(पांच दिवसीय नाट्य समारोह, दमोह की रपट)
*सुसंस्कृति परिहार
दमोह में हर साल होने वाले पांच दिवसीय नाट्य समारोह का इस साल भी ठंड की ठिठुरन के बीच 17दिसंबर से आगाज़ हुआ।युवा नाट्य मंच से लोगों का लगाव और जुड़ाव भी अनूठा है जो आमतौर पर बंगाल और महाराष्ट्र में देखने मिलता है। ऐसी कोई शाम नहीं जब मानस भवन खचाखच ना भरा हो।
लोगों में इस तासीर को पैदा करने वाली शख़्सियत का नाम है राजीव अयाची।जो स्वत:एक पारंगत रंगकर्मी हैं तथा वर्तमान में पत्नी शिल्पी की स्मृति में निर्मित शिल्पी नाट्य गृह में नई माटी को अपने साथी रंगकर्मियों और एकमात्र महिला रंगकर्मी अमृता जैन के साथ मिलकर अपने सुगढ़ हाथों से संवार रहे हैं।इस बार इस नई पौध के साथ आज़ादी की 75वीं सालगिरह के अवसर इतिहास के एक गुम अध्याय से ‘बुंदेला विद्रोह’ नाटक की प्रस्तुति दी।इस नाटक से यह जानकारी जाहिर हुई कि आज़ादी का संग्राम 1857 मंगल पांडे से नहीं बल्कि अभाना दमोह के वीर सेनानी बहादुर सिंह से प्रारंभ होता है इस विद्रोह को बुंदेला विद्रोह की संज्ञा दी गई जिसमें नरसिंहपुर से लेकर हीरापुर तक के बुंदेला सेनानियों के साथ विभिन्न जातियों और मुसलमान जागीरदारों ने आज़ादी के लिए जो शुरूआती संघर्ष किया उसने अंग्रेजी शासन की नींद उड़ा दी लेकिन उन्हें अब तक वह सम्मान नहीं मिला जो मिलना चाहिए। इन सबको हिरदेशाह का नेतृत्व प्राप्त था।इस मज़बूत संगठन को तोड़ने में अंग्रेजों ने गद्दारों के ज़रिए प्रयास किया।हिरदेशाह ने बीमार हालत में भी अपनी शक्ति और सामर्थ्य के मुताबिक आंदोलन को जीवंत रखने का प्रयास जारी रखा। दमोह जिले के अभाना के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी बहादुर सिंह को अंग्रेजों ने इस तरह बर्बाद किया कि उनके परिवार को दूर दराज शरण लेनी पड़ी उनके ध्वस्त महल के अवशेष भी अब धूमिल हो चुके हैं। इतिहास से विलुप्त इस महत्वपूर्ण अध्याय को नाट्य युवा मंच ने अपने नन्हें कलाकारों के साथ बहुत ही ख़ूबसूरत अंदाज में बुंदेला विद्रोह की प्रस्तुति देकर एक गुम ज़रूरी कड़ी से दर्शकों को रुबरू कराया जिससे उनमें अभूतपूर्व उत्साह और गरिमापूर्ण भाव स्पष्ट नज़र आये। हिरदेशाह वास्तव में सबके हृदयों के शाह थे।उनका स्मरण कर नाट्य मंच ने शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि दी।

इस नाटक का निर्देशन राजीव अयाची का था अंग्रेज सैनिक की भूमिका में नन्हीं आरना जैन, आराध्य बर्मन, सानिध्य करें,अवधि जैन,आलिया खान,तनीषा खरे ,प्रियांशु अयाची,,नमन खरे की परेड ने सबको प्रभावित किया। वहीं केप्टिन ब्राऊन की भूमिका में शिवानी बाल्मीकि का अभिनय काफी प्रभावी रहा।राजा हिरदेशाह की भूमिका का उत्तरदायित्व मंच के साथी अनिल खरे ने शानदार निभाया।मेजर स्लीमेन दानिया खान,अंग्रेज अफसर सौमिल श्रीवास्तव,और मधुकर शाह की भूमिका का श्रेष्ठ निर्वहन भी सराहा गया। संगीत रविकांत बर्मन का था स्वर लक्ष्मीशंकर,दीक्षा सेन,राजीव अयाची का था।ढोलक पर देवेश श्रीवास्तव और अक्षत रैकवार रहे। सूत्रधार का फ़र्ज़ निभाया राजीव और दीक्षा ने।
अन्य चार दिन जो नाटक यहां अभिनीत हुए उनमें टीकमगढ़ से आए ‘भोर तरैया’ जो बुंदेली भाषा में जाने माने नाट्य निर्देशक संजय श्रीवास्तव के निर्देशन में था।नाटक में सरपंच दलित महिला की सीट पर किस तरह अनाधिकृत लोग अप्रत्यक्ष तौर पर काबिज होकर गांव का शोषण करते हैं यह ख़ूबसूरती से दर्शाया गया। चूंकि ये घटनाएं हमारे आस पास की हैं दर्शक इससे बराबर बावस्ता हैं इसलिए दर्शकों के बीच काफी चर्चित रहा ।बुंदेली का मज़ा भी भरपूर लिया गया।

थियेटर शाइन कोलकाता से आए “तोमार डाके” जिसके निर्देशक सुशोभित वंदोपाध्याय थे, ने अपने नाटक के ज़रिए सीरिया युद्ध के महत्त्वपूर्ण दृश्यों का अभूतपूर्व सृजन करते हुए ऐसा ग़मगीन माहौल निर्मित किया कि दर्शक सांस थामे मौन बैठे रहे।स्त्री के साथ अमानवीयता की हदों से आपूरित दृश्य फिल्म जैसे थे जो दिल को दहला गए। कथावाचक इप्सिता देवनाथ इस बीच भावुक हो कर दर्शकों को आज के ज़रूरी संदेश देकर उनके ग़म़ों को दवा देती रहीं।संगीत और मंच सज्जा बेहद सराहनीय रही।
जबलपुर की लोकनाट्य सांस्कृतिक संस्था ने “स्वांग मल्टीनेशनल” के ज़रिए निर्देशक संजय गर्ग के साथ आज की राजनीति का मुलल्मा चढ़ाकर हेंस क्रिश्चियन एंडरसन की Emperor’s New clothes बाल कथा को इस अंदाज़ में पेश किया कि हाल तालियों की गड़गड़ाहट से लगातार गूंजता रहा। मल्टीनेशनल ठग ,मूर्ख राजा,जादू का सूट और उसके कपड़े बदलने की चर्चाएं नगर में बराबर आज तक जारी है। राजा रेशमलाल का किरदार निभाने वाले दविंदर सिंह ग्रोवर सबको याद रहेंगे।

अंतिम दिन निर्देशक सादात भारती ने संप्रेषणा नाट्य मंच कंपनी के माध्यम से “गांधी ने कहा था” की बहुत ही गंभीर और मार्मिक प्रस्तुति दी। 14 अगस्त 1947 कीआधी रात से जब गांधी जी बेलाघाट की तंग गलियों में एक मजदूर के घर अनशन पर बैठे हैं तभी तारकेश्वर पांडे आता है और उन्हें उपवास तोड़ने को कहता है क्योंकि उसका एकलौता पुत्र दंगों में मारा गया है इस दुख और वेदना से उबरने के लिए गांधीजी उसे एक बच्चे को ढूंढ कर परवरिश करने की सलाह देते हैं लेकिन शर्त रहती है कि वह बच्चा मुसलमान होना चाहिए और उस बच्चे की परवरिश मुस्लिम तौर तरीके से होना चाहिए तारकेश्वर लौटकर घर आता है और आफताब नाम के बच्चे की परवरिश करता है तारकेश्वर की पत्नी सुमित्रा समाज, संस्कृति और परंपराओं के द्वंद को काटकर भी बच्चे को मां का प्यार देती है उसे एक अच्छा इंसान बनाती है लेकिन अलगाववाद की अंधेरी गलियों में धंस कर आफताब भटक जाता है वह अंततः लौटकर आता है और गांधी के सत्य को यथावत करता है।

नाटक “गांधी ने कहा था” दिलों को पास लाने की दिशा में एक सशक्त प्रयास है आजादी से लेकर आज तक फैले विकृत सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ने का सशक्त हथियार है आज संप्रदायिक लोग जिन सवालों को खड़ा कर लोगों के जेहन में सांप्रदायिकता का गुबार भर देना चाहते हैं उनका असली चेहरा उजागर होता है जहां सत्य है वहां गांधी है जहां आतंक है उनके पीछे गोडसे है हिंसा अगर गोडसे है तो उसका जवाब है गांधी एक तरह से यह नाटक तोड़ने वाली ताकतों को बेनक़ाब करता है तो दूसरी तरफ जोड़ने वालों को शक्ति प्रदान करता है और इतिहास का सच जब आज के सच से साम्य स्थापित करता है तो वर्तमान के साथ-साथ इतिहास भी प्रासंगिक हो जाता है इंसानियत से हर इंसान को जोड़ने वाला यह नाटक है। नाटक में ,तारकेश्वर- योगेश तिवारी,सुमित्रा- नेहा केवट और आचार्य-के एल राव अपनी सक्षम भूमिकाओं से लोगों को मज़बूती से बांधे नज़र आए।सादात भारती के कुशल निर्देशन से सज्जित यह नाटक देखा जाना आज की ज़रूरत जैसा है।
कुल मिलाकर पंच दिवसीय यह नाट्य समारोह एक बार फिर दमोह से सुधी दर्शकों को मंत्रमुग्ध करके भले समाप्त हो गया लेकिन उनके स्मृति पटल पर ये दृश्य बराबर कौंधते रह कर नई दृष्टि का निर्माण करेंगे । तमाम कलाकारों और निर्देशक के प्रति यही सबसे बड़ा सम्मान होगा। नाट्य युवा मंच के तमाम साथियों को बहुत बहुत बधाई ।नन्हें साथियों को शुभाशीष।जिनके माध्यम से दमोह वासी इन शानदार और महत्वपूर्ण प्रस्तुतियों को देख सके।





