शशिकांत गुप्ते
लोकतंत्र का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
शिवजी के राज में उमाजी मदिरा का विरोध कर रहीं हैं।।दोनों एक ही विचारधारा को मानने वालें हैं। लेकिन नशाबंदी को लेकर दोनों ही भिन्न धाराओं में बह रहे हैं।
शिवजी ने बहुत सार्थक पहल की है। ऐसी पहल आजतक किसी भी सियासतदान ने नहीं की है।
शिवजी ने समाज के समक्ष चुनौती रखतें हुए, महत्वपुर्ण आव्हान किया है।
यदि समाज सुरा को त्यागने का संकल्प ले तो प्रदेश में तमाम मदिरा की दुकाने बंद की जा सकती है?
यह वक्तव्य सिर्फ महत्वपूर्ण ही नहीं है,शिवजी के उदारमना का प्रमाण भी है। स्तुति योग्य है।
नशाखोरी करने वालों का कहना है कि, नशा तो शिवबूटी के सेवन से भी होता है। शिवबूटी का नशा जिस किसी व्यक्ति को चढ़ता है। उसकी खुराख बढ़ जाती है। वह अपनी क्षमता से ज्यादा भक्षण करने लगता है।
शिवबूटी को महादेव का प्रसाद समझकर भक्षण किया जाता है।
बहरहाल चर्चा का विषय है शिवजी के द्वारा किया गया आव्हान।
शिवजी के पहल पर व्यापक स्तर पर विचारविमर्श होना चाहिए, और इस पहल को आंदोलन का रुप देना चाहिए।
इस वैचारिक क्रांति के माध्यम से समाज को नशा छोड़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
ऐसी सार्थक पहल को अमलीजामा पहनाने के प्रयास में अंग्रेजी की एक उक्ति अवरोधक बन सकती है? यह उक्ति है ,Ifs and buts मतलब यदि और लेकिन।
यदि समाज संकल्प नहीं लेगा तो नशा बंदी की सार्थक पहल विफल हो जाएगी। लेकिन पहल को सार्थक बनाने का कर्तव्य भी तो समाज का ही है। समाज में हम सभी समाहित हैं।
शिवजी के राज में सुरा के विरोध में अपना स्वर बुलंद करने वाली उमाजी भी हैं।
उमाजी, शिवजी के सार्थक पहल को सफल बना सकती है। यदि उमाजी समाज में मदिरा विक्री केंद्रों का विरोध करने बजाए,समाज के लोगों को नशा नहीं करने का संकल्प दिलवाए?
यदि, ऐसा होता है तो, निश्चित ही शिवजी की पहल को बल मिलेगा और उमाजी को जनजागृति का कार्य करने से संतोष मिलेगा।
निःस्वार्थ भाव से कोई भी कार्य किया जाता है तो संतोष निश्चित मिलता है। ऐसा विचारकों,चिंतकों का कहना है।
शिवजी की पहल सफल होती है तो शिवजी का प्रदेश समूचे देश में अपनी एक विशिष्ठ पहचान भी बनाएगा।
भगवान से यही प्रार्थना है कि,
अंग्रेजी वाली उक्ति Ifs and buts. इस सार्थक पहल के लिए अवरोध ना बने।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





