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तंज़-ओ-मज़ाह( हास्य व्यंग्य) भूली बिसरी यादें 

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शशिकांत गुप्ते

पुरानी फिल्मों में और पुरानी फिल्मों के गानों में जीवन की हक़ीक़त होती थी। मानव को आत्मसात करने योग्य संदेश होतें थे। गीत के बोल मर्मस्पर्शी होतें थे। गीत की लय में मधुरता होती थी।इसलिए कहा जाता है, Old is gold.
पुराने फिल्मों के बहुत से गानों में शब्दों की रचना आज के संदर्भ में प्रासंगिक हैं।
ऐसे ही सन 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म दो आँखे बारह हाथ का यह गीत वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिक लगता है। गीतकार भरत व्यास रचित
इस गीत की पैरोड़ी होली में इस तरह बनती है।
सैयाँ, झूठों का बड़ा सरताज निकला
गरीबी छोड़ चला, भुखमरी से मुख मोड़ चला
दिल तोड़ चला, बड़ा धोखेबाज निकला
चल दिया जुल्मी जनता से बहाना बना
मासूम दिल को निशाना बना
बड़ा जुमलों का तीरंदाज निकला
शब्दों के मीठे जहर की वो तीखी छुरी निकला
जनता तो भोली है, वो चालबाज निकला

इसीतरह सन 1961 में प्रदर्शित फ़िल्म शोला और शबनम का यह गीते जिसे लिखा है गीतकार कैफ़ी आज़मी ने
इस गीत पैरोड़ी प्रस्तुत है।
सब्जबाग के दर्शन इस तरह करवाएं जातें हैं।
मिलता है जहाँ धरती से गगन
आओ वहीं हम जाएं
जनता हमारे लिये
हम जनता के लिये
नीति,सिद्धांतो को ठुकरायें
तू तू मै मै के झगड़े ना कभी खत्म हो पाए।

देश की जनता की वास्तविक स्थिति इस गीत की इन पंक्तियों में बयाँ होती है।सन 1962 में प्रदर्शित फ़िल्म आशिक़ का गीत,इसे लिखा है गीतकार हसरत जयपुरी ने
दुःख में जो गाये मल्हारें
वो इंसान कहलाये
जैसे बंसी के सीने में
छेद है फिर भी गाये

गाते गाते रोये मयूरा
फिर भी नाच दिखाए रे
तुम आज मेरे संग हंस लो
तुम आज मेरे संग गा लो

जनता के सीने में छेद होते ही जा रहें हैं। जनता के सीने हो रहे छेदों को भरने के लिए आश्वासनों के महरम से इलाज़ हो रहा है।
वादों को दावों में लपेट कर बनाएं मरहम का असर इस कहावत की तरह होता है।
मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की
संयोग से सन 1961 में प्रदर्शित फ़िल्म संजोग इस गीत का स्मरण हुआ। इसे लिखा है, गीतकार राजेन्द्र कृष्ण जी ने
बड़े रंगीन ज़माने थे, तराने ही तराने थे
मगर अब पूछता है दिल, वो दिन थे या फ़साने थे
फ़क़त इक याद है बाकी, बस इक फ़रियाद है बाकी
वो खुशियाँ लुट गयी लेकिन दिल-ए-बरबाद है बाकी
कहाँ थी ज़िन्दगी मेरी, कहाँ पर आ गयी
वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गई

बात निकलती है दूर तलक जाती है। इसलिए इन पंक्तियों के साथ पूर्ण यादों को विराम लगातें हैं।
कोई लौट दे मेरे बीते हुए दिन
बुरा न मानों होली है,
बुरा मानों तब भी होली है।
होली की मस्ती रंगों के संग
मौज करें पी कर भंग

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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