(76 साल पूर्व 6 अगस्त 1945 हिरोशिमा परमाणु बम में मरे लाखों लोगों की याद में )
निर्मल कुमार शर्मा
प्राचीन काल में मानव समाज एक-दूसरे से युद्ध पत्थरों,लाठियों,भालों,तीर-धनुष,गुलेल, तलवारों आदि से करता था,परन्तु बाद में उक्त वर्णित साधारण हथियारों से भी एक बहुत ही घातक बारूद,लोहे की एक बहुत भारी लम्बी नाल और लोहे के एक बहुत भारी तथा ठोस गोलों का प्रयोग करके एक बहुत ही घातक हथियार तोप का अविष्कार हुआ। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार यूरोप में सन् 1313 में हुए एक युद्ध में तोप का पहली बार प्रयोग किया गया था। मुगल आक्रमणकारी बाबर ने राणा सांगा से 17 मार्च 1527 को आगरा से 35 किलोमीटर दूर खानवा गाँँव के पास हुई लड़ाई में पहली बार तोप का प्रयोग करके राणासांगा की संख्या बल में बहुत अधिक बड़ी लगभग एक लाख दस हजार की हाथियों-घोड़ों से लैस सेना को अपने केवल 12 हजार सैनिकों से ही मात्र 10 घंटों में ही घुटने टिका लेने पर मजबूर कर दिया था ! सन् 1807 में अमेरिका में हुए गृहयुद्ध में बंदूकों का पहली बार प्रयोग हुआ। टैंकों का प्रयोग सन् 1916 में प्रथमविश्वयुद्ध में जर्मनी के खिलाफ ब्रिटिश-साम्राज्यवादियों ने किया था। सन् 1775 में समुद्र की अतल गहराइयों में छिपकर दुश्मन पर हमला करने के लिए युद्धक पनडुब्बियों का अविष्कार हुआ था। उसके बाद इन परंपरागत हथियारों से बहुत ही विनाशक परमाण्विक हथियारों का प्रयोग सर्वप्रथम अमेरिका ने 6 और 9 अगस्त 1945 को क्रमशः दो जापानी शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराकर,सेकेण्डों में लाखों निरपराध लोगों को मौत के घाट उतारकर इन न्यूक्लियर हथियारों की विध्वंशक क्षमता को परखा था !अमेरिका,रूस,चीन आदि देशों ने इन परमाणु हथियारों से भी हजारों-लाखों गुना विनाशक हजारों हाइड्रोजन और नाइट्रोजन बमों को भी बना चुके हैं। इन हथियारों को पहले हवाई जहाजों से ले जाकर गिराना पड़ता था,परन्तु आज के समय में सभी बड़े महाशक्तियों के पास इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम हैं,जो पलक झपकते ही इस पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध से दक्षिणी गोलार्ध के किसी भी चिन्हित निर्दिष्ट स्थान पर अपने हजारों-लाखों मेगाटन के बड़े से बड़े हाइड्रोजन व नाइट्रोजन बमों को गिराकर,उस लक्ष्य को नेस्तनाबूद कर सकने की एकदम सटीक क्षमता से लकदक हैं। इसके अलावे सुदूर अंतरिक्ष के चप्पे-चप्पे पर चक्कर लगा रहे अपने अंतरिक्ष यानों में लगे अत्यंत घातक लेजर बंदूकों से दुनिया के किसी भी स्थान पर स्थित अपने लक्ष्य पर सेकेण्डों में अपने लेजर बीमों से जलाकर खाक कर देने की क्षमता से लैश हैं।

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आज मानव प्रजाति खुद अपने को इस धरती से विलुप्त करने के लिए तेजी से आगे बढ़ रही है,ये शब्द सुनने में कुछ अजीब से लग रहे हैं, परन्तु वर्तमान दुनिया के हालात को देखते हुए उक्त शब्द बिल्कुल सही प्रतीत होते हैं । आज से 34वर्षों पूर्व 8 दिसंबर 1987 को तत्कालीन सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाईल गोर्वाचेव और संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति रोनॉल्ड रीगन के बीच इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज मतलब आइएनएफ नामक एक शांति संन्धि हुई थी,जिसमें 500 से 5500 किलोमीटर दूर तक मार करने वाली इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती पर रोक लगाई गई थी । तब सारी दुनिया के अमन और शांति पसंद लोगों ने चैन की साँस ली थी,परन्तु इन बीते लगभग 34 वर्षों में दुनिया के राजनैतिक,आर्थिक और सामरिक हालात इतने बदल गये हैं,इसके अतिरिक्त कुछ शक्तिशाली देशों के राष्ट्राध्यक्ष इतने झक्की, सनकी और मूर्ख आ गये हैं,जिन्हें इस ब्रह्मांड की जीवन की साँसों के स्पन्दन से युक्त एकमात्र शस्य श्यामला शांत धरती की शांति और अमनचैन पसंद ही नहीं है,वे इस धरती के समस्त जैवमण्डल,जिसमें मानव प्रजाति भी उसका एक छोटा सा हिस्सा है,को पुनः 34 साल पूर्व वाले विध्वंसक हथियारों की होड़ में झोंक देने को उद्यत हैं,उन्होंने उस शांति समझौते को आगे बढ़ाने से एकदम इंकार कर दिया है ! यह समझौता दिनांक 2-8-19 को समाप्त हो चुका है,लेकिन भविष्य के विश्वशांति और परमाण्विक युद्ध से बचाव के लिए कोई शांति समझौता नहीं हुआ है ! द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 76 वर्षों के अमन-शांति के बाद आज समूची मानव सभ्यता पुनः एक बार फिर अपने महासर्वनाश के लिए तेजी से आगे बढ़ चली है।
अब आइये वर्तमान विश्व में संहारक हथियारों की क्षमता का आकलन कर लें । आज से ठीक 76 वर्ष पूर्व 6 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा पर और 9 अगस्त 1945 को नागासाकी पर युद्धपिपासु देश अमेरिका जिन लिटिल ब्वाय और फैट मैन नामक परमाणु बमों को गिराकर लगभग 3 लाख आम लोगों को तुरंत मौत के घाट उतार दिया था,आज उन बमों से दो हजार गुना तक ताकतवर परमाणु बम हजारों की संख्या उसी अमेरिका तथा रूस,ब्रिटेन,फ्रांस,चीन, भारत,पाकिस्तान,इजरायल और कोरिया आदि देशों के पास रखे हुए हैं,जो उत्तरी ध्रुव से लेकर दक्षिणी ध्रुव के बीच कहीं भी,अपने लक्ष्य पर बगैर किसी गलती के पलक झपकते ही पल भर में भयंकर तबाही मचा सकते हैं । अब तो इस दुनिया में परमाणु क्षमता से बहुत से देश संपन्न हैं,यह पूरे विश्व मानवता के लिए और भी ख़तरनाक स्थिति है ।
उक्त हथियारों के अति विध्वंसक, मानवहंता व रौद्र रूप से भी अभी मानव की दुर्घर्ष मारक जिजीविषा पूरी नहीं हुई है,समाचार पत्रों में आई खबरों के अनुसार रूस ने अभी पिछले दिनों परमाणु उर्जा से चलनेवाली एक ऐसी पोसाइडन नामक ऑटोनॉमस ड्रोन तारपीडो तैयार किया है, जो अचानक युद्धक हमले की स्थिति में अमेरिका के समुद्र के तटवर्ती शहरों में अचानक भयंकरतम् सुनामी व बाढ़ लाकर लाखों मानवों को डुबाकर मार सकता है। रूसी प्रवक्ता के अनुसार इन घातक ड्रोनों का निर्माण इसीलिए किया गया है ताकि दुश्मन के अचानक किए किसी घातक हमले के विरोध में जोरदार पलटवार किया जा सके। अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री के अनुसार रूस के इस कई मेगाटन के महाविनाशक परमाणु हथियारों के वारहेड को एकसाथ फिट करके ड्रोन के जरिए उसे समुद्र में लाँच कर देने का है,ताकि उससे रेडियोऐक्टिव सुनामी पैदा करके समुद्र तटीय अमेरिकी शहरों को पानी में अचानक डुबोकर करोड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाय। अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री ने आगे बताया कि सोवियतकालीन पैरामीटर डेड हैंड ऑटोमेटिक न्यूक्लियर लांच सिस्टम एक ऐसा घातक हथियार है,जो रूस पर हुए किसी भी परमाण्विक हमले की स्थिति में खुद ही संज्ञान लेकर उसके अनुरूप फैसला लेकर प्रतिद्वंद्वी देश पर तुरंत हमला कर सकता है। इसमें सबसे घातक यह बात है कि युद्ध के दौरान इसका कंप्यूटर सिस्टम जनरल स्टॉफ से संपर्क भी नहीं करता है !
उक्त अतिविध्वंसक हथियारों के विध्वंस की बारे में सुनकर ही रूह काँप जाती है। कुछ दार्शनिक वैज्ञानिकों के अनुसार वर्तमान समय में विश्व में एक से बढ़कर एक जो विध्वंसक हथियारों का निर्माण हो रहा है,उसका प्रयोग भी एक न एक दिन अवश्य होगा,क्योंकि अमेरिका के अभी अपदस्थ हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन जैसे झक्की व बेवकूफ लोगों के हाथ सत्ता आने पर उन जैसे लोग उक्तवर्णित अतिविध्वंसक हथियारों को अपने विरोधी देशों के लोगों पर एक बार आजमा लेने में जरा भी नहीं हिचकेंगे ! उस स्थिति की,उस भयावह मंजर की कल्पना करिए, जब ऐसी पागलपन भरी हरकत अगर गलती से भी शुरु हो गई,तब इस दुनिया को मानवप्रजाति सहित अपने समस्त जैवमण्डल को राख में बदलते मिनटों से भी कम समय लगेगा !आखिर 6 और 9अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों की निरपराध जनता पर परमाणु बम गिराने का निर्णय तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हेनरी ट्रूमैन और उसकी टीम ने परीक्षण के तौर पर ही तो किया था,जिससे तत्कालीन समूची विश्वमानवता रो उठी थी !कराह उठी थी ! इसलिए हर हाल में हथियारों की इस पागलपन भरी होड़ को रोकना ही होगा। विश्व के अमनपसंद लोगों और संस्थाओं को इन गलाकाट विध्वंसक हथियारों की फिर से दौड़ शुरू न होने देने के लिए भरपूर प्रयत्न करने चाहिए,ताकि केवल एक मूर्ख और सिरफिरे व्यक्ति की जिद और मिथ्या अकड़ या अहं से ये समूची विश्व मानवता का जीवन खतरे में न पड़ जाय ! और गलती से भी परमाण्विक युद्ध का बटन दब जाय तो यह धरती समस्त जीवों के जीवन के स्पन्दन से मुक्त होकर सदा के लिए इस ब्रह्मांड के अन्य अरबों-खरबों तारों और ग्रहों की तरह एकदम वीरान न हो जाय ! अतः अभी भी समय है यह मूर्खतापूर्ण हथियारों की दौड़ समाप्त करने की सार्थक पहल होनी ही चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ का उद्देश्य तो यही है, वह अपनी सार्थक पहल करे और पुनः परमाणु हथियारों को बनाने पर रोक लगाने की परमाणु संपन्न देशों में ईमानदारी से कोई सर्वमान्य समझौता कराए,इसी में इस संपूर्ण विश्व मानवता व समस्त जैवमण्डल की भलाई अंतर्निहित है ।-
निर्मल कुमार शर्मा, ‘गौरैया एवम पर्यावरण संरक्षण ‘,प्रताप विहार,गाजियाबाद, उप्र,संपर्क -9910629632,




