अग्नि आलोक
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*बिना विचारे….. पछताना निश्चित

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शशिकांत गुप्ते

आज गुरुनानक जयंती पर गिरधर कवि का स्मरण हुआ।
गिरधर कवि रचित कुंडली की कुछ पंक्तियां याद आ गई।
बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछिताय।
काम बिगारै आपनो, जग में होत हंसाय॥
जग में होत हंसाय, चित्त चित्त में चैन न पावै।
खान पान सन्मान, राग रंग मनहिं न भावै॥
कह ‘गिरिधर कविराय, दु:ख कछु टरत न टारे।
खटकत है जिय मांहि, कियो जो बिना बिचारे॥
कृषकों के सत्याग्रह की निरंतरता के कारण प्रकाश पर्व के पवित्र दिन अहंकार रूपी अंधकार को समाप्त होना पड़ा है।
आंदोलनजीवियों ने आंदोलन रूपी अहिंसक तपस्या बारह माह अनवरत जारी रखी।
तपस्या का शाब्दिक अर्थ होता है।अभीष्ट अर्थात मनोरथ की प्राप्ति के लिए किए जानेवाला कठोर एवं कष्टदायक आचरण करना।
तपस्या तो कृषकों ने की है।
आज तपस्या की राजनीति के साथ तालमेल बैठाने की असंवेदनशील कौशिश की गई?
एक पौराणिक कथा है।
देवराज इंद्र को डर लगा कि, विश्वामित्र की तपस्या यदि सफल हो गई,तो वे देवलोक की सत्ता हथियाने का प्रयास करेंगे। इसीलिए इंद्र ने अपने दरबार की अप्सरा मेनका के द्वारा ऋषि विश्वामित्र की कठोर तपस्या भंग करवाई।
यह पौराणिक कथा का एक छोटा सा अंश है।इस कथा की सत्यता पर बहस हो सकती है? इस कथा में भी तपस्या भंग किए जाने का षड़यंत्र सत्ता के मोहवश ही रचा गया था।
आज बहस का विषय है, तपस्या किसने की?
आंदोलनकारियों के लिए सिर्फ प्रतिकूल माहौल ही पैदा नहीं किया गया,उनके रास्ते में शूल भी बिछाएं गएं। कृषकों को विभिन्न बदनाम नामों से संबोधित भी किया गया। इसके उपरांत भी
कृषकों ने प्रख्यात साहित्यकार जयशंकर प्रसादजी की इन पंक्तियों को साकार कर दिखाया।
वो पथ क्या पथिक कुशलता क्या
जिस पथ में बिखरें शूल न हों नाविक की धैर्य कुशलता क्या
जब धाराएँ प्रतिकूल न हों
आज जो भी घोषणा की गई इस घोषणा के पीछे अज्ञात नहीं ज्ञात भय का एहसास होता है।इस भय का कारण पूरी कश्ती ही डूबने का भय नजर आ रहा था।डूबती कश्ती को संभालने के लिए कोरे विज्ञापन रूपी पतवार का सहयोग भी असफल होता दिख रहा था।
इस संदर्भ में निम्न लिखित सुविचार मौजु हैं।
जो जिंदगी की चुनौतियों का सामना करने से डरता है,उसका असफल होना निश्चित है
आज प्रकाश पर्व के दिन पुनः साबित हो गया कि,अपने देश का लोकतंत्र रूपी प्रकाश कभी भी अंधकार में बदल नहीं सकता है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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