सुधा सिंह
अडोर्नो ने बाज़ारू लोकप्रिय कला और साहित्य के उत्पादन, वितरण, विक्रय और उपभोग की पूरी प्रक्रिया को संस्कृति का उद्योग और धोखे का बाज़ार कहा है। संस्कृति का उद्योग
रहस्यमयता को बढ़ाता है। संस्कृति का उद्योग छद्म चेतना पैदा करता है। उसमें वस्तु से अधिक उसके प्रभाव का महत्व हो जाता है।
लिओ लावेंथल ने लोकप्रिय साहित्य के समाजशास्त्र पर लिखा है। वो लोकप्रिय साहित्य को ‘विचारधारा’ मानते हैं और ‘विचारधारा’ को केवल छद्म चेतना। इलिए वो लोकप्रिय साहित्य को सामाजिक भ्रम भी कहते हैं। उनके अनुसार बुर्जुआ व्यवस्था में लोकप्रिय साहित्य व्यक्ति के आत्मविसर्जन को बढ़ाने वाला साहित्य है जिसका उद्देश्य है व्यापक समाज की चेतना को व्यवस्था के अनुकूल बनाना, उसमें संघर्ष और विरोध की जगह सहमति और स्वीकार की आदत डालना।
लोकप्रिय साहित्य पाठक समुदाय की कल्पना को कुंद करके उसके कलात्मक अनुभव की क्षमता को नष्ट करता है। इस साहित्य के माध्यम से कल्पना का संगठन और शासन समाज पर नियंत्रण करने वाली शक्तियों के हाथों में होता है। लावेंथल कहते हैं कि कल्पना का अंत मनुष्य की स्वतंत्रता का अंत है और लोकप्रिय साहित्य कल्पना के अंत का एक प्रमुख साधन है।
उरोक्त पैराग्राफ मूर्धन्य विद्वान और साहित्य आलोचक मैनेजर पांडेय ने अपनी बहुचर्चित आलोचना पुस्तक ‘साहित्य और समाजशास्त्रीय दृष्टि’ से उद्धृत किया गया है।
मैनेजर पांडेय ने अपनी पुस्तक के पांचवे खंड “लोकप्रिय साहित्य का समाजशास्त्र” में बाज़ारू साहित्य के विविध पक्षों पर बहुत विस्तार से लिखा है। मैनेजर पांडेय लिखते हैं कि गंभीर साहित्य के पाठकों की संख्या से लोकप्रिय साहित्य की संख्या बहुत अधिक है।
लोकप्रिय साहित्य के पाठक सभी वर्गों के लोग होते हैं। इतने बड़े पाठक समुदाय की उपेक्षा करके साहित्य पर बात करना बेमानी है। कहने का तात्पर्य यह है कि लोकप्रिय साहित्य हिन्दी के साहित्य संसार की समग्रता की एक ऐसी सच्चाई है जिसके अस्तित्व को अस्वीकार करना भ्रम में जीना है।
वह अच्छा है या बुरा, आवश्यक है या अनावश्यक, समाज के लिए हानिकारक है या लाभकर – ये सवाल विचारणीय है। लेकिन इन सवालों पर विचार करने से पहले यह स्वीकार करना ज़रूरी है कि उसका अस्तित्व है और वह अस्तित्व साहित्य – संसार के विशिष्ट नागरिकों अर्थात् गंभीर लेखकों की आकांक्षा के विपरीत और अनिच्छा के बावजूद सच है।
*लोकप्रिय साहित्य का समाजशास्त्र*
“लोकप्रिय साहित्य का समाजशास्त्र” खंड के पहले उपखंड “लोकप्रिय साहित्य के समाजशास्त्र की ज़रूरत” में वो फ्रांसीसी समाजशास्त्री पीयरे वोर्डिए के हवाले से लिखते हैं कि पूंजीवादी समाज में संस्कृति के क्षेत्र में परस्पर जुड़ी हुयी संस्थाओं और व्यक्तियों की एक पूरी व्यवस्था होती है।
ये संस्थाएं और व्यक्ति सांस्कृतिक वस्तुओं का उत्पादन, पुनरुत्पादन और वितरण में अपनी अपनी भूमिकाएं निभाते हैं। प्रत्येक सांस्कृतिक वस्तु एक बिकाऊ वस्तु होती है जिसका व्यावसायिक मूल्य होता है, लेकिन साथ ही वह एक प्रतीकात्मक वस्तु भी होती है जिसका विशिष्ट सांस्कृतिक मूल्य भी होता है। इस तरह सांस्कृतिक उत्पादन के दो रूप हैं- छोटे पैमाने का उत्पादन और बड़े पैमाने का उत्पादन।
छोटे पैमाने के उत्पादन में आर्थिक लाभ गौण होता है और प्रतीकात्मक मूल्य मुख्य होता है। बड़े पैमाने के उत्पादन में आर्थिक लाभ मुख्य होता है प्रतीकात्मक मूल्य गौण होता है। वोर्डिए के अनुसार कलात्मक साहित्य के क्षेत्र में छोटे पैमाने का उत्पादन चलता है और लोकप्रिय साहित्य में बड़े पैमाने का।
छोटे पैमाने के उत्पादन की वस्तुओं का मूल्य उनकी दुर्लभता पर निर्भर होता है, उनमें स्थायित्व होता जबकि बड़े पैमाने पर उत्पादित वस्तुएं अधिक सुलभ होती हैं और अल्पजीवी भी।
*कलात्मक साहित्य और लोकप्रिय साहित्य का संबंध*
“कलात्मक साहित्य और लोकप्रिय साहित्य का संबंध” उपखंड में मैनेजर पांडेय जी लिओ लावेंथल के हवाले से लिखते हैं कलात्मक या गंभीर साहित्य से लोकप्रिय या सतही साहित्य के संबंध का दूसरा रूप वहां दिखाई देता है जहां कलात्मक साहित्य को तरह-तरह के तरीकों से लोकप्रिय साहित्य बनाकर बेंचा जाता है। लिओ लांवेथल ने अपने एक लेख में लिखा है कि श्रेष्ठ कला को भी उपयोग की वस्तु बनाकर उसे भीड़ की संस्कृति में शामिल कर लिया जा सकता है और समाज को भ्रमित करने की छल-योजना के साधन के रूप में उपयोग हो सकता है।
इस प्रक्रिया में प्रायः कृतियों के ऐतिहासिक संदर्भ, सर्जनात्मक विवेक और ज्ञानात्मक मूल्य की उपेक्षा करके उन्हें सरल रूप में पाठकों के सामने पेश किया जाता है। सरल बनाने की प्रक्रिया में कला का भी सरलीकरण होता है और प्रचार और मनोरंजन उसका लक्ष्य बन जाता है।
मैनेजर पांडेय आगे लिखते हैं कि टेक्नोलॉजी के अभूतपूर्व विकास के कारण कला को बाज़ार की वस्तु बनाकर बेंचना अधिक आसान हो गया है। मशीनी-पुनरुत्पादन के युग में कला का बड़े पैमाने पर पुनरुत्पादन करके उसे सतही बनाना सरल हो गया है। कबीरदास, सूरदास और मीराबाई के कलात्मक प्रगीत फिल्मी गीतों की तरह गाए और रिकॉर्ड में भरकर बेंचे जा रहे हैं।
कई गायक इन महाकवियों के प्रगीतों को अपनी समझ के अनुसार कलाबाजी और गलाबाजी के लिए सुधार और बिगाड़ कर गाते हैं और महान कला को घटिया दर्जे का गीत बना देते हैं।
*लोकप्रिय साहित्य का स्वरूप*
“लोकप्रिय साहित्य का स्वरूप” उपखंड में साहित्य आलोचक मैनेजर पांडेय लिखते हैं लोकप्रिय साहित्य प्रकाशन के युग का साहित्य है जिसका बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन होता है। वह पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली की दूसरी वस्तुओं की तरह उत्पादित होकर बाज़ार के माध्यम से ख़रीद-बिक्री की वस्तु की तरह जनता तक पहुँचता है।
विशेषतः वह कलम से रोटी कमाने वाले मध्यवर्गीय लेखकों की मदद से बड़े व्यावसायिक प्रकाशनों-संस्थानों द्वारा उत्पादित साहित्य है जिसे उपभोग की दूसरी वस्तुओं की तरह जनता तक पहुँचाया जाता है।
मैनेजर पांडेय आगे लिखते हैं – पूंजीवादी युग का लोकप्रिय साहित्य आर्थिक उद्देश्य से लिखा गया और व्यावसायिक लाभ के लिए प्रकाशित साहित्य है, जिसका मूल्य बाज़ार में तय होता है। प्रकरांतर से यह बाज़ार के नियमों से उत्पादित और संचालित साहित्य है। यही कारण है कि इस लोकप्रिय साहित्य के उत्पादन, विनिमय, वितरण और उपभोग की पूरी व्यवस्था को अडोर्नो ने ‘संस्कृति का उद्योग’ कहा है और वोर्डिए ने उसे ‘प्रतीकात्मक वस्तुओं का बाज़ार’। अनेक आलोचक इस साहित्य को लोकप्रिय साहित्य कहने से हिचकते हैं क्योंकि उससे लोकप्रियता के बारे भ्रम फैलता है।
इसलिए इसे सस्ता साहित्य, सतही साहित्य, घटिया साहित्य, घसलेटी साहित्य, व्यावसायिक साहित्य और बाज़ारू साहित्य आदि कहा जाता है। क्योंकि मार्क्सवादी चिंतन में लोकप्रियता कला का एक सार्थक मूल्य है।
कार्ल मार्क्स ने “1844 की आर्थिक दार्शनिक पांडुलिपि” में लिखा है कि पूंजीवादी व्यवस्था में मनुष्य विच्छिन्नता या परायापन की प्रक्रिया का शिकार होता है। यह परायापन अधिक गहराने पर रैकरण (रेइफिकेशन) और व्यक्तित्व लोप का रूप धारण कर लेती है।
विच्छिन्नता या परायापन पूँजीवादी व्यवस्था की ऐसी सर्वग्रासी बीमारी है जिससे सभी प्रभावित होते हैं। इसके कारण पूँजीवादी समाज में मानवीय और और सामाजिक संबंध मूर्त, निर्वैयक्तिक और अमानवीय होकर वस्तुओं के बीच के संबंध का रूप धारण कर लेते हैं। टेक्नोलॉजी के अभूतपूर्व विकास ने समाज में अमानवीकरण की प्रक्रियाओं को और तेज कर दिया है।
इस प्रक्रिया में अपनी अस्मिता खोते खोते मनुष्य उस दशा में पहुँच जाता है जिसे किसी ने भीड़ का मनुष्य कहा तो किसी ने एकआयामी मनुष्य। अडोल्फ़ सांकेज वास्केज ने ठीक लिखा है कि सर्वग्रासी पूँजीवाद के अनुकूल आदर्श मनुष्य वह है जो व्यक्तित्वविहीन, अमानवीयकरण का शिकार, खोखला और हर तरह के जीवंत शक्ति से शून्य हो, क्योंकि ऐसे मुनष्य को व्यवस्था अपने अनुकूल ढाल सकती है, उसकी चेतना तोड़-मरोड़कर अपनी सेवा में लगा सकती है।
ऐसा ही व्यक्तित्वविहीन मनुष्य पूँजीवादी समाज मे लोकप्रिय साहित्य का लक्ष्य है। उस साहित्य की विषयवस्तु के रूप में और पाठक के रूप में भी। यही व्यक्तित्व-विहीनता लोकप्रिय साहित्य के लेखकों की एक जानी-पहचानी विशेषता है। लोकप्रिय साहित्य की दुनिया में अनामदासों की भरमार होती है।
*लोकप्रिय साहित्य की दृष्टियाँ और पद्धतियाँ*
“लोकप्रिय साहित्य की दृष्टियाँ और पद्धतियाँ” उपखंड में मैनेजर पांडेय लिखते हैं – यह ठीक है कि बाज़ारू लोकप्रिय साहित्य पूँजीवादी व्यवस्था की पतनशील संस्कृति की उपज है। लेकिन यह मान लेने के बाद उसे कूड़ा-कचरा कहकर उससे पल्ला झाड़ लेना ठीक नहीं है। यह तो पूँजीवादी व्यवस्था की एक प्रमाणिक वास्तविकता की ख़तरनाक उपेक्षा होगी।
अगर और किसी कारण से नहीं तो पूँजीवादी व्यवस्था के विचारधारात्मक स्वरूप, उसकी संस्कृति के एक रूप और उसमें मनुष्य की दशा या दुर्दशा को समझने के लिए उसकी एक नंगी वास्तविकता का विश्लेषण ज़रूरी है। यही कारण है कि विभिन्न विचारधाराओं के समाजशास्त्रियों ने अपने अपने ढंग से लोकप्रिय साहित्य का विश्लेषण किया है, उसके सामाजिक संदर्भ और अभिप्राय को समझने का प्रयास किया है।
*लोकप्रिय साहित्य और मार्क्सवाद*
“लोकप्रिय साहित्य और मार्क्सवाद” उपखंड में मैनेजर पांडेय प्रसिद्ध मार्क्सवादी अर्थशास्त्री अर्नेस्ट मैंडल द्वारा अपराध-कथाओं में वर्णित दुनिया का विश्लेषण और समाज से उसके संबंधों की खोज के हवाले से लिखा है। जहाँ मैंडल ने पूँजीवाद समाज में बढ़ते अपराधों से अपराध संबंधी उपन्यासों की बाढ़ का संबंध दिखलाया है।
इस प्रक्रिया में यह बात स्पष्ट हुयी है कि अपराध और अपराध संबंधी उपन्यास पूंजीवादी समाज की परस्पर जुड़ी हुई वास्तविकताएं हैं। इस व्यवस्था में ऐसी मानसिकता बनती है जो सनसनी और उत्तेजना की खोज करती फिरती है।
आज के पूँजीवादी समाज में एक ओर वर्ग संघर्ष तेज होने और दूसरी ओर अपराधियों के अधिक संगठित होने के साथ क़ानून और व्यवस्था का पूरा तंत्र बहुत फैल गया है। पुलिस तंत्र की गतिविधियां किसी भी अपराधी समूह से अधिक आतंककारी और ज़ासूसी उपन्यास की कथा-संरचना से अधिक रहस्यमयी हो गयी हैं।
जब समाज में शासनतंत्र के भीतर रहस्यमयता का जाल इतना फैला हो, क्रूरता और निर्ममता इतनी बढ़ी हो, वहां जासूसी दुनिया की कथाएं जीवन के वास्तविक अनुभवों से अधिक यथार्थ लगे तो क्या आश्चर्य! पूंजीवादी व्यवस्था, उसके शासन तंत्र और पुलिस तंत्र की निर्ममता और रहस्यमयता जासूसी उपन्यासों में व्यक्त होती है। इसीलिए पाठक उसकी ओर आकर्षित होते हैं।
पूंजीवादी व्यवस्था में अपराध और अपराध संबंधी उपन्यासों की भरमार के विश्लेषण के बाद मैंडल इस निष्कर्ष पर पहुँचें हैं कि केवल बीमार समाज ही एक ऐसी दुनिया की कल्पना कर सकता है जिसमें चालबाजी से सब कुछ संभव है, जहाँ किसी का अपने कार्य पर ही नहीं, अपने विश्वास पर भी कोई नियंत्रण नहीं है। हर आदमी किसी ‘रहस्यमयी शक्ति’ के हाथ की कठपुतली है। यही जासूसी उपन्यासों की दुनिया है।
क्या पूंजीवादी व्यवस्था में परायापन के शिकार मनुष्य की यही दशा नहीं है? जासूसी उपन्यासों की लोकप्रियता जिस सामाजिक बीमारी का लक्षण है उस पर चिंता जाहिर करते हुए मैंडल ने लिखा है कि हम यह देखकर केवल आश्चर्य प्रकट कर सकते हैं, आह भर सकते हैं या सिर धुन सिकते हैं कि कैसे एक आदमी हर साल दस, बीस या तीस हत्याओं की कहानियां मजे लेकर शांत भाव से पढ़ सकता है।
इस तरह वह जीवन भर में पांच सौ, या एक हजार काल्पनिक हत्याओं में मजा लेता है। वह समाज व्यवस्था जितनी भयानक है जिसमें जीने वाले लोग साहित्य-सुख और मानसिक शांति के लिए हत्या, लूट और बलात्कार का वर्णन-चित्रण खोज-खोज कर पढ़ते हैं।
कार्ल मार्क्स ने व्यंग्य और वाग्विदग्धता से भरपूर अपनी विशेष शैली में लिखा है – “जैसे एक दार्शनिक विचार पैदा करता है, कवि कविता पैदा करता है, पादरी उपदेश गढ़ता है और प्रोफ़ेसर मोटी मोटी किताबें पैदा करता है वैसे ही अपराधी अपराध पैदा करता है। अगर हम समाज से अपराध के उत्पादन के संबंध को गौर से देखें तो कई तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त हो सकते हैं।
अपराधी केवल अपराध ही पैदा नहीं करता, वह अपराध संबंधी क़ानून, उन क़ानूनों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर, उनके भाषण और मोटी-महंगी क़ानून की किताबें भी पैदा करता है। उन किताबों की बिक्री से राष्ट्रीय आय बढ़ती है और विशेषज्ञ विद्वान की आमदनी के साथ उनका व्यक्तिगत सुख भी बढ़ता है। अपराधी वह पूरा तंत्र पैदा करता है जिसमें पुलिस विभाग और अदालतें हैं।
सिपाही, जज, वकील, जूरी और फांसी देने वाले जल्लाद सब आते हैं। इन सबके माध्यमों से श्रम का सामाजिक विभाजन होता है। मानव-चेतना की विभिन्न क्षमताओं का विकास होता है, नई आवश्यकताएं पैदा होती हैं और उनकी संतुष्टि के नए उपाय खोजे जाते हैं। केवल यातना देने की ज़रूरत से अनेक प्रकार के यंत्रों का आविष्कार हुआ है और यातना के यंत्र पैदा करने की व्यवस्था में बहुतेरे संभ्रांत लोग लगे हुए हैं।
अपराधी कभी नैतिक और सौंदर्यात्मक अनुभूतियों को जगाते हुए जनसमुदाय के नैतिक और सौंदर्यात्मक अनुभूतियों को जगाते हुए समाज की अपने ढंग से सेवा भी करता है। इसके कारण और प्रेरणा से केवल क़ानून की मोटी किताबें, तरह तरह के अपराध संबंधी क़ानून और नियम ही नहीं बल्कि कला और साहित्य की रचना भी होती है।
इस प्रसंग में मूल और सिलर ही नहीं सोफोक्लिज और शेक्सपीयर तक याद किए जा सकते हैं। अपराधी बुर्जुओ वर्ग के दैनिक जीवन की नीरसता और सुरक्षा को तोड़ता है। इस प्रक्रिया में वह बुर्जुआ वर्ग को जड़ता से बचाता है और उसमें ऐसी तनाव भरी बेचैनी और गति पैदा करता है जिसके बिना बाज़ार की गलाकाटू स्पर्धा धीमी हो जाएगी। इस तरह वह उत्पादक शक्तियों को उत्प्रेरित करता है।
कार्ल मार्क्स ने उत्पादन की शक्तियों और साधनों के विकास में अपराध की भूमिका स्पष्ट करते हुए लिखा है कि अगर साम्राज्य गणतंत्रों का विनाश नहीं करते तो राष्ट्रो का विकास नहीं होता और उपनिवेशवादी दूसरे देशों की लूट का अभियान नहीं चलाते तो विश्व बाज़ार नहीं बनता। इस तरह अपराध केवल व्यक्ति ही नहीं करते कभी कभी राष्ट्र भी करते हैं।
मार्क्स ने विश्लेषण के अंत में यह सवाल रखा है कि –“क्या आदम के समय से ही पाप का वृक्ष ही ज्ञान का वृक्ष भी नहीं रहा है।”
अडोर्नो ने बाज़ारू लोकप्रिय कला और साहित्य के उत्पादन, वितरण, विक्रय और उपभोग की पूरी प्रक्रिया को संस्कृति का उद्योग और धोखे का बाज़ार कहा है। संस्कृति का उद्योग रहस्यमयता को बढ़ाता है। संस्कृति का उद्योग छद्म चेतना पैदा करता है। उसमें वस्तु से अधिक उसके प्रभाव का महत्व हो जाता है। लिओ लावेंथल ने लोकप्रिय साहित्य के समाजशास्त्र पर लिखा है।
वो लोकप्रिय साहित्य को ‘विचारधारा’ मानते हैं और ‘विचारधारा’ को केवल छद्म चेतना। इलिए वो लोकप्रिय साहित्य को सामाजिक भ्रम भी कहते हैं। उनके अनुसार बुर्जुआ व्यवस्था में लोकप्रिय साहित्य व्यक्ति के आत्मविसर्जन को बढ़ाने वाला साहित्य है जिसका उद्देश्य है व्यापक समाज की चेतना को व्यवस्था के अनुकूल बनाना, उसमें संघर्ष और विरोध की जगह सहमति और स्वीकार की आदत डालना।
लोकप्रिय साहित्य पाठक समुदाय की कल्पना को कुंद करके उसके कलात्मक अनुभव की क्षमता को नष्ट करता है। इस साहित्य के माध्यम से कल्पना का संगठन और शासन समाज पर नियंत्रण करने वाली शक्तियों के हाथों में होता है। लावेंथल कहते हैं कि कल्पना का अंत मनुष्य की स्वतंत्रता का अंत है और लोकप्रिय साहित्य कल्पना के अंत का एक प्रमुख साधन है।
फ्रैंको मोरेती ने अपने एक लेख में भय और आतंक पैदा करने वाले लोकप्रिय साहित्य की समाजशास्त्रीय विवेचन करते हुए फ्रैंकेस्टाइन और ड्रेकुला जैसे आधुनिक राक्षसों की साहित्यिक सृष्टि और लोकप्रियता की जड़ों को पूंजीवादी व्यवस्था में खोजा है। उन्होंने लिखा है कि आतंक साहित्य विभाजित समाज के आतंक और उससे बचने के प्रयास से पैदा हुआ है।
मार्क्स और फ्रायड दोनों की दृष्टियों की मदद से भय और आतंक के साहित्य का सामाजिक प्रयोजन स्पष्ट करते हुए मोरेती ने लिखा है कि इन उपन्यासों में समाज में मौजूद भय के वास्तविक रूप को छिपाया जाता है और उसे छद्म रूप में पेश किया जाता है। ताकि पाठक वास्तविक भय का सामना करके खुद भयभीत न हो। यह उपन्यासों का निषेधात्मक पक्ष है जिसमें वास्तविकता को विकृत किया जाता है।
इससे रहस्यमयता बढ़ती है। लेकिन इस साहित्य का एक और पहलू है। भीड़ की संस्कृति चेतना की संरचनाओं को व्यापक और मजबूत बनाते हैं। यह छद्म चेतना असल में प्रभुत्वशाली संस्कृति ही है। ये उपन्यास सामाजिक वास्तविकता और उसकी चेतना को विकृत और भ्रामक ही नहीं बनाते, वे छद्म चेतना को पैदा करते और बढ़ाते भी हैं। मोरेती सवाल भी उठाते हैं कि क्या ऐसे साहित्य को केवल पलायनवादी कहकर छोड़ा जा सकता है?
*लोकप्रिय साहित्य का रूप-पक्ष*
“लोकप्रिय साहित्य का रूप-पक्ष” उपखंड में मैनेजर पांडेय लिखते हैं लोकप्रिय साहित्य के रूप की दूसरी विशेषता सरलता है। यह सरलता विषय के चुनाव, कथा की संरचना, पात्रों के चरित्र और भाषा आदि में मिलती है। इस सरलता के कारण इन सबका सरलीकरण भी होता है। इस सरलता को बनाये रखने के लिए लोकप्रिय साहित्य के प्रकाशन पुस्तकों को संपादित करवाते हैं।
कई बार लेखक को पुस्तक की अपनी पूरी योजना बदलनी पड़ती है। पाठकों की मांग के अनुसार लिखने के कारण लोकप्रिय उपन्यासों का एक रुढ़िबद्ध ढांचा बन जाता है। उपन्यास लेखन फॉर्मूलाबद्ध हो जाता है। लोकप्रिय उपन्यासों में शीर्षकों का बहुत महत्व होता है।
ये शीर्षक ऐसे होते हैं जिनमें उत्सुकता और कुतूहल जगाने की क्षमता हो, कुछ कुछ रहस्य हो और चमत्कार का आभास भी. (चेतना विकास मिशन).





