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सुजीत चट्टोपाध्याय :  कभी नहीं रिटायर्ड

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हितेश सिंह चौहान की पोस्ट

“अपने पोस्ट ग्रेजुएशन के तुरंत बाद, मैं टीचर बनने बंगाल में अपने गाँव ऑस्ग्राम वापस आ गया। हाँ, शहर के बहुत से स्कूल अच्छी सैलरी दे रहे थे, लेकिन गाँव के स्कूल में मिलने वाले 169 रुपए मेरे लिए बहुत मायने रखते थे। मैं अपने गाँव के बच्चों को ही पढ़ाना चाहता था क्योंकि उन्हें एक अच्छे टीचर की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।

⁠मैंने 39 साल तक गाँव के स्कूल में पढ़ाया और सिर्फ़ ‘रिटायरमेंट की उम्र’ हो जाने की वजह से मुझे 60 में रिटायर होना पड़ा। लेकिन यह कांसेप्ट मुझे मंज़ूर नहीं था। घर में दिनभर चारपाई पर बैठे-बैठे आराम करने के बजाए मैं अभी और काम करना चाहता था।

मैं कई दिनों तक इसी दुविधा में था और सोच रहा था कि क्या किया जाए! फिर एक दिन उम्मीद खुद चलकर मेरे दरवाज़े तक आ गई।

एक दिन सुबह करीब 6.30 बजे, 3 लड़कियां मेरे घर आ पहुंचीं। उन्होंने बताया कि वे 23 किलोमीटर साइकिल चलाकर रिटायर हो चुके मास्टर से मिलने आई हैं, मैं जानकर काफ़ी हैरान हुआ कि वे बच्चियां मुझसे पढ़ना चाहती थीं और उसके लिए रोज़ इतनी दूर आने को तैयार थीं।उन्होंने हाथ जोड़कर मुझसे कहा, ‘मास्टर जी, क्या आप हमें पढ़ाएंगे?’ मैंने बिना किसी देरी के हाँ कह दिया लेकिन यह शर्त रखी कि उन्हें मेरी पूरे साल की फ़ीस एक बार में देनी होगी। इस बात के लिए भी वे झट से मान गईं और कहा, ‘हाँ मास्टर जी, हम किसी भी तरह पैसे इकट्ठा कर लेंगे।’ मैंने उनसे कहा कि मेरी पूरे साल की फ़ीस 1 रुपए है। इस बात से वे और भी खुश हो गईं और बोलीं, ‘हम आपको 1 रुपए और 4 चॉकलेट भी देंगे!’

अब मुझे भी अपनी राह मिल गई थी। तो उन बच्चियों के जाने के बाद मैं तुरंत अपने स्कूल गया और उनसे रिक्वेस्ट की कि मुझे पढ़ाने के लिए एक खाली क्लासरूम दिया जाए। लेकिन वे इस बात के लिए नहीं माने। तो मैं घर वापस आया और अपने बरामदे की साफ़-सफ़ाई कर वहीं अपनी कक्षा बना ली।

2004 में उन 3 लड़कियों के साथ शुरू किए उस क्लास में आज हर साल 3,000 से ज़्यादा बच्चे पढ़ने आते हैं, जिनमें से ज़्यादातर आदिवासी लड़कियां हैं और कई छात्र 20 किलोमीटर से भी ज़्यादा दूर से पैदल आते हैं। उनके इस जज़्बे से मैंने खुद भी बहुत कुछ सीखा है।

मेरे पढ़ाए हुए कई बच्चे आज सफल हैं और अच्छी पोस्ट पर काम कर रहे हैं, कोई प्रोफेसर बन गया है, कोई हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट तो कई IT प्रोफेशन्स हैं। वे अब भी मेरे साथ संपर्क में हैं, मुझे फ़ोन करते हैं। जब मुझे पद्म श्री से मिला तो वो मेरे लिए तो सबसे खुशी का दिन था ही, लेकिन मेरे साथ-साथ पूरे गांव ने उस दिन जश्न मनाया था।

मैं बंगाल में रहने वाला एक साधारण सा टीचर हूं और अपनी आख़िरी सांस तक बच्चों को पढ़ाना चाहता हूँ, यही मेरी इच्छा है। मुझे लोग मास्टर मोशाय बुलाते हैं क्योंकि मेरी कक्षा का दरवाज़ा सबके लिए हर वक्त खुला हुआ है।”

78 साल के सुजीत चट्टोपाध्याय एक रिटायर्ड स्कूल टीचर हैं, जिन्हें वेस्ट बंगाल के पुर्बा बर्धमान में उनके फ्री कोचिंग सेंटर ‘Sadai Fakirer Pathsala’ के लिए देश भर में जाना जाता है। उन्हें साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में 2021 में पद्म श्री से सम्मानित किया जा चुका है। 

साभार: Prashant Dua

Ramswaroop Mantri

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