अग्नि आलोक
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*निशाने पर संदेशवाहक कॉमेडियन कुणाल कामरा*

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चर्चा में स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा को निशाना बनाकर किये जा रहे हमले हैं ।  बिना नाम लिए बनाई गयी पैरोडी की  महीने भर  पहले दी गयी प्रस्तुति को लेकर शिवसेना के सैनिक होने का दावा करने वाले गुंडे उस हैबिटैट सेंटर में तोड़फोड़ मचा चुके हैं जहां यह कार्यक्रम हुआ था। कुणाल को जान से मारने की धमकियाँ दी जा रही हैं – गालीगलौज दी जा रही है । शिवसेना संस्थापक बाला साहब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे के शब्दों में ‘गद्दार सेना’ के हुड़दंगाई इस बात से खफा हैं कि उनकी सेना के प्रमुख एकनाथ शिंदे को गद्दार कहा गया, उनका मखौल बनाया गया । 

⚫ मजे की बात यह है कि जिस पैरोडी को लेकर इतना कोहराम खड़ा किया जा रहा है उसमें एकनाथ शिंदे को नामजद नहीं किया गया । मगर चोर ने अपनी दाढ़ी में तिनका ढूंढ ही लिया है । हाल के दिनों में हिटलर और मुसोलिनी की भौंडी नक़ल करके मैदान में त्रिशूल लहराते, डंडे चलाते गिरोहों के निशाने पर कुणाल कामरा न पहले है न अकेले! !! कलाकारों, फिल्मों, नाटकों, कहानियों, उपन्यासों पर हमलों की एक श्रृंखला से चल निकली है । इसे सिर्फ शिवसेना एकनाथ शिंदे गुट का करतब नहीं आना जा सकता । महाराष्ट्र के मुख्यमत्री भाजपा नेता फडनावीस ने भी इस प्रसंग में जो बयान दिया है वह उनकी और उनकी पार्टी की लिप्तता प्रदर्शित करता है ।

⚫  कुणाल कामरा के शोज, उनके व्यंग का स्तर और उसमे बरती जाने वाली भाषा पर अलग अलग राय हो सकती है ; होनी भी चाहिए, मगर यह सवाल तो हमला करने वाले भी नहीं उठा रहे हैं । उनका मकसद सिर्फ एक है और वह है किसी भी किस्म की आलोचना का गला घोंटना¸अभिव्यक्ति की आजादी को पूरी तरह समाप्त करना है । यह हमलावराना रुख एक पैटर्न का हिस्सा है और इसके निशाने पर हर तरह की अभिव्यक्तियाँ हैं खासतौर से लोकतंत्र की जान कही जाने वाली प्रेस और मीडिया की स्वतन्त्रता है । उसे पूरी तरह खामोश कर देना है ताकि हुक्मरानों की लूट और असंवैधानिक अमानुषिक हरकतों को सामने आने से रोका जा सके । 

⚫ इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय आई दो खबरों से इस पैटर्न को समझा जा सकता है । पहली खबर असम से है जहां के वरिष्ठ पत्रकार, डिजिटल मीडिया चैनल क्रॉस करेंट के चीफ रिपोर्टर  दिलावर हुसैन मजुमदार को पुलिस ने उठाकर जेल में डाल दिया । उन्हें उस एपैक्स बैंक से उठाया गया जिसमें हुए एक महाघोटाले की खबर पर काम करते हुए वे इस बैंक के डायरेक्टर का इंटरव्यू लेने पहुंचे । इंटरव्यू के दौरान एक पत्रकार के नाते उन्हें जो सवाल पूछने चाहिए थे वे पूछे और भंडाफोड़ होने की आशंका से घबराए मेनेजर ने पुलिस बुलाकर उन्हें गिरफ्तार करवा दिया । गौरतलब है कि इस बैंक के डायरेक्टर असम के मुख्यमन्त्री हेमंता बिश्वशर्मा है और अध्यक्ष भाजपा के विधायक बिश्बजित फुकन है । 

⚫ असम में यह पहली घटना नहीं है,  अभी जनवरी में ही एक और पत्रकार अब्दुल मन्नान को जेल भेज दिया गया क्योकि वे हिट एंड रन के एक ऐसे मामले की तफ्तीश कर रहे थे जिसमे एक बड़े नेता की लिप्तता थी । पिछली वर्ष में एक मीडिया के सम्पादक जितिमोनी बोरा को उनकी एक फेसबुक पोस्ट के लिए गिरफ्तार कर लिया । उनका कसूर यह था कि वह बिहू नाम के असम के लोकनृत्य के गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में लाने के लिए किये जा रहे सरकारी घपले को उजागर कर रहे थे । 

⚫ दूसरी खबर बेधड़क पत्रकार वीरेन्द्र सेंगर की अचानक हुई मौत की है । मृत्यु से कुछ घंटे पहले ही उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखी पोस्ट में बताया था कि दवाओं के एक महाघोटाले की खोजबीन करने पर उन्हें डिजिटल रैकेट द्वारा किस तरह धमकाया जा रहा है । कुछ लाख रुपयों का ‘कट’ लेकर चुप्प हो जाने की ‘सलाह’ दी जा रही है । उनकी इस पोस्ट से साफ़ झलक रहा था कि वे किस कदर मनसिक दबाब और तनाव में हैं । यदि उनके साथ किसी साजिश की जायज आशंका को यदि फिलहाल छोड़ भी दिया जाये तो इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि यह  तनाव ही उनकी मौत का कारण बना ।

⚫ इस तरह की दमनकारी घटनाओं की भयावहता को पूरा देश और विश्व अक्टूबर 23 में देख चुका है जब एक दिन सुबह तड़के एक साथ छापे मारकर न्यूज़क्लिक के 46 पत्रकारों को उठा लिया गया था । इस संस्थान के प्रमुख प्रबीर पुरकायस्थ सहित इनमे से कईयों को काफी लम्बे समय तक, जब तक सुप्रीम कोर्ट ने उसे अपर्याप्त कारणों से हुई गिरफ्तारी नहीं बता दिया तब तक जेल में ही रहना पड़ा । न्यूज़क्लिक का कसूर बस इतना था कि उसने एतिहासिक किसान आन्दोलन को ठीक उस तरह कवर किया जिस तरह किसी मीडिया संस्थान को करना चाहिए । इन पर आतंकियों पर लगाई जाने वाली यूएपीए जैसी धाराएँ तक लगा दी गयी ।

⚫ राजनीतिक प्रतिशोध और अपने कुकर्मों को छुपाने के लिए सत्ता समूह द्वारा की जाने वाली यह हरकतें एक ऐसा फिनोमिना बन गयी हैं कि हर लुटेरा और आततायी इसे आजमा रहा है ।  प्रेस स्वतंत्रता और पत्रकारों पर जुल्म अत्याचार पर निगाह रखने वाली स्वतंत्र संस्था  ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ के मुताबिक़ एक साल पहले साल भर में भारत में 28 पत्रकार मार डाले गए । इनमे से करीब आधे 13 पत्रकार ऐसे थे जो पर्यावरण से जुड़े मुद्दों और जंगलों, खनिजो, नदियों जैसी प्राकृतिक संपदाओं की लूट कर रहे थे ।  इनमे से एक उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर समाचार नामक फेसबुक पेज के जागेन्द्र सिंह थे जिन्होंने एक ताकतवर मंत्री दारा की जा रही रेत की लूट का पर्दाफ़ाश किया था । इन्हें ज़िंदा जलाकर मार डाला गया । इसी तरह के रेत माफिया की करतूतों की रिपोर्टिंग करने वाले उत्तरप्रदेश के ही करूण मिश्रा और रंजन राजदेव को गोलियों से भून दिया गया । मध्यप्रदेश में रेत माफिया और पुलिस की मिलीभगत का भांडा फोड़ने वाले संदीप शर्मा को ट्रक से कुचलवाकर मरवा दिया गया । 

⚫ हाल के वर्षो में उत्तरप्रदेश के उन्नाव में शुभममणि त्रिपाठी की ह्त्या कर दी गयी – उन्होंने अपने मित्रों को बताया था कि रेत माफिया उन्हें मरवाना चाहता है । बिहार में सुभाष कुमार महतो के सर में उनके घर के बाहर ही  गोली उतार दी गयी ।  महाराष्ट्र में जमीनों के हड़पे जाने का पर्दाफ़ाश करने वाले श्रीकांत वारिशे को रियल एस्टेट के मालिकों द्वार एसयूवी से कुचलवा दिया गया । 

⚫ सत्ता में बैठे राजनेताओं के इस तरह के आपराधिक आचरण पुलिस और नौकरशाहों को कितना निर्द्वंद और निरंकुश बना देते हैं इसकी मिसाल भोपाल है जहां दुर्घटना की किसी कुलदीप सिसोदिया ने और टी आई ने धर लिया पत्रकार कुलदीप सिंगोरिया को !!  

⚫ कुलमिलाकर यह कि अब तक जो नकाब आहिस्ता आहिस्ता उतरने का भरम दे रहा था वह तेजी के साथ फिसल रहा है । हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिकता और कारपोरेट का विषैला गठबंधन और नुकीला हो रहा है और संविधान और उसमे दिए गए हर तरह के लोकतांत्रिक आधिकारों को चींथ रहा है । लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस और सृजनात्मक  की आजादी न अपने आप मिली है ना ही अपने आप बचेगी ; लोकतंत्र पर तंत्र के हावी होने का एक ही निषेध है ; लोक का जागरूक और हस्तक्षेपकारी होना ।  इसमें पत्रकारों की भी बड़ी भूमिका है । 

🔴 ऐसे ही दौर में लिखी फ्रान्सीसी रचनाकार #बर्तोल्त_ब्रेख्त की एक कविता के अंदाज में कहें तो 

“वे नहीं कहेंगे 

कि वह समय अन्धकार का था 

वे पूछेंगे 

कि उस समय के पत्रकार चुप क्यों थे ।“

#लोकजतन

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