उसकी नीयत यही है शायद…

    उसने भावशून्य आँखों से अफ़सर को देखा और सिर हिलाकर अपनी मौन स्वीकृति दी।

‘मैंने उन्हें बुलाने के लिए आदमी दौड़ा दिया है, थोड़ी देर में आ जायेंगी वह।…अरे हाँ, एक सवाल है जिसका अब तक हमें कोई जवाब नहीं मिला : वह कौन था जिसने तुम्हें वे पत्र दिये थे?’

अफ़सर ने इन्तज़ार किया।

    बहुत ख़ूब, नौजवान ने सोचा। उस सवाल से उसके मुँह का स्वाद न जाने कैसा हो गया। उसे भयानक ऊब और खीझ महसूस हुई।

एक बार उन्होंने उसके मुँह में इसलिए कपड़ा ठूँस दिया था कि वह चिल्ला न सके और आज वे चाहते हैं कि वह चिल्लाए और अपने उन साथियों का नाम उगल दे जिनके पीछे वे हफ़्तों से कुत्तों की तरह लगे थे। कितनी घिनौनी बात है। कितनी घिनौनी।

‘मैं आपको कुछ नहीं बता सकता।’

‘अपनी माँ का ख़याल करो।’

नौजवान ने छत की ओर देखा।

  वह और चार घण्टे ज़िन्दा रहा। चार घण्टे में तो बहुत से सवाल किये जा सकते हैं। अगर तीन मिनट में एक पूछा जाये तो भी हुए अस्सी। अफ़सर अफ़सरी में कुशल था, अपना काम समझता था, इसके पहले वह बहुतों से सवाल कर चुका था। मरते हुए लोगों से भी। तुम्हें जानना चाहिए काम करने का ढंग, और बस। किसी से गला फाड़कर चिल्लाओ और किसी से धीमे, कान में बात करो, कुछ को सब्ज़बाग़ दिखाओ।

अफ़सर ने कहा – ‘यह तुम्हारे भले के लिए है।’

   लेकिन नौजवान ने फिर कोई सवाल न सुना। न धीमे, न ज़ोर से। वह शान्ति के साथ इस दुनिया से विदा ले चुका था।

दूसरे दिन अखबार में यह विज्ञप्ति छपी :

‘जैसे ही खुफ़िया पुलिस के अफ़सर स्टुटगार्ट के एक मज़दूर को इस अभियोग में पकड़ने वाले थे कि वह मज़दूरों को भड़काने वाले पर्चे बाँटता था, वैसे ही वह अपने मकान की तीसरी मंज़िल की खिड़की से नीचे आ गिरा। उसे आँगन में पड़ा पाया गया। उसकी रीढ़ की हड्डी चूर-चूर हो गयी थी।

  ‘कुछ दिन बाद वह जनरल अस्पताल की हवालाती कोठरी में मर गया।’

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Ramswaroop Mantri

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