प्रवीण द्विवेदी
1- एक व्यक्ति मुर्तज़ा हँसिया ले कर श्री गोरखनाथ जी के मन्दिर में अल्लाहु अकबर के नारे लगाते हुए मन्दिर में घुसने का प्रयास करता है जिसे सुरक्षा बल रोकने का प्रयास करता है और वो उनपर हँसिया से हमला करता है। उसकी जॉंच होना आवश्यक है और उसपर अपराध या शाजिश सिद्ध होने पर अपराध के अनुरूप सजा मिलना अति आवश्यक है और ये कार्य शीघ्रता से होना चाहिए।लेकिन उसे अपराध सिद्ध करने से पहले आतंकी प्रचारित करना ये अनुचित है।
2- दूसरी तरफ़ सैकड़ों की भीड़ जिसने तलवार फरसे बल्लम ले रखे होते हैं वो जा कर मस्जिद पर हमला करती है वहॉं कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं होती है जो लोग वहॉं थे वो डर कर भाग जाते हैं और वो लोग मस्जिद पर चढ़ कर भगवा झण्डा लहराते हैं और उसकी न तो चर्चा होती है न ही किसी चैनल पर प्रसारित किया जाता है और न ही उसे आतंकी या उन्मादी करार दिया जाता है न ही उनपर कोई क़ानूनी कार्यवाही होती है कोई गिरफ़्तारी नहीं कुछ नहीं क्योंकि वो आतंकी नहीं धार्मिक कार्य था ??
इसी दोहरे मापदण्ड के पीछे वो ज़हर छिपा है जो वर्तमान में हिन्दू धर्म के युवाओं को खुलेआम आतंकी बना रहा है और उसके आतंक पर कोई प्रश्न नहीं करता है न ही सरकार सजा सुनिश्चित करवा रही है जो कि किसी अन्य धर्म नहीं बल्कि हिन्दू धर्म के भविष्य को नष्ट कर रही है हमारे आपके बीच रहने वालों के बच्चों को ज़हरीला बनाया जा रहा और उनको खुलेआम मानव बम की तरह प्रयोग में लाया जा रहा है और उसकी ही परिणति ये है कि एक गृह राज्य मन्त्री का बेटा मासूम निर्दोष लोगों पर खुले आम गाड़ी चढ़ा देता है और सरकार उसके बचाव में खड़ी नज़र आ रही है ये वो कार्यवाही है जो देश के युवाओं को ग़लत राह प्रदान कर रही है जिन यूवाओं को बेहतर शिक्षा बेहतर रोज़गार के लिए संघर्ष करना चाहिए वो धार्मिक उन्मादी बनाए जा रहे हैं जो कहीं भी कभी भी किसी पर हमलावर हो सकते हैं।ये स्थिति चिन्ताजनक है भयावह है और निन्दनीय है ।
आतंक उन्माद हत्या के आरोप धार्मिक आधार पर तय नहीं होने चाहिए ग़लत को ग़लत कहना सीखना होगा वो चाहे किसी के द्वारा हो अन्यथा ये मरने मारने के विचार सारे देश को नष्ट कर देगा ।
एक व्यक्ति हमला करें या सौ दोनों के अपराध समान हैं
आतंकवाद के दोहरे मापदण्ड-जबकि दोनों आतंकी उन्मादी की श्रेणी में आते हैं 





