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विधि आयोग: पारखी को परखें

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प्रशांत नारंग

हाल ही में भारत सरकार ने सोने के गहनों के लिए “हॉलमार्किंग” को जरूरी बना दिया है। सरकार हवा की क्वालिटी को भी मापती है। लेकिन कानूनों की गुणवत्ता को क्यों नहीं मापती? ऑस्ट्रेलिया और यूनाइटेड किंगडम जैसे दुनिया भर के देशों में कानूनों को रिव्यू करने के लिए एक ऑटोनॉमस बॉडी है। इस केस में, भारत कानूनों की गुणवत्ता को चेक करने में फेल हो जाता है।

विधि आयोग Law Commission of India | Vivace Panorama

1955 में, भारत के विधि आयोग की स्थापना विधि और न्याय मंत्रालय की एडवायजरी बॉडी के रूप में की गई थी। इसे भारत में मौजूदा कानूनों के लीगल रिसर्च करने की सुप्रीम अथॉरिटी मिली हुई है। भारत सरकार हर तीन साल में इसे गठित करती है। इस बॉडी का मुख्य उद्देश्य इस्तेमाल में नहीं रहे पुराने कानूनों को रद्द करने का सुझाव देना, कानूनों में लैंगिक समानता सुनिश्चित करना और क़ानूनी सुधारों के लिये सुझाव देना है। विधि आयोग ने अब तक 277 रिपोर्ट पेश की हैं।

आयोग के एक भूतपूर्व अध्यक्ष के अनुसार, केवल 45% सुझावों और सिफारिशों को अब तक लागू किया गया है। इसका कारण यह है कि क़्वालिटी कीपर के काम की क़्वालिटी आशा अनुरूप नहीं रही है। कई सिफारिशें अव्यवस्थित तरीके से रखी गई। सुझाए गए सुधारों के साथ सटीक संशोधन नहीं रखे गए। हालांकि बेहतर आउटपुट के लिए बेहतर इंस्टिट्यूशन की जरूरत पड़ती है। अपने वर्तमान अवतार में, आयोग कई समस्याओं से घिरा हुआ है।

पहला, सरकार चेयरपर्सन सहित विधि आयोग के सभी मेंबर्स की नियम व शर्तें तय करती है। मेंबर्स के रूप में आमतौर पर वे लोग शामिल होते हैं, जिन्हें सरकार नवाज़ना चाहती है, जैसे कि सेवानिवृत्त बाबू और जज। इस का एकमात्र हल पारदर्शिता है। सभी योग्य और इच्छुक कैंडिडेट्स को आवेदन करने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए।

दूसरा, सरकार आयोग को अस्थायी, मानती है। बहरहाल, 21वें विधि आयोग ने 2018 में अपना कार्यकाल पूरा कर लिया और 22वें विधि आयोग के गठन के आदेश को अधिसूचित कर दिया गया, फिर भी इसके मेंबर्स और चेयरपर्सन की नियुक्ति अभी बाकी है। वर्तमान में, आयोग में केवल दो मेंबर्स हैं, जिन पर किसी भी भूमिका की जिम्मेदारी नहीं हैं। चूंकि स्टाफ के पास कोई काम नहीं है, इसलिए एक भूतपूर्व अध्यक्ष तो इसे “हनीमून पीरियड” कहते हैं।

तीसरा, एक खामी और भी है – आयोग की विधि और न्याय मंत्रालय पर वित्तीय निर्भरता। जस्टिस एपी शाह ने भी पहले इस महत्वपूर्ण पहलू को उजागर किया है कि कैसे मंत्रालय आयोग को वित्तीय रूप से नियंत्रित रखता है। एक भूतपूर्व मेंबर का भी कहना है कि हवाई यात्राओं के टिकटों की प्रतिपूर्ति बहुत देर से होती है; इंटर्न्स और एक्सटर्नल रिसर्चर्स के स्टाइपेंड में भी अक्सर देरी होती है। इससे विधि आयोग में नई प्रतिभाएं हतोत्साहित होती है, और काम करने की प्रक्रिया तो धीमी होती है ही ।

संस्थागत कमजोरियों के अलावा, विधि आयोग का बाहरी तंत्र भी बहुत अनुकूल नहीं है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि सरकार आयोग की सिफारिशों को कितना गंभीरता से लेती है। बेहतर होगा कि आयोग की रिपोर्ट को अनिवार्य रूप से एक तय समय सीमा के भीतर संसद के समक्ष पेश किया जाए।

कानून और न्याय मंत्रालय के तहत काम करने के बजाय, आयोग को स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए। इसे अन्य मंत्रालयों के साथ जुड़ने और अपने सहयोग को विस्तार प्रदान करने की एक वैधानिक स्वतंत्र आयोग होना चाहिए।

हाल फिलहाल सरकार की ऐसा करने की कोई योजना नहीं है, और सुप्रीम कोर्ट को भी यह बता दिया गया है।

प्रशांत नारंग

प्रशिक्षण से वकील और पेशे से रिसर्चर; सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी (नई दिल्ली में स्थित एक प्रसिद्ध गैर-राजनैतिक थिंक-टैंक) में शोध विभाग प्रमुख; विधि, विधान,अर्थशास्त्र, संविधान, न्याय और अधिशासन में गहन रूचि।

Ramswaroop Mantri

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