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महिला आरक्षण लागू करने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महिला आरक्षण कानून को लागू करने की याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा। इस कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।

यह मामला न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि महिलाएँ देश में सबसे बड़ी अल्पसंख्यक हैं। पीठ ने मौखिक रूप से कहा, ‘(भारत के संविधान की) प्रस्तावना कहती है कि (सभी नागरिक) राजनीतिक और सामाजिक समानता के हकदार हैं। इस देश में सबसे बड़ा अल्पसंख्यक कौन है? वह महिलाएँ हैं. लगभग 48 प्रतिशत।’

पीठ ने आगे कहा कि यह महिलाओं की राजनीतिक समानता के बारे में है। शीर्ष अदालत कांग्रेस नेता जया ठाकुर द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें नए परिसीमन की प्रक्रिया का इंतजार किए बिना महिला आरक्षण विधेयक 2024 को तत्काल लागू करने की मांग की गई थी। वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व किया।

पीठ ने कहा कि ऐसे नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप करने की न्यायालय की अपनी सीमाएँ हैं। पीठ ने दलीलें सुनने के बाद कहा, ‘परिसीमन की प्रक्रिया कब शुरू होगी? इसे सरकार को सौंप दीजिए। कानून का प्रवर्तन कार्यपालिका का काम है और हम परमादेश जारी नहीं कर सकते। प्रतिवादियों को नोटिस जारी कीजिए।’

महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा द्वारा 20 सितंबर, 2023 को और राज्यसभा द्वारा उसी वर्ष 21 सितंबर को पारित किया गया था। इसके बाद इसे 28 सितंबर, 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली।

ठाकुर की याचिका में कहा गया है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व आवश्यक है, लेकिन पिछले 75 वर्षों से संसद के साथ-साथ राज्य विधानमंडल में भी महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।

याचिका में कहा गया, ‘यह दशकों से लंबित मांग है और संसद ने 33फीसदी आरक्षण के लिए उपरोक्त अधिनियम को सही रूप से पारित किया है। हालांकि इस बात पर अड़चन डाल दी है कि उक्त अधिनियम को पहली जनगणना के प्रासंगिक आंकड़ों के बाद इन उद्देश्यों के लिए किए गए परिसीमन के बाद लागू किया जाएगा। इसे 33 फीसदी महिला आरक्षण के तत्काल कार्यान्वयन के लिए कृपया शून्य घोषित किया जा सकता है।’

याचिका में तर्क दिया गया है कि संविधान संशोधन को अनिश्चित काल के लिए रोका नहीं जाना चाहिए। याचिका में तर्क दिया गया है कि वर्तमान संशोधन में जनगणना और परिसीमन की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि सीटों की संख्या पहले ही घोषित की जा चुकी है। संशोधन में मौजूदा सीटों के लिए 33 फीसदी आरक्षण दिया गया है। याचिका में कहा गया, ‘इसमें अड़चन डालने से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में महिला प्रतिनिधित्व के सभी उद्देश्य विफल हो रहे हैं।’

Ramswaroop Mantri

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