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रहस्यमय है विज्ञान और दर्शन का संगम

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     डॉ. विकास मानव 

कल्पना कीजिए कि दो जुड़वां भाई हैं—एक धरती पर और दूसरा चंद्रमा पर। धरती पर मौजूद भाई जैसे ही मुस्कुराता है, ठीक उसी क्षण, बिना किसी देरी के, चंद्रमा पर बैठे भाई के चेहरे पर भी मुस्कान आ जाती है। अगर धरती वाला भाई अचानक अपनी उंगली में दर्द महसूस करता है, तो चंद्रमा पर बैठा उसका भाई भी उसी क्षण वैसा ही दर्द अनुभव करता है—बिना किसी तार, सिग्नल, या रेडियो तरंगों के!

क्या यह कोई जादू है? क्या यह केवल कल्पना मात्र है? नहीं, यह आधुनिक विज्ञान का एक सिद्ध सत्य है, जिसे हम क्वांटम एंटैंगलमेंट (Quantum Entanglement) कहते हैं। वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि जब दो कण आपस में एक बार जुड़ जाते हैं, तो वे लाखों प्रकाश-वर्ष की दूरी पर भी एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं। यह अवधारणा जितनी रहस्यमयी है, उतनी ही भारतीय दर्शन और उपनिषदों के सिद्धांतों से मिलती-जुलती भी है।

क्वांटम यांत्रिकी के अनुसार, जब दो कण (जैसे फोटॉन, इलेक्ट्रॉन, या क्वार्क) एक बार आपस में जुड़ जाते हैं, तो वे लाखों प्रकाश-वर्ष दूर होने पर भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े रहते हैं। यदि एक कण की स्थिति बदली जाती है, तो दूसरा कण तुरंत उसी के अनुरूप प्रतिक्रिया करता है—बिना किसी देरी के! आइंस्टीन इसे “spooky action at a distance” (भूतिया क्रिया) कहते थे, क्योंकि यह उनकी सापेक्षता के सिद्धांत को चुनौती देता था। लेकिन भारत की आध्यात्मिक परंपरा इसे भूतिया नहीं, बल्कि सर्व-व्यापी ऊर्जा का चमत्कार मानती है।

क्या हम सभी आपस में जुड़े हैं?
कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी के बारे में सोचें और उसी पल उसका फोन आ जाए? या फिर आपको बिना किसी कारण किसी की चिंता होने लगे और कुछ समय बाद पता चले कि वह सचमुच संकट में था? यह मात्र संयोग नहीं है—बल्कि यह क्वांटम ऊर्जा और चेतना का खेल है। जब विज्ञान कहता है कि सभी कण एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं, तो यह भारतीय आध्यात्म के “संपूर्ण चेतना” (Universal Consciousness) के विचार को ही सिद्ध कर रहा है।
“एकोऽहं बहुस्यामि।” (बृहदारण्यक उपनिषद् 1.4.1)
(मैं एक हूँ, परंतु मैं अनेक रूपों में प्रकट होता हूँ।)
“अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।” (श्रीमद्भगवद्गीता 13.16)
(यह ब्रह्म सभी प्राणियों में अविभाज्य होते हुए भी विभाजित प्रतीत होता है।)
भारतीय दर्शन हमेशा से कहता आया है कि संपूर्ण ब्रह्मांड एक ही ऊर्जा का विस्तार है। यह वही सिद्धांत है, जिसे आज विज्ञान “Quantum Field Theory” के रूप में देख रहा है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों साल पहले ही कह दिया था—
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म।” (छांदोग्य उपनिषद् 3.14.1)
(यह संपूर्ण सृष्टि ब्रह्म है।)
अद्वैत वेदांत कहता है कि “संपूर्ण ब्रह्मांड एक ही चेतना का विस्तार है।” यह ठीक वैसे ही है जैसे क्वांटम एंटैंगलमेंट में सभी कण ऊर्जा के स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। योग और ध्यान की अवस्था में साधक इस ऊर्जा को अनुभव कर सकते हैं। कई बार साधकों को भविष्य की झलकें भी मिलती हैं, जो दिखाता है कि चेतना समय और स्थान से परे कार्य कर सकती है—ठीक वैसे ही जैसे क्वांटम एंटैंगलमेंट में दूरी कोई मायने नहीं रखती।
आज विज्ञान यह मानने लगा है कि पदार्थ (Matter) से अधिक महत्वपूर्ण ऊर्जा (Energy) है। और भारतीय आध्यात्म तो हमेशा से कहता आया है कि—
“न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।”
(श्रीमद्भगवद्गीता 2.20)
(आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है।)
क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) भी यही कहती है कि ऊर्जा नष्ट नहीं होती, केवल रूप बदलती है। जब वैज्ञानिक यह सिद्ध कर रहे हैं कि किसी कण की उपस्थिति मात्र उसे प्रभावित कर सकती है, तो यह भी भारतीय ध्यान साधना के विचार से मेल खाता है, जहाँ कहा गया है कि “आपका विचार ही आपकी वास्तविकता बनाता है।”
आज वैज्ञानिक क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम टेलीपोर्टेशन और अल्ट्रा-सिक्योर क्वांटम कम्युनिकेशन की दिशा में काम कर रहे हैं। पर क्या होगा जब विज्ञान यह समझेगा कि क्वांटम चेतना (Quantum Consciousness) भी संभव है?

क्या भविष्य में हम अपने विचारों को बिना किसी टेक्नोलॉजी के ब्रह्मांड के किसी भी कोने में भेज पाएंगे? क्या ऋषियों के टेलीपैथी और दूरदृष्टि के सिद्धांत अब वैज्ञानिक प्रमाण पाएंगे?
क्वांटम एंटैंगलमेंट विज्ञान के लिए एक चमत्कार है, लेकिन भारतीय दर्शन के लिए यह कोई नई बात नहीं। हम सभी ऊर्जा के एक विशाल महासागर का अंश हैं। चाहे विज्ञान इसे “Quantum Entanglement” कहे या आध्यात्म इसे “ब्रह्म” कहे—सत्य यह है कि हम सभी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

Ramswaroop Mantri

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