दिल्ली के लुटियंस बंगलो ज़ोन (LBZ) का टिहरी गढ़वाल हाउस चर्चा में है. इसके 1 हजार करोड़ रुपए में बिकने की बात सामने आई है. यह उत्तराखंड की एक ऐतिहासिक रियासत, दिल्ली के सत्ता-परिसर और बदलते समय के रिश्तों की भी कहानी है. वर्तमान में यह टिहरी राज परिवार की सदस्य और संसद सदस्य माला राज्य लक्ष्मी शाह का आवास है. जानिए, क्या है इसका इतिहास, उत्तराखंड की रियासत ने इसे दिल्ली में क्यों बनवाया और किसने डिजाइन किया.
दिल्ली के सबसे विशिष्ट इलाके लुटियंस बंगलो ज़ोन (LBZ) में एक पता इन दिनों खास चर्चा में है. टिहरी गढ़वाल हाउस, 5, भगवान दास रोड. वजह है इसकी कथित संभावित बिक्री. लेकिन यह बंगला केवल महंगी ज़मीन का टुकड़ा और उस पर बना इमारत भर नहीं है. यह उत्तराखंड की एक ऐतिहासिक रियासत, दिल्ली के सत्ता-परिसर और बदलते समय के रिश्तों की भी कहानी है. वर्तमान में यह टिहरी राज परिवार की सदस्य और संसद सदस्य माला राज्य लक्ष्मी शाह का आवास है.
आइए, इस महत्वपूर्ण इमारत की बिक्री की चर्चा के बीच इसके इतिहास, भव्यता आदि के बारे में जानते हैं. इसका निर्माण क्यों किया गया था? साथ ही टिहरी गढ़वाल रियासत का संक्षिप्त, लेकिन समृद्ध इतिहास भी जानेंगे.
यह कितना भव्य?
भव्यता केवल इमारत की सजावट से तय नहीं होती. इस क्षेत्र में भव्यता का बड़ा पैमाना जमीन, लोकेशन खुली जगह आदि माने जाते हैं. जो यहां खूब है. इसके कई कारण भी हैं.
- 3.2 एकड़ का विशाल प्लॉट: सेंट्रल दिल्ली में इतना बड़ा निजी प्लॉट आज लगभग संग्रहालय-स्तर की दुर्लभता रखता है. बंगले में खुली जगह और बड़े लॉन इसे खास बनाते हैं.
- लोकेशन-पावर: भगवान दास रोड जैसे पते दिल्ली के प्रशासनिक, संवैधानिक, सांस्कृतिक केंद्रों के बेहद पास माने जाते हैं. इसलिए इसे केवल घर नहीं बल्कि एड्रेस-एसेट समझा जाता है.
- LBZ की रेगुलेटेड सप्लाई: इस ज़ोन में नई आपूर्ति बहुत सीमित, नियंत्रित मानी जाती है, इसलिए पुराने बड़े बंगलों की कीमतें ट्रॉफी की तरह व्यवहार करती हैं.

लुटियंस दिल्ली में बना टिहरी गढ़वाल हाउस.
इस इमारत की जरूरत क्यों बनी?
यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है. एक हिमालयी रियासत को दिल्ली के केंद्र में इतना बड़ा ठिकाना क्यों चाहिए था? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गोरखा आक्रमणों, युद्धों के बाद बने राजनीतिक हालात और बढ़ते ब्रिटिश प्रभाव के दौर में, टिहरी गढ़वाल के शाही परिवार ने दिल्ली में इस तरह की संपत्ति को बनाया, विकसित किया ताकि प्रशासनिक, औपचारिक और नेटवर्किंग संबंधी जरूरतें पूरी हों.
यह भवन साल 1940 के दशक में बना और ब्रिटिश सरकार ने कई रियासतों को लुटियंस दिल्ली में आवास बनाने के लिए जमीन आवंटित की थी. यानी यह बंगला राजसी दिल्ली-उपस्थिति की नीति का हिस्सा भी रहा. टिहरी गढ़वाल हाउस एक तरह से रियासत का दिल्ली वाला दफ्तर, मेहमानखाना, और शक्ति-केंद्रों तक पहुंच का माध्यम बना. यहाँ रिश्ते, औपचारिक मुलाकातें और प्रतिनिधित्व की एक लंबी परंपरा है.
एक हजार करोड़ में बिकने की चर्चा
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार टिहरी गढ़वाल के महाराजा मनुजेंद्र शाह द्वारा इस संपत्ति को एक हजार करोड़ में बेचने की बात कही गई है. खरीदार के बारे में स्पष्ट जानकारी अब तक छपी किसी भी रिपोर्ट में नहीं दिखाई पड़ी. हां, उसे स्थानीय उद्यमी और फूड एंड बेवरेज सेक्टर में मजबूत दखल रखने वाला बताया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक सौदा अंतिम चरण में है. ऐसे में देखना रोचक होगा कि अगर यह इमारत बिकती है तो यहां किस तरह का नया ढांचा खड़ा होगा या फिर मौजूद इमारत को ही नई साज-सज्जा के साथ तैयार किया जाएगा.
इसे फूड एंड बेवरेज सेक्टर के दिल्ली के नामी कारोबारी ने खरीदा है. ET की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इससे पहले, उस कारोबारी ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के मोतीलाल नेहरू रोड स्थित ऐतिहासिक आवास को 1,100 करोड़ रुपये से अधिक में खरीदने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.
टिहरी गढ़वाल रियासत का इतिहास भी जानें
टिहरी गढ़वाल का इतिहास मोटे तौर पर गढ़वाल क्षेत्र के एकीकरण, फिर गोरखा शासन, युद्ध, उसके बाद टिहरी रियासत के रूप में पुनर्गठन, और अंत में भारत में विलय (1949) की कहानी है. उत्तराखंड सरकार के जिला पोर्टल के अनुसार टिहरी शब्द Trihari का परिवर्तित रूप है. इसका अर्थ हुआ ऐसा स्थान जो मन (मंसा), वाणी (वाचा), कर्म (कर्मणा) से होने वाले तीन प्रकार के पाप धो दे.






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