-इस्लाम का पांच साल तक इनुयायी होने को किया खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों पर सोमवार 15 सितंबर को अंतरिम रोक लगा दी है। यह फैसला उन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई तक के लिए लिया गया है, जो इस संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दे रही हैं। चीफ जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की बेंच ने स्पष्ट किया कि यह रोक पूरे अधिनियम पर नहीं, बल्कि खास प्रावधानों तक सीमित हैइस मामले में कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) सांसद असदुद्दीन ओवैसी, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित अन्य लोगों ने याचिकाएं दायर की थीं। दूसरी ओर, हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और असम जैसे छह बीजेपी शासित राज्यों ने संशोधन के समर्थन में हस्तक्षेप की अर्जी दी थी।
रोके गए प्रमुख प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट ने इन खास प्रावधानों पर रोक लगाई:
धारा 3(आर): किसी व्यक्ति को संपत्ति को वक्फ के रूप में समर्पित करने से पहले पांच वर्षों तक मुसलमान रहना होगा यानी इस्लाम अपनाना होगा। कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा इस संबंध में नियम बनाए जाने तक यह प्रावधान लागू नहीं होगा, क्योंकि बिना नियमों के यह मनमाने ढंग से पावर का गलत इस्तेमाल कर सकता है।
कलेक्टर को निजी नागरिकों के अधिकारों का निपटारा करने का अधिकार: कोर्ट ने इसे पावर का उल्लंघन माना। आदेश में कहा गया कि ट्रिब्यूनल द्वारा निपटारे तक किसी तीसरे पक्ष के अधिकार नहीं तय किए जा सकते।
वक्फ निकायों में गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति: वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों के नामांकन की अनुमति देने वाले प्रावधान पर रोक नहीं लगाई गई है। हालाँकि, अदालत ने कहा कि जहाँ तक संभव हो, बोर्ड का मुख्य कार्यकारी अधिकारी एक मुस्लिम व्यक्ति होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि केंद्रीय वक्फ परिषद में 4 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं होंगे, और राज्य वक्फ बोर्ड में 3 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं होंगे।
नई दिल्ली,। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अहम अंतरिम फैसला सुनाया। कोर्ट ने पूरे वक्फ कानून पर रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा कि किसी भी अधिनियम पर रोक दुर्लभतम मामलों में ही लगाई जा सकती है। हालांकि, अदालत ने कानून की कुछ धाराओं को फिलहाल निलंबित कर दिया है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान, जिसमें वक्फ बोर्ड का सदस्य बनने के लिए कम से कम पांच साल तक इस्लाम का अनुयायी होना जरूरी बताया गया था, उसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यह प्रावधान तब तक लागू नहीं होगा, जब तक राज्य सरकारें यह निर्धारित करने के लिए स्पष्ट नियम नहीं बनातीं कि कोई व्यक्ति इस्लाम का अनुयायी है या नहीं। इसके अलावा, कोर्ट ने धारा 3(74) से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड के प्रावधान पर भी रोक लगाई। अदालत ने स्पष्ट किया कि कार्यपालिका किसी व्यक्ति के अधिकारों का निर्धारण नहीं कर सकती। जब तक राजस्व रिकॉर्ड पर अंतिम फैसला न हो, तब तक किसी को वक्फ संपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि इस अवधि में किसी तीसरे पक्ष के अधिकार निर्मित नहीं होंगे। अपने अंतरिम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वक्फ बोर्डों में 11 में से तीन से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं होंगे। राज्यों में भी यही व्यवस्था लागू होगी। इस प्रकार गैर-मुस्लिम प्रतिनिधित्व को सीमित करते हुए अदालत ने इसे बरकरार रखा है। वहीं, उस प्रावधान पर भी रोक लगा दी गई है, जिसके तहत सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी को यह तय करने का अधिकार दिया गया था कि वक्फ संपत्ति सरकारी भूमि पर अतिक्रमण है या नहीं।
गौरतलब है कि 22 मई को लगातार तीन दिन सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने संशोधन अधिनियम को मुसलमानों के अधिकारों के विरुद्ध बताया और उस पर रोक लगाने की मांग की थी। वहीं, केंद्र सरकार ने कानून का बचाव करते हुए तर्क दिया था कि वक्फ इस्लामी अवधारणा जरूर है, लेकिन यह धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है और इसे एक परोपकारी दान की तरह भी देखा जा सकता है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी थी कि वक्फ इस्लाम में ईश्वर को समर्पण है और अन्य धर्मों की तरह यह केवल दान नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा है। अब सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद मामले की अगली सुनवाई में कानून की संवैधानिक वैधता पर विस्तृत बहस होगी।
हालांकि, कोर्ट ने वक्फ संपत्तियों के रजिस्ट्रेशन की जरूरत पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। बेंच ने टिप्पणी की कि यह प्रावधान 1995 से 2013 तक पुराने कानूनों में भी मौजूद था और यह नया नहीं है। चीफ जस्टिस गवई ने आदेश सुनाते हुए कहा, “हमने रजिस्ट्रेशन को 1995 से 2013 तक मौजूद माना… और अब फिर से। इसलिए हमने रजिस्ट्रेशन को नया नहीं माना।”
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि ये संशोधन मुस्लिम धार्मिक संपत्तियों को निशाना बनाते हैं और समुदाय के संवैधानिक अधिकारों का हनन करते हैं। उन्होंने “वक्फ बाय यूजर” की परिभाषा से हटाने का विरोध किया, जो ऐतिहासिक मस्जिदों, कब्रिस्तानों और दानधर्मी संपत्तियों को प्रभावित करेगा, खासकर जहां औपचारिक वक्फ दस्तावेज न हों।

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि संशोधन वक्फ प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने और सार्वजनिक संपत्तियों पर अनधिकृत दावों का सामना करने के लिए लाया गया है। उन्होंने गैर-मुस्लिम सदस्यों को लेने पर “बहुत कम संख्या” बताते हुए समावेशिता का हवाला दिया और आरोप लगाया कि आदिवासी भूमि वक्फ के नाम पर हड़पी जा रही है। केंद्र ने 17 अप्रैल को कोर्ट को आश्वासन दिया था कि कई प्रमुख प्रावधानों को फिलहाल लागू नहीं किया जाएगा।
कितनी जल्दी में थी मोदी सरकार
लोकसभा ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम 3 अप्रैल को पारित किया, जबकि राज्यसभा ने इसे 4 अप्रैल को पारित किया। संशोधन अधिनियम को 5 अप्रैल को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। नए कानून ने वक्फ संपत्तियों के रेगुलेशन के लिए 1995 के वक्फ अधिनियम में संशोधन किया, जो इस्लामी कानून के तहत विशेष रूप से धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए समर्पित संपत्तियां हैं।
अप्रैल में, पूर्व चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कुछ प्रावधानों पर प्रथम दृष्टया आपत्तियाँ की थीं। इस पर केंद्र ने यह वचन दिया कि मामले के लंबित रहने तक राज्य वक्फ बोर्डों और केंद्रीय वक्फ परिषदों में गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति नहीं की जाएगी। केंद्र ने यह भी सहमति व्यक्त की कि किसी भी वक्फ को, चाहे वह अधिसूचना द्वारा घोषित हो या पंजीकरण द्वारा, गैर-अधिसूचित नहीं किया जाएगा और न ही उसके स्वरूप या स्थिति में कोई बदलाव किया जाएगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश प्रारंभिक हैं और पक्षकारों को आगे तर्क प्रस्तुत करने से नहीं रोका जाएगा। विस्तृत आदेश की प्रति का इंतजार किया जा रहा है, जिसके बाद मामले की आगे सुनवाई होगी। यह फैसला वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े विवादों को नई दिशा दे सकता है।





