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*सूर असुर बाहर नहीं तुम्हारे अंदर*

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     डॉ. प्रिया

सुर और असुर  मन की  ही वृत्तियां है।सुर है वह, जो अपने उर अर्थात ह्रदय की दिव्यता, सुंदरता और अलौकिकता से परिपूर्ण वृत्ति है ।

सु + उर, 

सु माने सुंदर, दिव्य, अलौकिक  

उर का अर्थ ह्रदय।

असुर वह है जिसमे इस वृत्ति का अभाव है अर्थात ह्रदय की सुंदरता, दिव्यता और  अलौकिकता का अभाव जिसमे है वहीं  असुर है। 

अब इन वृत्तियो के अनुरूप ही सुर और असुर के नाना नाम है।

जिसमे से एक है बाणासुर।

बाण शब्द का अर्थ है तीर.

बाण अर्थात तीर की भांति दूसरे को चुबने वाली जो मनोवृत्ति है, दुसरो को पीड़ा देने वाली, कष्ट देने वाली जो मनोवृत्ति है वहीं बाणासुर है। 

    वैसे तो बाणासूर ईश्वर का भक्त है। हम सब भी तो ईश्वर के भक्त है। वह बाणासुर एक शिव भक्त है। शिव हमारी ही आत्मा है :

 “आत्मा त्वं गिरिजा मतिं. ” 

     वह स्वयं महाशिव से वरदान पाता है। महाशिव से शक्ति सामर्थ्य और समृद्धि तो पाता ही है कि उसकी सहस्र भुजाएँ हो और साथ मे महाशिव से अपना संरक्षण भी मांगता है। हमे भी शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त होता है। अपनी आत्मा महाशिव के अनुग्रह से, और साथ में स्वयं आत्मा के रूप में महाशिव ही हमारा संरक्षण करते है।

    लेकिन फिर भी हमारी दुसरो को चुभने वाली बाणों सी वृत्ति बाणासुर अपने असुर मनोवृत्तियों को बदलता नहीं।

तत्पश्चात एक समय ऐसा आता है कि जब भगवान श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध को जब बणासुर बन्दी बना लेता है, तब भगवान श्री कृष्ण का अनिरुद्ध को छुड़ाने के लिए बाणासुर से युद्ध आरम्भ होता है। तब संरक्षण के लिए स्वयं महाशिव भी आते है इस तरह आरम्भ हुआ युद्ब !  लेकिन इस कथा में हमारे ही जीवन को दर्शाया है। हम सब की आत्मा महाशिव है :

  “आत्मा त्वं गिरिजा मतिं “

    उसकी ही अनुग्रह से हम शक्ति सामर्थ्य और समृद्धि पाते है। 

जब हमारी वृत्ति दुसरो को चुभने वाली हो जाये अर्थात बाणासुर हो जाये तब भी आत्मा शिव न्योछावर भाव से हमारा रक्षण करते है। लेकिन हम भी जब बाणासुर बन जाते है तो यह भूल जाते है कि हम जिनके प्रति यह बाण की भांति चुभने की मनोवृत्ति रखते है वह स्वयं श्री कृष्ण के प्रति ही कर रहे है।

      इसीलिए अन्तरात्मा रूपी महाशिव से ही समृद्धि शक्ति सामर्थ्य और संरक्षण पाने वाली बाणासुर मनोवृत्ति अर्थात दुसरो को बाण की तरह चुभने वाली मनोवृत्ति है वह यह भी भूल जाती है कि जो भी अर्पित किया है वो नारायण को ही अर्पित हो रहा है। जो उन्ही महाशिव की कृपा से आत्मस्वरूप में समृद्धि शक्ति सामर्थ्य और संरक्षण प्राप्त किया है वह आज भी अर्पित हो रहा अंतरात्मा रूपी श्री कृष्ण को ।

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Ramswaroop Mantri

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