अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस : 8 मार्च पर विशेष
डॉ. प्रिया
_नारियों में पहनावे और जेवर/श्रृंगार की जो प्रथा है वह उस को कमजोर करने, गुलाम बनाने के लिए थोपी व स्वीकृत कराई गई है। यह एक सोची- समझी साजिश के तहत उसका ब्रेनवाश कर उसको जंजीरों में जकड़ना है।_
पुरुष नहीं चाहते कि इस पित्रसत्तात्मक व्यवस्था में भारतीय नारी अपने हक और अधिकार के लिए लड़े।
*प्रतीक/जेवर/सजावट अहसास कराते हैं गुलामी का :*
लड़कियों को बचपन से अहसास कराया जाता है कि वह लड़की है। इसकी शुरुआत होती है कान और नाक में छेद करने से। निःसन्देह प्रत्येक व्यक्ति यही सोचता है कि यह सब आभूषण पहनने व श्रृंगार के लिए होते है।
यह भी सच है कि उम्र और जीवन की अवस्था के अनुसार आभूषण पहने जाते हैं। कभी कोई सोचता होगा या नहीं पर मेरे अनुभव में यह सब गुजरा है।
ग्रामीण कृषक समाज में मैंने देखा कि अधिकांश लोग अपने एक वर्ष के बछड़े के नाक में नकेल डलवाने के लिए अस्पताल में आते थे और यह हर बार सुनने को मिलता था कि अब यह बछड़ा तंग करने लगा है इसलिए इसके नाथ (नाक में छेद करके रस्सी डालना) डाल दो।
नाथ डालने के बाद उसकी उछल कूद बंद हो जाती थी। एक छोटी सी रस्सी काफी थी उस बछड़े को नियंत्रित करने के लिए। ऊंट, भैंसा आदि अनेक उदाहरण हैं।
प्रायः महिलाओं के बारे में भी समाज की यही सोच रही है कि नाथ (नाक की रस्सी) डाल दो, आभूषण के रूप में और महिलाएँ नियंत्रण में रहेंगी। यह सब सदियों से होता रहा है और आज भी हो रहा है।
_विवाह की रस्में इन सब प्रतीकों के साथ संपन्न होती हैं। चाहे पैरों में बिछुआ/चुटकी हो या फिर हाथ की अंगूठी। गले में मंगलसूत्र, कान के झूमके, बाली, कुंडल हो या नाक की कील माथे पर बिंदिया, मांग में सिंदूर, टीका कमर पर तगड़ी, कमरबंद पैरों में पाजेब, पायल हाथ में कंगन,या फिर चूडी।_
ये सब प्रतीक हैं बंधन के। ये सब मानसिक रूप से स्वीकार किए जा सकें इसलिए इन्हें सोने-चांदी से आकर्षक बनाया गया। इनका आकर्षण ही, इन गुलामी के प्रतीकों के प्रति महिलाओं को इन्हें स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है।
अगर कोई महिला इन्हें न पहने तो दूसरी महिला उसके प्रति आशंकित हो जाती हैं। वे इन्हें पहनने के लिए बाध्य करती हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि यह योजना भले ही पुरुष की रही हो लेकिन आज इसे कड़ाई से पालन करने और करवाने का दायित्व स्वयं महिलाओं ने ही ले लिया है।
यदि पड़ोस की महिलाएं इस विषय पर चर्चा न करें और इसे व्यक्तिगत विषय समझ कर छोड़ दें तो ये प्रतीक अपनी महत्ता खो सकते हैं।
_जब व्यक्ति को गुलामी और स्वतंत्रता में अंतर ही पता न चले, तो समझ लो कि गुलामी उसके मस्तिष्क की जरूरत बन गई है।_
लेकिन अब? अब यदि सही अर्थों में देखें तो आज आभूषण पुरुषों के लिए एक समस्या बन गए हैं। घर की स्थिति खर्च करने की भी न हो तो भी कर्ज लेकर ये सब उपलब्ध करवाने पड़ते हैं। काश महिलाएं इस षडयंत्र को समझ सकतीं तो उनकी स्वतंत्रता की राह आसान हो जाती।
*आभूषणों के प्रति आकर्षण-एक कृत्रिम कमजोरी :*
आभूषण धनवान व्यक्ति के लिए यह अपनी सम्पन्नता का प्रदर्शन है। महिलाओं का क्रांतिकारी व्यक्तित्व इस प्रतिस्पर्धा में खो गया है।
उन्होंने आभूषणों को ही अपना जीवन मान लिया है।आभूषण यदि असली नहीं है तो इस प्रतिस्पर्धा में नकली आभूषणों से भी उन्हें परहेज नहीं है।
विशेष रूप से विवाह या अन्य पार्टियों में तो यह पहचानना ही मुश्किल हो जाता है कि इसमें असली कौन से हैं और नकली कोन से?
_प्रश्न उठता है कि यह धोखा किसके लिए है? किराको धोखा दिया जा रहा है, स्वयं को, पति को या अन्य देखने वालों को?_
जो देखने वाले हैं उन्हें क्या फर्क पड़ता है दर्शक ने एक बार देखा, निहारा, सुखद या दुखद अनुभूति के साथ आगे बढ़ गया। उसे न कुछ मिला और न कुछ खोया। लेकिन~
_जिस महिला ने पहने हैं उसने क्या खोया, इस पर ध्यान किसी का नहीं जाता है?_
*हानियाँ :*
1.धन हानि-
आभूषणों, डिजाइनर कपड़ों एवं सौंदर्य प्रसाधनों पर सबसे ज्यादा धन खर्च होता है।
2.
समय हानि-
समय खोया जो श्रृंगार में लगा।
3.
मानसिक कमजोरी-
यदि परिचित अथवा अपरिचित व्यक्ति प्रशंसा के दो शब्द न कहे तो मन बड़ा व्यथित हो उठता है। सारा श्रृंगार स्वयं को खाने को दौड़ता है। यह अनावश्यक रूप से स्वयं को कमजोर बनाता है।
_”तुम अच्छी/सुंदर लग रही हो?” ये शब्द आपकी कमजोरी बन जाते हैं। इन्हीं शब्दों को सुनने की लालसा महिलाओं को शोषण के मार्ग पर धकेल देती हैं।_
4.
जीवन के लिए खतरा-
चोर उचक्कों के लिए कार्य और आसान हो जाता है। यूं कहें की आभूषणों का प्रदर्शन चोरी का आमंत्रण है।
5.
गलत प्रतिस्पर्धा-
यह प्रदर्शन अन्य महिलाओं के लिए एक अनावश्यक और गलत प्रतिस्पर्धा को जन्म देता है। आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं के लिए यह प्रतिस्पर्धा एक अभिशाप बन जाती है।
6.
हीन भावना-
उपरोक्त प्रतिस्पर्धा में शामिल न हो पाने का मलाल उनमें हीन भावना को जन्म देता है। 7.
मानसिक विकृति-
इस प्रकार का प्रत्येक प्रदर्शन अन्य महिलाओं के लिए कष्ट का कारण बन जाता है और स्वयं की मानसिक विकृति के रूप में समाहित हो जाता है।
8.
तकरार का कारण-
अनेक परिवारों में किसी विवाह व अन्य पार्टी के कार्यक्रम में जाने से पहले बाजार जाकर खरीददारी की रस्म तकरार का कारण बन जाती है।
*गुलामी/कमजोरी की प्रतीक-कांच की चूड़ियां भी !*
इसे थोपने का मक़सद ये रहा है कि इस पित्रसत्तात्मक व्यवस्था में अगर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ते समय इनकी किसी से हाथापाई हो जाए तो हाथापाई करते समय इनकी हाथों की चूड़ियां टूट जाए और ये घायल हो जाए जिससे नारी जाति अपने अधिकारों की बात ना कर सके।
चूड़ियां पहनना कमजोर व्यक्तित्व की निशानी है। अनेक बार सुना है~
_कुछ नहीं होता हो तो चूड़ियां पहन लो।_
यह एक ऐसी भाषा है जिसे केवल पुरुष समझ सकता है। उसे चूड़ी पहनाने की बात करते ही उसे पुरुष होने का बोध हो जाता है। वह किसी भी सूरत में अपने आपको कमजोर कहलाना पसंद नहीं करता। उसका पुरुषत्व उसमें ऊर्जा भरने का कार्य करता है। इसीलिए पुरुष ने कभी चूड़ियां नहीं पहनीं, चाहे वे कितनी भी सुंदर क्यों न हों।
विवाहपूर्व रस्म सगाई में वर पक्ष की ओर से सबसे पहले चूड़ियां ही दी जाती हैं। दाम्पत्य जीवन में प्रवेश करना है तो कमजोर बनकर, चूड़ियां पहनकर आना। लड़कियां खुशी-खुशी इसे स्वीकार कर लेती हैं।
_जब महिला चूड़ी पहनती है तो पुरुष उसकी प्रशंसा करता है। बड़ी चतुराई के साथ अपने आपको मुक्त रखता है और महिलाओं को कमजोरी का प्रतीक पहना देता है। इस भाषा को महिलाएं भी समझ नहीं पा रही हैं।_
चूड़ियों का कमजोरी से तो सीधा संबंध है पर सुंदरता से बिल्कुल भी नहीं। चूड़ियों के प्रति महिलाएं विद्रोह न कर दें इसलिए इन्हें पति के जीवन से जोड़कर, सुहाग का प्रतीक बना दी और सुहाग को मूल्यवान ताकि वह समझती रहे चुडी सलामत है तो उसका पति सलामत है।
पति नहीं रहेगा तो दुनिया में उसका कोई नहीं रहेगा। सारे रिश्ते-नाते अर्थहीन हो जायेंगे। पति के दुनिया से जाते ही भाई-भाई नहीं रहेगा, पिता-पिता का दायित्व नहीं निभाएगा, सास, ससुर, देवर, जेठ सभी की नजरें आशंकित हो जाएगी : आदि कहकर उसे डराया गया।
ये कांच की चूड़ियां नहीं, तुम्हारे पति के जीवन की सांसे हैं। इन्हें सम्भाल कर रखना। बर्तन साफ करना, कपड़े धोना, खाना बनाने से लेकर खेत खलिहान में काम करना, चाहे कितना भी मुश्कित क्यों न हो चूड़ियों को संभाल कर रखना ही है। चूड़ी टूटी नहीं की पति समाप्त।
पति पीटे तो भी वह हाथ नहीं उठाती, क्योंकि वह जानती है, चूड़ी टूटने का मतलब, पति के जीवन की सांसे रुक जाना है। इसलिए वह कायर बन जाती है। घरेलू हिंसा की शिकार प्रतिदिन होती रहती हैं।
बार-बार का पिटना उसकी नियति बन गया है। यह उसकी मनसिक कमजोरी बन गया है।
_ये चूड़ियां केवल हाथों में ही नहीं, मस्तिष्क में भी पहना दी गई हैं। इनकी खनखनाहट महिलाओं के लिए एक मधुर संगीत बन गयी है। पर महिलाएं क्या जाने इस सुंदर और मधुर गीत की पटकथा में उसका जीवन शोषण की चक्की में पिसता जा रहा है।_
किसी महिला के पति के मर जाने पर, पति की मृत देह पर पत्नी द्वारा अन्य महिलाओं के सहयोग से चूड़ियां तोड़ने का रिवाज, इन्हें और अधिक आतंकित कर देता है।
यह हृदय विदारक दृश्य देखकर रूह कांप जाती है। स्वयं के हाथों की चूड़ियां तोड़ने की कल्पना एक सिहरन सी पैदा करती है। दूसरी तरफ चूड़ियों की खनखनाहट, एक सुखद जीवन का एहसास कराती है। यह एहसास एक स्वार्थ बन गया है जो बाधा बना है महिलाओं की आजादी में।
_शिक्षित होने का मतलब केवल डिग्री लेना ही नहीं होना चाहिए। शब्दों के अर्थ को भी समझना होगा तब ही महिला समझ पाऐंगीं की आखिर किस षडयंत्र से उन्हें गुलाम बनाया गया।_
आर्थिक रूप से समृद्ध महिलाएं सोने की चूड़ियां पहनने लगी हैं। ये सुहाग के साथ-साथ समृद्धि का परिचायक भी हैं।
चूड़ी कांच की हो या सोने की, इनका अर्थ केवल गुलामी से है। सोने की चूड़ियां पहनने से गुलामी का एहसास सुखद नहीं हो जाता। आर्थिक समृद्धि को मानसिक आजादी में बदलना चाहिए था पर ऐसा न हो सका।
सोने की चूड़ियां भले ही कांच से मजबूत क्यों न हो पर जान लेना चाहिए कि ज्यों-ज्यों चूड़ियों की कीमत बढ़ती है गुलामी की बेड़ियां उतनी ही मजबूत होती चली जाती हैं।
_आर्थिक रूप से कमजोर महिलाऐं भले ही अपनी आजादी की लड़ाई न लड़ पाई हो लेकिन आर्थिक रूप से समृद्ध महिलाएं भी अपनी मुक्ति का प्रयास नहीं कर सकी हैं।_
*यदि आभूषण का संबंध, वैवाहिक जीवन से होता तो पुरुष भी पहनते :*
यदि इनका संबंध सुन्दरता से होता तो पुरुष भी पहनते। इनका सम्बंध समृद्धि से होता तो पुरुष भी पहनते।
निश्चित रूप से ये बंधन हैं जो पुरुष द्वारा महिलाओं पर थोपे गए हैं उनको अधिकारों से वंचित (और कमजोर/गुलाम बनाए) रखने के लिए ताकि ये अपने अधिकारों की बात न कर सके न ही अपने अधिकारों के लिए लड़ सके; जबकि महिलाएं इन्हें जीवन का अंग समझ रही हैं।
_जब तक गुलामी/सुहाग के प्रतीक इन आभूषणों के प्रति आकर्षण बना रहेगा तब तक महिलाओं की मुक्ति की राह आसान नहीं होगी।_





