नीलम चौहान (ग्रेटर नोएडा)
_आत्महत्या के बारे में क्यों सोचते हो? क्या पागल हो या और कुछ? तुम जीवन से ऊब गये हो। यदि सचमुच ऊब गये हो तो आत्महत्या नहीं करो, क्योंकि आत्महत्या फिर इसी जीवन में घसीट लायेगी — और हो सकता है कि इससे भी अधिक भद्दा जीवन मिले, क्योंकि आत्महत्या भीतर और भी अधिक गंदगी पैदा कर देगी।_
आत्महत्या करना अस्तित्व का अनादर है! अस्तित्व ने तुम्हें निरंतर विकास पाने के लिये जीवन का अवसर दिया, और तुम इस अवसर को यूँ ही व्यर्थ गँवा देते हो।
जब तक तुम विकसित नहीं होते और विकसित होकर बुद्ध नहीं बन जाते, तब तक तुम जीवन में बार-बार फेंके जाओगे। लाखों बार पहले भी यह हो चुका है — अब समय है, अब जागो! इस अवसर को चूको मत!
_असली आत्महत्या की कला सीखो। असली कला में अपनी देह को नष्ट नहीं किया जाता है। देह सुंदर है, देह ने कुछ भी गलत नहीं किया है। यह तो मन है, जो असुंदर है। आत्मा भी सुंदर है, लेकिन देह और आत्मा के बीच कुछ है, जो न तो देह है, न ही आत्मा — यह बीच की घटना ही मन है!_
यह मन ही है, जो तुम्हे बार-बार गर्भ में घसीट लाता है! जब तुम मरते हो, यदि तुम आत्महत्या करते हो, तब तुम जीवन के बारे में ही सोच रहे होओगे। आत्महत्या करने का मतलब है कि तुम जीवन के बारे में सोच रहे हो। तुम ऊब चुके हो, जीवन से थक चुको हो, तुम पूरा अलग ही जीवन चाहते हो — इसी कारण तुम आत्महत्या कर रहे हो, न कि तुम जीवन के खिलाफ हो। तुम सिर्फ ‘इस’ जीवन के खिलाफ हो।
हो सकता है कि जैसे तुम हो, वैसा तुम नहीं चाहते हो — हो सकता है कि तुम सिकंदर, नेपोलियन या हिटलर बनना चाहते हो, हो सकता है कि तुम इस दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति बनना चाहते हो, और तुम हो नहीं! यह जीवन असफल हो गया, और तुम प्रसिद्ध होना चाहते थे, सफल होना चाहते थे — अब इस जीवन को ही तुम नष्ट कर देना चाहते हो।
_लोग आत्महत्या इसलिये नहीं करते हैं कि वे जीवन से सच में थक गये हैं, बल्कि इस कारण करते हैं क्योंकि यह जीवन उनकी मांगें पूरी नहीं कर रहा। लेकिन कभी भी किसी की मांगें जीवन पूरी नहीं करता है। तुम हमेशा कुछ न कुछ चूकते ही चले जाओगे। यदि तुम्हारे पास धन है, पर हो सकता है कि तुम सुंदर न हो। यदि तुम सुंदर हो, तो हो सकता है कि तुम बुद्धिमान न हो। यदि तुम बुद्धिमान हो, पर हो सकता है कि तुम्हारे पास धन न हो। और, हो सकता है कि कोई हर चीज पा ले, तब भी यह कैसे मदद करेगा? तुम अतृप्त रहोगे!_
हर जीवन में यही बातें दोहराती जाती हैं, देह बदल जाती है, लेकिन दिशा वही रहती है!
लोग सोचते हैं कि जो आत्महत्या करते हैं, वे जीवन के खिलाफ हैं — यह सत्य नहीं है। वे जीवन के प्रति बहुत अधिक लालसा रखते हैं, वे जीवन के लिए बहुत अधिक वासना रखते हैं। और चूँकि जीवन उनकी वासनायें पूरी नहीं करता, तो गुस्से में, तनाव, विषाद और हताशा में वे स्वयं को नष्ट कर लेते हैं।
आत्महत्या का सही तरीका अपनाओ : देह को नष्ट करके नहीं, देह तो अस्तित्व का सुंदरतम उपहार है! मन अस्तित्व का उपहार नहीं है, मन समाज से संस्कारित है। देह उपहार है, और आत्मा उपहार है — और इन दोनों के बीच समाज तुम्हारे साथ तरकीब खेलता है; इसलिये समाज ने मन को बनाया। यह तुम्हें महत्वाकांक्षा देता है, यह तुम्हें ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, हिंसा देता है, यह तुम्हें हर तरह की गंदी बीमारियाँ देता है।
_इस मन का अतिक्रमण किया जा सकता है, मन को एक तरफ रखा जा सकता है। यह मन जरूरी नहीं है! मन को एक तरफ रखा जा सकता है। यह बड़ा आसान है, तुम्हें बस इसका तरीका आना चाहिये।_
आत्महत्या में मरना पीड़ादायी है, क्योंकि यह प्राकृतिक बात नहीं है, यह सर्वाधिक अप्राकृतिक बात है। कभी भी कोई वृक्ष आत्महत्या नहीं करता — सिर्फ आदमी करता है, क्योंकि सिर्फ आदमी इतना पागल हो सकता है!प्रकृति आत्महत्या के बारे में कुछ नहीं जानती, यह आदमी की खोज है!
_यह सबसे अधिक भद्दा और कुरूप कृत्य है। और जब कभी तुम स्वयं के साथ कोई बहुत ही भद्दी और कुरूप बात करते हो तो तुम आशा नहीं रख सकते कि तुम्हें आगे एक बेहतर जीवन मिलेगा। तुम मन की बेहद निकृष्ट दशा में मरोगे, और तुम बहुत ही निकृष्ट गर्भ में प्रवेश कर लोगे।_
*आत्महत्या की जरूरत ही क्या है?*
तुम निश्चित ही गलत ढंग से जीये हो, इसी कारण जीवन एक सुंदर गीत नहीं बना। तुम निश्चित ही मूर्खतापूर्ण ढंग से जीये हो, मूढ़तापूर्वक, अज्ञानी की तरह — इसी कारण जीवन में उत्सव नहीं आया।
_तुम सितारों के साथ आनंद में नाच नहीं सकते, और न फूलों के साथ नाच सकते, और न हवाओं के साथ, न बरसात में मस्त होकर नाच सकते — क्योंकि तुम गलत तरीके से जीये हो, जो तुम्हारे जैसे ही लोगों ने तुम्हारे ऊपर थोप दिये हैं।_
यह सतत चलने वाली घटना है। मूढ़ता स्वतः सतत चलती रहती है। माता-पिता अपने बच्चों को अपनी मूढ़ता दिये चले जाते हैं, और यही बच्चे अपने बच्चों को वे सारी मूढ़तायें सौंप देते हैं। यह वंशानुगत विरासत है! इसे परम्परा कहते है, इसे विरासत कहते हैं, संस्कृति कहते हैं… बड़े-बड़े नाम हैं!
तुम जिस भांति अब तक जीते रहे हो, उस पर विचार करो, और तब तुम्हारे जीवन में एक नयी तरह की बुद्धिमत्ता आयेगी, और तुम्हारा जीवन अधिक प्रखर होगा।
_अपने संस्कारों पर विचार करो। अब तक जैसे जीये हो, उस पर ध्यान दो — कहीं बुनियादी रूप से कुछ गलत हुआ है। पक्षी गीत गा रहे हैं, और वृक्ष, और फूल… यह अनंत अस्तित्व — यह जगह आत्महत्या करने की है?_
इस जगह नृत्य करो, गीत गाओ, उत्सव मनाओ, प्रेम करो और प्रेम करने दो! और यदि तुम इस अस्तित्व को प्रेम कर सकते हो, यदि तुम इस अस्तित्व के आशीर्वाद महसूस कर सकते हो, तो जब कभी तुम मरोगे, तुम वापस लौटकर नहीं आओगे — क्योंकि तुमने पाठ सीख लिया।
_अस्तित्व कभी किसी को फिर वापस नहीं भेजता यदि उसने जीवन का पथ सीख लिया हो। यदि तुम आनंदित होना सीख लेते हो, तुम स्वीकार्य होओगे। तब उच्चतर रहस्य के लिये तुम्हारे द्वार खुल जायेंगे। तब जीवन के अंतरतम रहस्यों में तुम्हारा स्वागत होगा।





