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आतंक आत्मघात का पर्याय ही है

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शशिकांत गुप्ते

धर्म, मज़हब, और Religion आदि की पहचान हो या कोई भाषाई पहचान हो,मसलन मराठी,पंजाबी,सिंधी वगैराह, या किसी की जाति गत पहचान भी हो, इनमें से किसी भी पहचान में चावल और हंडी वाला नियम लागू नहीं होता है।हंडी का एक चावल पक गया तो समझों सारे चावल पक गए।
यही फर्क होता है,असामाजिक तत्वों में और सामाजिक लोगों में।
असामाजिक मानसिकता ही मानव को हिंसक बनाती है।हिंसक मानसिकता से ग्रस्त लोग ही दहशतगर्दी फैलाते हैं।दहशतगर्दी ही आतंक का पर्याय बनती है।
हिंसक लोग धर्म या मज़हब की दुहाई देते हुए दहशत फैलाते हैं,और यही दहशत आतंकवाद का रूप ले लेती है।जो जितना आतंक फैलाता है,समझो वह उतनाही डरपोक है।दहशतगर्दी की आड़ में हरतरह के अवैध धंदे संचालित होतें हैं।अवैध धंधों का संचालन आतंक के साये में किस तरह संचालित होता है,प्रायः फिल्मों में दर्शया जाता है।
हशीश की तस्करी के कारण ही तालिबान आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ हो पाया है।अफगानिस्तान ड्रग का अंतर्राष्ट्रीय केंद्र बन गया।
दहशतगर्दी धर्मांधता की इंतहा होती है।
इस तरह की वहशियत ही तहजीबे को खत्म करने की साजिश रचती है।
इसीलिए निम्न सुवाक्य का स्मरण होता है।पूर्व राष्ट्रपति स्व.ज़ाकिर हुसैन साहब ने बहुत ही महत्वपूर्ण वाक्य कहा है।
जब भी टकराती है वहशते टकराती
तहजीबे कभी नहीं टकराती हैं।
आचार्य विनोबा भावे ने कहा है कि, धर्म की दूसरे धर्म से कभी लड़ाई नहीं होती है।अधर्म की धर्म से लड़ाई होती है।
एक बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए आतंकवाद की आयु अल्प ही होती है।
तालिबान आतंक के बल पर सफल हो गया है।यह सफलता उसके अपने अन्य सहयोगी आतंकी संगठनों के कारण तालिबानियों के लिए ही आत्मघाती सिद्ध होगी।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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